कभी चल दिए साथ

कभी चल दिए साथ पकड़ कर उंगली जो जीवन के पथ पर
वो कुछ ऐसे सपने थे  जो संवरे नहीं नयन में आकर

गति के अनुष्ठान से लेकर पथ पर बिखर रहे मीलो में
पाथेयों के उद्गम से ले बिछी नीड तक की झीलों में
अरुणाचल से आराम्भित हो किरण किरण के अस्ताचल तक
दोपहरी के प्रखर सूर्य 
सी , जली रात की कंदीलों में


परछाई बन कभी चल दिए साथ निरंतर जो घटनाक्रम
कोई ऐसा ना था
 आया हो जो कोई निमंत्रण पाकर


कभी तान बांसुरिया की तो कभी चुनी अलगोजे की धुन
कभी रागिनी थी सितार की, कभी लिया इकतारे को चुन
रहे खोजते इक सरगम को तार तार में संतूरों के
कैद किये थी पायल उसको अपने इक घुँघरू में 
​बुन  बुन ​


कभी चल दिए साथ फिसल कर साजों के तारों से जो सुर
उनमें कोई एक नहीं था, वाणी जो दुहराये गाकर

बचपन की गलियों में या फिर अल्हड़ता के नए मोड़ पर
यौवन के पथ पर बंधन के सभी दायरे बंधे तोड़ कर
रंगभूमि में दायित्वों की, हर निश्चय का साथ 
निभाते 
जीवन पथ पर साथ रहे है संकल्पों का शाल ओढ़कर


कभी चल दिए साथ थाम कर साँसो के धागे जो रिश्ते
संभव नहीं व्यक्त कर पाना उन्हें शब्द के 
वस्त्र उढ़ाकर 

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