घूंघट से कुछ रंग चुरा कर

तुमने कहा नए ही ढंग से हम तुम अब के होली खेलें
इसीलिये लाया   उषा के घूंघट से कुछ रंग चुरा कर
कर गुलाल संध्या के पग में रचे अलक्तक की आभा की
दोपहरी के स्वर्ण थाल में रख कर लाया उन्हें सजा कर

जाते हुए शरद की हौले हौले उठती पगचापों में
टेसू के फूलों की टूटी पंखुरियों को घोला मैंने
देख बसंती चूनर को जो बजा रहा आवारा मौसम
उस सीटी में बाँसुरिया के खोये स्वर को खोजा मैंने

कालिंदी की परछाई को गई रात की सुरमाहट में
मिला रहा हूँ रखूँ तुम्हारे कुंतल जिससे रंग सजा कर

चलो कपोलो पर मल दूं मै तुलसी के विरवे की खुशबू
और भिगो दूं तन को लेकर सौगंधओं की मधुर चांदनी
भरूं घोल कर पिचकारी में कुछ मीठी मीठी मनुहारें
सराबोर कर दूं लेकर के बादल से झर रही रागिनी

पुरबाइ जो छेड़ रही है नन्ही कोपल की मुस्काने
सोच रहा हूँ उससे रंग दूं अंगराग में उसे मिला कर

युग बीते हैं वही पुराने नीले पीले रंग से रंगते
आओ हम इतिहास रचे नव, रंगे अधर को मुस्कानों से
तन को मन को नांद भरी अपनत्व भावना में डुबकी दे
गलियो को रंगीन बना दे प्रीत भरी रसमय तानो से

जीवन के इस महासिंधु में हैं अशेष रत्नों की गागर 
उसको स्नेह नीर से भर दें राग द्वेष सब आज भुला  कर 

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