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Showing posts from February, 2016

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन जीवन एक निमिष रह पाये
हर धड़कन, हर सांस और पल, कहीं किसी से बँधा हुआ है

पहली बार धड़कते दिल ने पह्ली बार आँख जब खोली
बांधे रही उसे उस पल से प्रीत भरी ममता के धागे
पहली बार प्रस्फ़ुटित स्वर ने सम्बोधन के रिश्ते जोड़े
तब ही से बन्धन अनगिनती ले ले कर अंगड़ाई जागे

कैसे भला तोड़ कर बन्धन पथे से कदम अग्रसर हो लें
उठने वाला एक एक पग, पथ पर ही तो सधा हुआ है

यौवन के वयसन्धि मोड़ पर दृष्टि साधना के सँवरे पल
उनकी अंगड़ाई ने जकड़ा तन को मन को सम्मोहित कर
कालचक्र के रुके हुये गतिक्रम में बन्दी हुई ज़िन्दगी
एक बिन्दु के होकर स्तंभित हुये समूचे निशि औ’ वासर

था मुमकिन यह नहीं तोड़ कर बन्धन ऐसे मोह पाश के
विमुख हो चले, क्योकि सृष्टिक्रम इस पर ही तो टिका हुआ है

जीवन की चढ़ती दोपहरी उलझी व्यवसायिक्ताओ में
रहा असंभव दामन कोई उससे दूर कभी रख पाये
एक राग था एक ताल में बंधी हुई थी पूरी सरगम
अवरोहो से पंचम तक सुर चाहे कितने खुल कर गाये

संभव नहीं तोड़ कर बंधन नव चरित्र अभीनीत कर सकें
निर्देशक ने पूर्ण कथानक निर्धारित कर रखा हुआ है

मैं कहानी गीतमय करने लगा हूँ

आपका ये तकाजा लिखूँ गीत मैं कुछ नई रीत के कुछ नये ढंग के ज़िन्दगी की डगर में जो बिखरे पड़े, पर छुये ही नहीं जो गये रंग के मैने केवल दिये शब्द हैं बस उन्हें सरगमों ने बिखेरा  जिन्हें ला इधर कामना शारदा बीन को छोड़ कर राग छेड़े नये आज कुछ चंग पे -o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-
मैं कहानी गीतमय करने लगा हूँ  था कहा तुमने मुझे यह ज़िन्दगी है इक कहानी हर कड़ी जिसमें निरन्तर रह रही क्रम से अजानी एक लेखक की कथानक के बिना चलती कलम सी चार पल रुक, एक पल बहती नदी की बन रवानी मैं तुम्हारे इस कथन की सत्यता स्वीकार करता अनगढ़ी अपनी कहानी गीतमय करने लगा हूँ चुन लिया अध्याय वह ही सामने जो आप आया दे दिया स्वर बस उसी को, जो अधर ने गुनगुनाया अक्षरों के शिल्प में बोकर समूची अस्मिता को तुष्टि उसमें ढूँढ़ ली जो शब्द ने आ रूप पाया जो टपकती है दुपहरी में पिघल कर व्योम पर से या निशा में, मैं उसी से आँजुरी भरने लगा हूँ रात की अंगड़ाईयां पुल बन गईं हैं जिन पलों का आकलन करती रहीं आगत,विगत वाले कलों का बुन रहे सपने धराशायी हुई हर कल्पना पर हैं अपेक्षा जोड़ती ले बिम्ब चंचल बादलों का ज्ञात होना अंकुरित नव पल्लवों का है …

समा गया तुम में

जो भी पल था मेरा अपना समा गया तुम में
शेष नहीं है पास मेरे कुछ कहने को अपना
समय सिंधु ने सौंपी थी जो लहरों की हलचल
एक आंजुरिमें संचित जितना था,  गंगाजल
मुट्ठी भर जो मेह सावनी बदल से माँगा
और हवा से आवारा सा इक झोंक पागल
पास तुम्हारे आते ही सब समां गया तुम में
नहीं रह सका पास मेरे आँखों का भी सपना
अर्जितकिया उम्र ने जितना संस्कृतियों का ज्ञान
और प्राप्त जो किया सहज नित करते अनुसन्धा दिवस निशा चेतन अवचेतनके सारे पल क्षण विश्वासों का निष्ठा का सब अन्वेषित विज्ञान
पलक झपक में यह सब कुछ ही समा गया तुम में
अकस्मात् ही घटित हो गई लगा कोई घटना

