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Showing posts from April, 2016

अश्रु बहाने से न कभी

अश्रु बहाने से न कभी मिल सकी किसी को भी मंज़िल
मुस्काते पथ के छालों के फूल खिले तब लक्ष्य मिला

हाथों की खिंचीी लकीरों में उलझाकर दिवस बिताना क्या
झंझावातों की भंगुरता कुछ पल है तो घबराना क्या
गालो पर खिंची आंसुओं की पगडण्डी पंथ नहीं बनती
जो भटका घर में ही उसको फिर दिशाबोश करवाना क्या

थक हार बैठने वाले के क़दमों को नहीं चूमता पथ
औ अश्रु बहाने से न कभी विजयी कर पाता कोई किला

हाथों में कैद परिश्रम के विधना का हर  जोखा लेखा
संकल्पों के इतिहासों ने था महाकाल झुकते देखा
निश्चय ने सदा बहाई है अलकापुर र से लाकर गंगा
विश्वास स्वयं पर औ निष्ठा बदले किस्मत की हर रेखा

हाँ अश्रु बहाने से न कभी सिंचित हो सकी कोई क्यारी
कितने प्रयास एकत्र हुए तब ही शाखा  पर फूल खिला

सामर्थ्यहीनता का द्योतक चुप रह कर अश्रु बहाना है
मानवजीवन सर्वोपरि है देवों ने भी यह माना है
विध्वंस हमें ऊर्जा देता हर बार नए निर्माणों की
हर बार नया उत्साह सजा आगे को कदम बढ़ाना है

मिल पाया किसे कहो वांछित बस बैठे अश्रु बहाने से
संघर्षित जो भी रहा उसे सागर से अमृत कलश मिला

मिले मुझे तुम मध्यान्तर में

इक नाटक के मंचन पर जब मिले मुझे तुम मध्यान्तर में
अकस्मात् ही घिर कर आये आँखों में यादों के बादल

वे पल मुख्य पात्र हम तुम थे मंचित जीवन के नाटक में
टिका हुआ था हम पर ही तो घटनाक्रम व् पूर्ण कथानक
निर्देशन भी अनुयायी संवाद संहिता का अपनी था
सूत्रधार भूला करता था हमें देख, निज कथ्य अचानक

बीते हुए पलों में जीना है स्वीकार नहीं मुझको,  पर
कुछ पल बस जाते नयनों में बन कर के सुधियों का काजल

प्रश्न उठे कुछ ले अंगड़ाई उस पल मन की अमराई में
क्या छेड़ा तुमको भी गुंजित इस अतीत की शहनाई ने
क्या हस्ताक्षर जड़े महकती भूली बिसरी यादों ने कुछ
क्या वे पल जीवंत हुए ?  जो बीते संध्या सुरमाई में

यद्यपि है अनुमान मुझे क्या होगा इन प्रश्नों का उत्तर
लेकिन उत्कण्ठा का असमंजस फिर भी करता है पागल।

बदले हुए मंच अब सन्मुख और कथानक भी है बदला
शब्द हुए सारे निर्धारित पृष्ठभूमि अब मुख्य पात्र है
दृश्य श्रव्य की डोर कहाँ से कौन खींचता है रहस्यमय
रंग सभी हो चुके तिरोहित पटाक्षेप ही  शेष मात्र है

खिंचे हुये परदे की हम तुम  लटकी हुई डोर के जैसे  और कक्ष को आत्मसात करने को है कुहुसाता आँचल

पाषाण में भी प्राण

जानते पाषाण में भी प्राण हो जाते प्रतिष्ठित
सांस ले विश्वास की जब आस्था की ज्योति जागे

जब मचल लोबान की खुशबू लहरती है हवा में
तब मजारों की चिरंतन नींद खुल जाती अचानक
चादरों के छोर पर अंगड़ाई ले रंगीन धागे
शब्द में अंकित किये हैं एक श्रद्धा का कथानक

गहन अंधियारी गुफाओं में ह्रदय की दीप बनकर
निर्झरों में  ढल गए  विश्वास के सारे सहारे

है हमारी संस्कृति का साक्षी इतिहास कहता
पाँव की रज छु यहाँ पाषाण को भी प्राण मिलते
हो गई जीवंत निष्ठा साथ पा विश्वास का जब
उस घड़ी पाषाण स्तंभों से स्वयं ईश्वर निकलते

हो अगर संचेतना का केंद्र इक ही माध्यम तब
बाँध लाते तारको को सूत के कमजोर धागे

मान्यता का सूर्य चीरे गहनतम तम के कुहासे
शैलखंडों में नदी के जाग जाती चेतनाएं
प्राण तो पाषाण। की हर मूर्ती में होते पुजारी
जागते संकल्प कृत जब शीश को अपने झुकाएं

रुक गयी गति भी निरन्तर चल रहे रथ की समय के  
आस्थामय  जब ह्रदय संकल्पकृत हो मूल्य मांगे 

पालकी रात की रिक्त कर दी विदा

होंठ के गीत सारे उड़ा ले गईं जब हवा की इधर से गई पालकी धूप आकर उन्हें सोख कर ले गई जितनी परछाईयां थीं रहीं ताल की शब्द बस हिचकिचाते हुए रह गौए बोल पाये नहीं कोशिशें कीं बहुत और नजरें उदासी लिये तक रहीं त्यौरियां थीं चढ़ीं काल के भाल की
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गीत के गांव में द्वार खुलते नहीं उंगलियां खटखटाते हुए थक गईं लेखनी के समन्दर लगा चुक गये भावनायें उमड़ती हुई रुक गईं और हम अनलिखा पृष्ठ थामे हुये बस नजर को उसी पर गड़ाते रहे केन्द्र पर चक्र के रह गये हम रुके दिन परिधि थाम कर दूर जाता रहा रश्मियां छटपटाती धुरी पर रहीं पूर्व आने के पल दूर जाता रहा आ प्रतीची भी प्राची में घुलने लगी रोशनी के बदलने लगे अर्थ भी बाँह में एक पल थामने के लिये जितने उपक्रम किये,वे रहे व्यर्थ ही सूर्य के अर्घ्य को जलकलश थे भरे द्वार मावस के उनको चढ़ाते रहे रात के पृष्ठ पर तारकों ने लिखी जो कहानी समझ वो नहीं आ सकी नीड़ को छोड़ कर, लौट आती हुई राग गौरेय्या कोई नहीं गा सकी चाँद ने डाल घूँघट छिपा चाँदनी  पालकी रात की रिक्त कर दी विदा किन्तु वह रुक गई भोर  के द्वार पर सोचते रह गये सब, भला क्या हुआ अंशुमाली स्…