अश्रु बहाने से न कभी

अश्रु बहाने से न कभी मिल सकी किसी को भी मंज़िल
मुस्काते पथ के छालों के फूल खिले तब लक्ष्य मिला

हाथों की खिंचीी लकीरों में उलझाकर दिवस बिताना क्या
झंझावातों की भंगुरता कुछ पल है तो घबराना क्या
गालो पर खिंची आंसुओं की पगडण्डी पंथ नहीं बनती
जो भटका घर में ही उसको फिर दिशाबोश करवाना क्या

थक हार बैठने वाले के क़दमों को नहीं चूमता पथ
औ अश्रु बहाने से न कभी विजयी कर पाता कोई किला

हाथों में कैद परिश्रम के विधना का हर  जोखा लेखा
संकल्पों के इतिहासों ने था महाकाल झुकते देखा
निश्चय ने सदा बहाई है अलकापुर र से लाकर गंगा
विश्वास स्वयं पर औ निष्ठा बदले किस्मत की हर रेखा

हाँ अश्रु बहाने से न कभी सिंचित हो सकी कोई क्यारी
कितने प्रयास एकत्र हुए तब ही शाखा  पर फूल खिला

सामर्थ्यहीनता का द्योतक चुप रह कर अश्रु बहाना है
मानवजीवन सर्वोपरि है देवों ने भी यह माना है
विध्वंस हमें ऊर्जा देता हर बार नए निर्माणों की
हर बार नया उत्साह सजा आगे को कदम बढ़ाना है

मिल पाया किसे कहो वांछित बस बैठे अश्रु बहाने से
संघर्षित जो भी रहा उसे सागर से अमृत कलश मिला

Comments

Popular posts from this blog

अकेले उतने हैं हम

तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

बहुत दिनों के बाद