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Showing posts from July, 2015

रहा खींचता रह रह परदे

जोवन के इस रंगमंच पर हम  थे रहे व्यस्त अभिनय में कोई डोरी थाम पार्श्व से रहा खींचता रह रह परदे

यद्यपि बतलाई हमको थी गई भूमिका विस्तारों में और रटाये गए वाक्य वे, जो सब हमको दुहराने थे एक एक पग नपा तुला था बँधा मंच की सीमाओं में और भंगिमायें व्याख्यित थीं जिनमें शब्द रंगे जाने थे

रहा खेलता सूत्रधार पर लिए हाथ में अपने पासे उसकी मर्जी जिस मोहरे को जैसे चाहा वैसे धर दे

देता था संकेत हमें कोई नेपथ्य खडा  तो होकर रहा  निगलता बढ़ता हुआ शोर लेकिन सारी आवाजें द्रश्य  दीर्घा से ओझल हो रहे मंच के तले पंक्ति में रही  मौन की सरगम बजती सजे हुए  सारे साजों में

अंक बदलते रहे किन्तु हम परिवर्तन को समझ न पाए रहे ताकते निर्देशक कोई फिर आकर नूतन स्वर दे

प्रक्षेपण से जहां हुआ तय ज्योतिकिरण होना संकेंद्रित वहां परावर्तन करने को प्रिज्मों ने आकार ले लिया बिखरी हुई पटकथाओं के मध्य एक गति दे देने का निर्देशक ने नूतन निर्णय बिना किसी को कहे ले लिया

आतुर होकर रहे ताकते, फिर से जो अभिनीत हो सके ऐसा कोई नया कथानक फिर लाकर हाथों में धर दे

सिकता छूने में असमर्थ रह गई

झाड़े लगवाये,मजार पर चादर नित्य चढ़ाईं जाकर गंडॆ मंतर ताबीजों से सारे देवी देव साध कर तुलसी चौरे दीप जलाये, बरगद की देकर परिक्रमा दरगाहों की जाली पर रेशम के डोरे कई बाँध कर
थे निश्चिन्त मंज़िलें पथ के मोड़ों तक खुद आ जायेंगी पर पगतली राह की सिकता छूने में असमर्थ रह गई

उमड़े हुए मेघ जितने भी आये थे चल चल कर नभ में उनकी गागर रीती की रीती ही भेज सका  रत्नाकर    तॄष्णाओं को रही सींचती जलती हुई तृषा अधरों की आता हुआ सावनी  मौसम गया प्यास फ़िर से दहका कर

हवा वारुणी आईं थी तो लेकर लुटी हुई इक गठरी जली हुई कंदीलें सारी आशाओं की व्यर्थ रह गईं.

सपनों के अंकुर उग आयें बोये बीज एक क्यारी में मन की, सौगन्धों के सम्मुख सम्बन्धों से रखा सींच कर लेकिन उगीं नागफ़नियाँ ही  सभी अपेक्षायें ठुकरा कर दृश्य न बदला चाहे जितना देखा हमने पलक मींच कर

था मतभेद सारथी-अश्वों में बासन्ती मौसम रथ के सभी चेष्टायें सहमति की करते करते तर्क रह गईं

खुलते हुए दिवस की खिड़की नहीं कर सकी कुछ परिवर्तित चुरा ले गया किरणें सारी, जाता हुआ भोर का तारा संध्या ने छत पर रांगोली लेकर काजल जो पूरी थी उसका रंग बदल न पाया.चढ़ कर कोई रंग दुबारा

खिंची हुईं रेखा हाथों…

किस इंतजार में

खोयाहै किस इंतजार में असमंजस में उलझ रहे मन तू है नहीं शिला कोई भी जिस पर पड़ें चरण रज आकर विश्वामित्री साधें लेकर तूने कितना अलख जगाया अभिलाषा का दीप द्वार पर निशि वासर बिन थके जलाया यज्ञ धूम्र ने पार कर लिया छोर सातवें नभ का जाकर आस शिल्प को रहा सींचता, पल पल तूने नीर चढ़ाया डोला नहीं किन्तु इन्द्रासन सुन  कर अनुनय भरी पुकारें आई नहीं मेनका कोई तुझ पर होने को न्यौछावर अपने आप बदलती कब हैं खिंची हुई हाथों की रेखा बैठा है किस इंतजार में,होगा नहीं कोई परिवर्तन करना तुझको अनुष्ठान से आज असंभव को भी संभव तेरे द्वारे आये चल कर खुद ब खुद जय का सिंहासन लड़ कर ही अधिकार मिला करता, समझाया इतिहासों ने थक जायेगा मीत कौरवी साधों को समझा समझा कर अपनी तंद्रा तोड़ याद कर तू कितना सामर्थ्यवान है तू निश्चय करता है, सागर आकर के कदमों में झुकता तेरे विक्रम की गाथायें स्वर्णाक्षर में दीप्तिमयी हैं महाकाल का रथ भी तेरा शौर्य देखने पल भर रुकता नभ के सुमन सजाने को आ जायेंगे तेरी अँगनाई
उन्हें तोड़ने को संकल्पित ज्यों ही हो तू हाथ बढ़ाकर

यशोधरा का सन्देश और एक और पक्ष ---लौट जाओ प्यार के संसार से

इतिहास का दूसरा पक्ष --मान लें -महल से निकलने के पश्चात सिद्धार्थ प्रेम के वशीभूत वापिस आये तो उस समय यशोधरा के मन की बात:-

लौट जाओ प्यार के संसार से सिद्धार्थ अब तुम पग तुम्हारे बुद्ध बनने की दिशा में उठ गए  हैं
जानती हूँ अब न रोकेंगे तुम्हें कुन्तल घनेरे और चुम्बक बन न पायेन्गे अधर ये थरथाराते भंगिमायें नैन की जो बीन्धती थी पुष्प शर बन इक अदेखी रेख पर गिरने लगी हैं लड़कहडाते
लौट जाओ प्यार के संसार से तुम अब भ्रमित से मोह के सब पाश ढीले आज पड़ने लग गये हैं
है विदित किलकारियाँ शिशु की नहीं बाधा बनेंगी जिस डगर की डोर तुमने थाम ली यायावरी मन इक अबोधी प्रश्नचिह्नित दृष्टि लौटेगी पलट कर  पार करने में हुई असमर्थ ओढ़े आज तुम तम
लौट जाओ प्यार के संसार से अब जोगिया तुम छांव वाले वृक्ष के अब पात झरने लग गये हैं
ये समर्पण के लिये फ़ैली हुई दोनों भुजायें उर्वशी की, मेनका-रतुइ से मिली प्रतिरूप काया  दूर हैं अब यष्टि की उत्तुंग त्रिवली श्रुंखलायें ज़िन्दगी के पंथ से है दूर इनकी शांति छाया
भीरुता पूरित  पलायन, दृष्टि में सन्यास मेरी आज क्या है सत्य ? इस पर चिह्न लगने लग गये हैं
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एक और पक्ष 

है अस…