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Showing posts from September, 2015

एक गरिमा भरो गीत में

सरगमों की गली से गुजरते हुये रागिनी बो लो संगीत मेंशब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में
दिन के अख़बार की सुर्खियाँकाव्य होती नहीं जान लोव्यंग से तंत्र के बन्ध कोध्यान देकर के पहचान लोदूर कितना चलेंगी कहोसामने आई तुकबन्दियाँकाव्य होती नहीं जान लोराजनीतिक कसी फ़ब्तियाअँ
शब्द अनुप्रासमय छन्द के हों नहाये हुये प्रीत मेंमन के तारों को छू ले तनिक, एक गरिमा भरो गीत में
दिन ढला पीर मन में उगीओढ़नी सांझ की ओढ़कररात नींदे चुरा ले गईपास एकाकियत छोड़करये व्यथा कितनी दुहरा चुकेअब सँवारो वे अनुभूतियाँशून्य से झांकती जो रहींकोई दे पाये अभिव्यक्तियाँ
कुछ मिलन, कुछ विरह, अश्रु कुछ, फिर ना उलझो इसी रीत मेंशब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में
शब्द जो ढालते छन्द मेंअर्थ उनके समझ कर लिखोदर्पणों में बने बिम्ब सेअक्षरों में उतर कर दिखोतब ही संप्रेषणा के सिरेखुद ब खुद सारे जुड़ जायेंगेगाऒ तुम जो खुले कंठ सेस्वर सभी उसको दुहरायेंगे
चीर  देखो  भरम  दृष्टि के  फर्क दाधि और नवनीत में स्वर स्वयं आके जुड़ जाएंगे. एक गरिमा भरो गीत में

पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

शेख चिश्ती की दरगाह की जालियांजिनपे लटकी हैं मन्नत भरी डोरियांरंगभरती हुई आंख के चित्र मेंआस को नित्य झूला झुलाती हुईएक चंचल हवा का झकोरा पकड़करतीं अठखेलियाँ मुस्कुराती हुईकामना के संवरते हुए पृष्ठ ्परशब्द लिखती हैं कुछ गुनगुनाती हुईकर रही प्रज्ज्वलित नैन के गांव मेंस्वप्न के दीप ला ला के चौपाल परकुछ्ग अपेक्षायें पंकज बनाती हुईज़िन्दगी के पड़े शान्त स्थिर ताल परबरगदों पर बँधे सूत में गुंथ गईंहाथ की कोई रेखा बनी अजनबीऔर शंकाओं से ग्रस्त होने लगेपल वे असमंजसों के रहे जो कभी
द्वार अजमेर की बुर्जियों के तले  दे रही दस्तकें चंद  कव्वालियां बज रहीं सरगमों से लगा होड़ कुछ ताल पर उठ रहे हाथ की तालियां 
एक अरसा हुआ आस के व्योम में योन दिलासों की उड़ती पतंगें रही आज बीता भले घिर के नैराश्य में कल का सूरज खिलायेगा कलियाँ सभी 

रखा एक सिंदूरी पत्थर

शहर की उस वीरान गली में जहां हमारा बचपन बीता अभी तलक  पीपल के नीचे  रखा एक सिंदूरी पत्थर वो पीपल जिसने सौंपी थी उलझी हुई पतंगें हमको जिसकी छाया में संध्या में रंग भरे कंचे ढुलके थे जिसकी शाखा ने सावन की पैंगों को नभ तक पहुंचाया जिसके पत्रों की साक्षी में शपथों के लेखे संवरे थे उसकी आंखें अभी तलक भी बिछी हुई हैं सूने पथ पर शहर की उस वीरान गली में नहीं गूंजते  हैं अब पद स्वर उस पीपल की बूढ़ी दाढ़ी में उलझी सूतों की डोरी जिन्हें मन्नतों ने मावस की छतरी के नीचे बांधा था तन पर टके हुए लगते हैं धूमिल वे सब स्वस्ति चिह्न अबनत  होते शीशों ने जिनको साँझ सवेरे आराधा था
शेष नहीं है आज किन्तु अब चावल भी आधी चुटकी भर किंकर्तव्यविमूढ़ा  है मन  दिन की इस बदली करवट पर शहर की उस वीरान गली का नक्शे में भे एचिह्न न बाकीजिसमें फ़ागुन की फ़गुनाहट गाती थी निशिदिन चंगों परसंझवाती का दिया जहाँ से निशि को दीपित कर देता थामंत्रों के स्वर लहराते थे मंदिर के गुंजित शंखों परशह्र की उस वीरान गले एकी याद अचानक यों घिर आईबिना पते का पत्र डाकिया लाया हो जैसे लौटा कर

ओस की बूँद आ पंखुरी से मिले

यूँ लगा जैसे कल की परीक्षाओं केप्रश्नपत्रों के उत्तर सभी मिल गयेबीज बोया नहीं एक भी, साध कीक्यारियों में सुमन आप ही खिल गयेसाधना के बिना कोई वर मिल गयाप्रार्थना के बिना पूर्ण पूजा हुईरात की श्यामला चूनरी का सिराजड़ सितारे स्वयं आज झिलमिल हुआआप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस कीबूँद आकर किसी पंखुरी से गलेआप ऐसे मिले पूर्व की गोख मेंरश्मियाँ ज्यों क्षितिज से मिली हों गलेकल्पना ने कभी कल्पना की नहींचित्र से आप जीवन्त हो जायेंगेशब्द जितने बिखर रह गये पृष्ठ परआप ही गीत के छन्द हो जायेंगेनैन की वीथियों में भटकते हुएदृश्य बन जायेंगे स्वप्न की बाँसुरीसाध यायावरी के किसी लक्ष्य सेजुड़ गई एक अनुबंध की पाँखुरी दृष्टि के पाटलों पर घिरे जो हुएवे कुहासे सभी एक पल में ढलेआप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस कीबूँद आकर किसी पंखुरी से गलेद्वार देवालयों के खुले आप हीएक प्रतिमा स्वयं अवतरित हो गईस्वप्न ने स्वप्न में जो संजोई कभीएक घटना सुखद वह घटित हो गईबिन तपस्या उतर आई भागीरथीबिन अपेक्षा दिया सिन्धु ने रत्न लाशतगुणित सत्य बन सामने आ गयाकल्पना का तनिक जोकि अनुमान थायूं लगा पूर्व के संचयित पुण्य सब सामने आ गए एक पल में फले आ…