कोई बैठे आ हमारे पास भी

उम्र की पगडंडियों के
हर अधूरे मोड़ पर बस
आस केवल एक थी मुट्ठी भरे आकाश सी
चार पल को कोई बैठे आ हमारे पास भी

बिन पते के लौटता आया
निशाओ का निमंत्रण
भोर गठरी बाँध अपनी
ताकती थी पंथ निर्जन
और सूखे होंठ पर अठखेलियां थी प्यास की

नैन में ही रह गई सब
कल्पनायें छटपटाकर
इक प्रतीक्षा थी प्रतीक्षित
द्वार पर धूनी रमाकद
किन्तु आई ही नहीं बदली कोई मधुमास की

टूट बिखरी पायलें सब
सावनी पनिहारियों की
धुंध कुहसाती रही बस
बढ़ रही दुश्वारियों क
पालकी पुरबाई   की लेकिन क्षितिज के पार थी

Comments

Udan Tashtari said…
बहुत ही उम्दा भई जी

Popular posts from this blog

तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

वीथियों में उम्र की हूँ

बीत रही दिन रात ज़िन्दगी