कल्पयुगों मन्वन्तर का जो रचा हुआ इतिहास पद्मनीलशंखों में बिखरी चिति बन कर जो सांस लक्ष कोटि नभ गंगाओं के सृजन विलय का गतिक्रम सूक्ष्म बिंदु सेपरे कल्पना क्षितिजों तक अहसास
जो कुछ तुमसे शुरू हुआ था  साथ समय के प्रियतम समा गया तुम में  अब बाकी कोई नहीं संरचना

व्रत रक्खे एकादशियों के

एक पुरानी परिपाटी का अन्ध अनुसरण करते करते
कितनी बार पूर्णिमा पूजीं, व्रत रक्खे एकादशियों के
था  यह ज्ञात मान्यताओं को, ये हैं गहरी सघन गुफ़ायें जहां ज्ञान का और विवेक का कोई दीप नहीं जल पाता  फ़िसल चुके हैं जो सरगम की अलगनियों पर से टूटे सुर मन का तानसेन उनको ही चुन, दीपक-मल्हार सुनाता
बरगद के मन्नत  धागों से ले पीपल के स्वस्ति चिह्न तक दो ही द्वार चुने थे हमने, जीवन की लम्बी गलियों के
पथ की ठोकर समझा समझा, हार गई आखिर बेचारी काली कमली पर चढ़ पाना रंग दूसरा नामुमकिन था रही मानसिकता सूदों के चक्रवृद्धि व्यूहों में उलझी याद रखा ये नहीं सांस को मिला मूल में कितना ऋण था
अंकगणित से बीजगणित तक खिंची हुई उलझी रेखा में रहे ढूँढ़ते समीकरण हम नक्षत्रों की ज्यामितियों के
था स्वीकारा धुंधली होती हैं दर्पण में हर परछाईं और असंभव गिरे झील में चंदा को मुट्ठी में बाँधें फिर भी आस लगाई हमने नदिया से चुन शैलखंड से किन्ही अदेशी आकृतियों से रखी बाँध अतृप्ता साधें
रहा असंभव सने पंक में पगचिह्नों के दाग छूटना ज्यों की त्यों कब रख पायेंगे चादर ओढ़ी यह, पटियों पे

इस पनघट पर तो छलकी

इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया
लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी

अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने पी डाले
नदिया के तट से भी लौटा मन हर बार अतृप्ता रह कर
उगा अगत्स्यों वाला आतुर एक मरुस्थल तप्त ह्रदय में
कितनी ही सलिलायें आयीं नभ की गंगा से बह बह कर

कितने सागर, कितने मीना गिनती जिनको जोड न पाई
रही ताकती शून्य क्षितिज पर लेकिन यह सुधियों की साकी

कल तक था संतृप्त सभी कुछ तन भी मनभो दिशा दिशा भी
छलकाती थी मधुरस पल   पल भीने  सबंधों की गागर
तट की सिकता पर रांगोली  खींचा  करता साँझ सवेरे
मुक्ता मणि के अलंकरण से पुलकित हो हो कर  रत्नाकर

इस पनघट पर तो बिखरा था दूध दही कल तक कलशों से पर उनका अब दूर दूर तक चिहं नहीं  है शेष जरा भी
दोष नही कुछ इस पनघट का, पनिहारिन पनिहारे बदले सोख लिया सारे स्रोतों को अभिलाषा की विष बेलों ने संचय की सुरसा मुख जैसी बढ़ती रही निरन्तर स्पर्धा और निगलते  रहे  पनपने  से  पहले  ही  अपने   छौने
इस पनघट पर तो पुजती थीं नारी, देव नीर भरते थे कल तक कथा सुनाया करती , दादी नानी मौसी, काकी