अंधकार के क्षण जल जाते

जहां दीप की चर्चा से ही अंधकार के क्षण जल जाते
मैं अपनी गलियों में बिसरे वे स्वर्णिम पल बुला रहा हूँ

इंद्रधनुष की वंदंवारों पर उड़ती इठलाती गंधे
दादी नानी की गाथा में बचपन में आ सज जाती थी
और तिलिस्मी किसी कंदरा में छुप बैठी सोनपरी इक
अनायास ही परस दीप का पाकर सन्मुख आ जाती थी

आज समय के इस गमले में वे ही स्वर छूमंतर वाले
अंधियारे को दीप बना दें यही सोच कर उगा रहा हूँ 

पगडण्डी से चली टेसुओं की चौपाल तलक बारातें
और प्रतीक्षा के दीपक ले बैठी हुई सांझ से सांझी
दृष्टी मिलन होते दोनों का,अंधकार के क्षण जल जाते
बिखराती आलोक चहुंदिश द्युति
​ ​​हो​कर मधुर विभा सी


जीवन की पुस्तक के बिसरे इन प्रारंभिक अध्यायों को
कई दिनों से मैं रह रह कर दुहराने में लगा हुआ हू

आज झपटते है हर दिशि से तिमिर ओढ़ बदरंग कुहासे
राहों के मोड़ो पर आकर खड़ी अमावस देती पहरा
कोलतार के रंगों वाली उमड़ रही हैं उच्छल लहरें
और विरूपित ही दिखता है प्राची में किरणों का चेहरा

अंधकार के क्षण जल जाते,  हाथों में तीली आते ही
संशय में डूबे हर मन में, मैं निष्ठाएं जगा रहा हूँ 

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