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Showing posts from August, 2016

कहना होगा तुम हो पत्थर

थी हमें पिलाई गई यहाँ घुट्टी में घोल कई बातें
जिनको दोहराते बीते दिन, बीती अब तक सारी रातें
इस जगती की हर हलचल का है एक नियंत्रक बस सत्वर
हर घटना का है आदि अंत बस एक उसी की मर्जी पर
पाले बस यही मान्यताएं नतमस्तक थे मंदिर जाकर
आराधे सुबहो शाम सदा प्रतिमा में ढले हुए पत्थर
गीता ने हमको बतलाया, वह ही फल का उत्तरदायी
कर्तव्य हमारे बस में है, परिणाम सुखद सब होता है
उसने संबोधित होने को, मध्यस्थ न आवश्यक कोई
जो भी उससे बातें करता, वो सारी बातें सुनता है
तो आज हजारो प्रश्न लिए आया हूँ द्वार तुम्हारे पर यदि उत्तर नहीं मिले तो फिर, कहना होगा तुम हो पत्थर


तुमने जब सृष्टि रची थी तब क्या सोचा था बतलाओ तो
क्यों धर्म रचा जो आज हुआ मानवता का कट्टर दुश्मन
क्यों ऐसे बीज बनाये थे जो अंकुर हों जिस क्यारी में
उसक्यारी में ही आयातित करते है अनबन के मौसम

वसुधैवकुटुंबम शिलालेख जो बतलाती संस्कृतियोंका उस एक सभ्यता को सचमुच कहना होगा अब तो​ पत्थर


जो स्वार्थ घृणा और अहाँकर की नींवों पर निर्मित होता
उस एक भवन की प्रतिमा में कब प्राण प्रतिष्ठितहोते हैं  तुम इन प्रासादों के वासी,  जो चाकर चुने हुए तुमने
वे श्रद्धा और आस्था की बेशर्म …

एकाकियत

कैप्सूलों गोलियों की एक अलमारी
उम्र की इतनी घनी दूुश्वारियों में
आ बढ़ा
कितना अकेलापन
धुंध बन कर आँख में फिर से तिरा
बीते दिनों का
वो खिलंदड़पन
सांझ की बैसाखियों पर बोझ है भारी
स्वप्न जाकत ताक पर था टंग गया ठुकरा निमंत्रण
लौट न आया
रह गया परछाइयों की भीड़ में
गुमनाम होकर
साथ का साया
रात गिनती गिनतियों को आज फिर हारी


जुड़ गया रिकलाइनर से और टीवी के
रिमोटों से
अटूटा एक अपनापन
बढ़ गई थी फोने के सरगम सुरों से
एक दिन जो
आज भी सुलझी नहीं अनबन
भोर संध्या रात पर एकाकीयत तारी ​

किसके किसके नाम

संदेशे हर रोज मिले है भोर दुपहरी शाम
लाता रहा रोज ही मौसम किसके किसके नाम
मन की शुष्क वाटिका में पर अब न फूल खिले
जितने भी सन्देश मिले पतझर के नाम मिले
एक कटोरी भरी धूप की देकर गई दुपहरी
बीन ले गई संध्या आकर् जब द्वारे पर उतरी
शेष रह गई चुटकी भर कर बस सिन्दूरी घाम
और रहे आते सन्देशे जाने किसके नाम​
कटते रहे दिवस जीवन के बन कर के अभिशाप
सपनों की परछाईं की भी बची नहीं कुछ आस
रहे गूँजते सांसों में बस सन्नाटे के गीत
एकाकीपन रहा जोड़ता मन से अपनी प्रीत
एक कील पर अटक गये सब दिन के प्रहर तमाम
और पातियाँ थी मौसम की किसके किसके नाम
तिरते रहे हवाओं में टूटी शपथों के बोल
बिकी भावना  बाज़ारोा में बस कौड़ी के मोल
नयनो की सीपी पल पल पर स्वाति बूँद को तरसी
फिर से घिरी घटा अंगनाई से गुजरी बि​न बरसी
विरही  मन के मेघदूत को मिला न पी का गाँव
थका  खोजते  लिखे मिले थे और किसी के नाम​

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके व्यस्तताओं में​
आज महकती पुरबाई ने वे सब मुझको सुना दिए हैं
मुझे विदित है मन के आँगन में होती भावो की हलचल
और चाहना होगी लिख दो मुझको अपने मन की बाते
लेकिन उलझे हुए समय की पल पल पर बढ़ती मांगो में
जाता होगा दिन चुटकी म बीती होंगी पल में रातें
उगती हुई भोर की किरणों ने पाखी के पर रंग करके
वे सारे सन्देश स्वर्ण में लिख कर जैसे सजा दिए हैं
शब्द कहाँ आवश्यक होते मन की बातें बतलाने को
​औरकहाँ सरगम के सुर भी व्यक्त कर सके इन्हें कदाचित
लेकिन नयनों की चितवन जब होती है आतुर कहने को
निमिष मात्र में हो जाते हैं अनगिन महाग्रंथ संप्रेषित
बोझिल पलकों से छितराती हुई सांझसीसुरमाई ने नभ के कैनवास को रंग कर वे सब मुझकोदिखा दिए है
वैसे ही सन्देश लिखे थे जो रति ने अनंग को इक दिन
और शची ने जिनसे सुरभित करी पुरंदर की अंगनाई
दमयंती के और लवंगी के नल जगन्नाथ

मेघों के कन्धों पर

कालिदास की अमर  कल्पना​
को फिर से दोहराया मैंने
मेघों के कांधों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैने
कितनी बार शिकायत के स्वर
मेरे कानों से टकराये
कितने बीत गये दिन, कोई
तुम सन्देशा भेज न पाये
भेजे तो थे सन्देशे पर
रूठा मौसम का हरकारा
इसीलिये तो सन्देसों को
मिला नहीं था द्वार तुम्हारा
मौसम  की हठधरमी वाली
गुत्थी को सुलझाया मैने
मेघों के कन्धों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैने
श्याम घटाओं से लिख कर के
अम्बर के नीले कागज़ पर
रिमझिम पायल की रुनझुन की
सरगम वाली मुहर लगाकर
सावन की मदमाती ऋतु से
कुछ नूतन सम्बन्ध बनाये
ताकिं कोई भी झोंका फिर से
इनको पथ से भटका पाये
अनुनय और विनय कर करके
मौसम को समझाया मैंने
मेघों के कन्धों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैंने
​जितने भाव दामिनी द्युति से  
कौंधे मन की अँगनाई में
उन सबको सज्जित कर भेजा
है बरखा की शहनाई में​
नदिया की लहरों पर खिलते
बून्दों के कोमल पुष्पों से
कर श्रुन्गार, सजाया भेजा
सन्देशा मैने गन्धों से
डूब प्रेम में उसे सुनाये
मौसम को उकसाया मैने
मेघों के कंधों पर रख कर
यह सन्देश पठाया मैने