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Showing posts from March, 2016

घूंघट से कुछ रंग चुरा कर

तुमने कहा नए ही ढंग से हम तुम अब के होली खेलें
इसीलिये लाया   उषा के घूंघट से कुछ रंग चुरा कर
कर गुलाल संध्या के पग में रचे अलक्तक की आभा की
दोपहरी के स्वर्ण थाल में रख कर लाया उन्हें सजा कर

जाते हुए शरद की हौले हौले उठती पगचापों में
टेसू के फूलों की टूटी पंखुरियों को घोला मैंने
देख बसंती चूनर को जो बजा रहा आवारा मौसम
उस सीटी में बाँसुरिया के खोये स्वर को खोजा मैंने

कालिंदी की परछाई को गई रात की सुरमाहट में
मिला रहा हूँ रखूँ तुम्हारे कुंतल जिससे रंग सजा कर

चलो कपोलो पर मल दूं मै तुलसी के विरवे की खुशबू
और भिगो दूं तन को लेकर सौगंधओं की मधुर चांदनी
भरूं घोल कर पिचकारी में कुछ मीठी मीठी मनुहारें
सराबोर कर दूं लेकर के बादल से झर रही रागिनी

पुरबाइ जो छेड़ रही है नन्ही कोपल की मुस्काने
सोच रहा हूँ उससे रंग दूं अंगराग में उसे मिला कर

युग बीते हैं वही पुराने नीले पीले रंग से रंगते
आओ हम इतिहास रचे नव, रंगे अधर को मुस्कानों से
तन को मन को नांद भरी अपनत्व भावना में डुबकी दे
गलियो को रंगीन बना दे प्रीत भरी रसमय तानो से

जीवन के इस महासिंधु में हैं अशेष रत्नों की गागर  उसको स्नेह नीर से भर दें राग द्वेष सब आज भुला  कर…

बज रही है मौसम की बांसुरी कहीं जैसे

बादलो के टुकड़े आ होंठ पर ठहरते हैं
किसलयो से जैसे कुछ तुहिन कण फिसलते हैं
उंगलियां हवाओं की छू रही हैं गालों को
चांदनी के साये आ नैन में उतारते हैं
बात एक मीठी सी कान में घुली जैसे
हौले हौले बजती  हो बांसुरी कहीं जैसे

टेसुओं  के रंगों में भोर लेती अंगड़ाई
चुटकियाँ गुलालों की प्राची की अरुणाई
सरसों के फूलों का गदराता अल्हड़पन
चंगों की थापों पर फागों की शहनाई
आती हैं पनघट से कळसियां भरी ऐसे
हौले हौले बजती हो बांसुरी कहीं जैसे

उठती खलिहानों से पके धान की खुशबू
मस्ती में भर यौवन आता है नभ को छू +
गलियों में धाराएं रंग की उमंगों की..
होता है मन बैठे ठाले ही बेकाबू
बूटों की फली भुनी मुख में घुली ऐसे
हौले हौले बजती हो बांसुरी कहीं जैसे

लहराती खेतों में बासंती हो  चूनर
पांवों को थिरकाता सहसा ही आ घूमर
नथनी के मोती से बतियाते बतियाते
चुपके से गालों को चूमता हुआ झूमर
याद पी के चुम्बन की होंठ पर उगी ऐसे
हौले हौले बजती हो बांसुरी कहीं जैसे

फगुनाइ गंध हवा में है

बासंती चूनर लहराई फागुन का रंग हवा में है
मौसम की चाल निखर आई फगुनाइ गंध हवा में है

गुनगुनी हो गई घूप परस ले गर्म चाय की प्याली का
फेंका उतार कर श्वेत, लपेटे दूब रंग हरियाली का
महीनो के बाद बगीचे में आकर कोई पाखी बोला
घर भर ने ताजा साँसे ली कमरों ने खिड़की को खोला

ली भावों ने फिर अंगड़ाई, फगुनाइ गंध हवा में है
कोंपल ने आँखे खोल कहा फगुन का रंग   हवा में है

पारा तलघर से सीढ़ी चढ़ ऊपर की मंज़िल तक आया
फिर चंग कहीं पर बोल उठा,बम लहरी का स्वर लहराया
खलिहानों के प्रांगण  में अब सोनाहली चूनर लहराई
नदिया के बहते धारे ने तट पर आ छेड़ी शहनाई 

तितली फूलों पर मंडराए, फगुनाई  गंध हवा में है
बालें फ़सलों  की लहराई फ़ागुन का रंग  हवा में है 

तन लगा तोड़ने अंगड़ाई मचले  पग चहलकदमियों को
होलिका दहन की तैयारी के चिह्न सजाते गलियों को
टेसू के फूल लगे रंगने नव पीत रक्त रंगों में दिन
अम्बर यह बादल से बोला, अब घर जा आया है फागुन

गीतों ने नई गज़ल गाई फगुनाई गंध हवा में है
मौसम ने पायल थिरकाई फ़ागुन का रंग  हवा में है

कभी कभी यह मन यूं चाहे,

कभी कभी यह मन यूं चाहे,
आज तोड़ कर बन्धन सारे   उड़े कहीं उन्मुक्त गगन में कटी पतंगों सा आवारा
खोल सोच का अपनी पिंजरा
काटे संस्कृतियों के बन्धन
धरे ताक पर इतिहासों का
जीवन पर जकड़ा गठबन्धन
तथाकथित आदर्शों का भ्रम
जो थोपा सर पर समाज ने
काट गुत्थियां सीधा कर दे
पल भर में सारा अवगुंठन

रोके चलती हुई घड़ी के
दोनों के दोनों ही कांटे
और फिरे हर गैल डगर में
बिन सन्देश बना  हरकारा

दे उतार रिश्तों की ओढ़ी
हुई एक झीनी सी चादर
देखे सब कुछ अजनबियत की
ऐनक अपने नैन चढ़ाकर
इसका उसका मेरा तेरा
रख दे बाँध किसी गठरी में
और  बेतुकी रचना पढ़ ले
अपने पंचम सुर में गाकर

भरी दुपहरी में सूरज को
दीप जला कर पथ दिखलाये
पूनम की कंदील बनाकर
उजियारे आँगन चौबारा  
जीवन की आपा धापी को
दे दे जा नदिया में धक्का 
प्रश्न करे जो कोई, देखे
उसको होकर के भौचक्का
जब चाहे तब सुबह उगाये,
जब चाहे तब शाम ढाल दे
रहे देखता मनमौजी मन
हर कोई रह हक्का बक्का 

जब चाहे तब कही ग़ज़ल को दे दे नाम गीत का कोई
और तोड़ कर बन्धन गाये प्रेम गीत लेकर हुंकारा