Posts

Showing posts from May, 2015

नैन बुनते रहे मोतियों की लड़ी

चांदनी  ने छुआ था नहीं कल जिन्हें
आज भी धूप से होके वंचित रहेपीर के ये निमिष थे तिमिर में उगेतो अंधेरों में मन के ही संचित  रहेहोंठ की सिसकियों को न सुर दे सकेसरगमों के हुए वस्त्र छोटे सभीकंठ कोई सजाने में असफ़ल रहानैन बुनते रहे मोतियों की लड़ीमंथनों में दिवस सिन्धु ने ला दियेशंख प्रहरों के सारे गरल से भरेजिनमें चर्चा रही थी तनिक गंध कीशब्द सारे रहे गांव से भी परेकालिमा की बिछी चादरों में घुलीअपनी परछाईयाँ से अनिश्चित रहेबन्द होकर के घड़ियों के सन्दूक मेंथे निमिष तिलमिलाते हुए रह गयेरेत के ही घरोंदे बने थे सपनइसलिये देखते ही लहर ढह गयेसीपियों को न चुन पा सकीं उंगलियाँपांव बालू की ढेरी पे टिक न सकेखूब देखा मुलम्मा चढ़ाये हुये शिल्प टूटे हुए किन्तु बिक न सके छांह में बरगदों के बनी धूनियाँतन कड़ी धूप में होते ज्वालित रहेजो बदलना नहीं था,बदल न सकाबर्फ पिघली शिखर पे न कैलाश के मान चाहे लिया था किलों की तरह स्वप्न  होकर घरोंदे रहे ताश के अपनी हठधर्मियों के घिरे व्यूह में राख चुनते हथेली पे रखते रहे आधे सावन की बीती हुई थी निशाहम संजोये हुए रंग भरते रहे शब्द आते रहे होंठ पर अनवरतअर्थ से किन्तु …

लिखे श्वेत पृष्ठों के ऊपर

लिखे श्वेत पृष्ठों के ऊपर, काले अक्षर ही निशि वासर
समय मांगता लिखें अमावस के पन्नों पर धुली चाँदनी
बैठी रहीं घेर कर हमको पल पल बढ़ती आशंकायेंयद्यपि ज्ञात हमें था वे सब की सब ही आधारहीन हैंसाहस नहीं जुटा पाये हम चीरें ओढ़ा हुआ धुंधलकारहे दिलासा देते खुद को हम तो स्थितियों के अधीन हैं
लिखते रहे श्वेत पृष्ठों पर हम फ़िल्मी गीतों की ही धुनरही मांगती सरगम हमसे हम वीणा की लिखें रागिनी
दुहराई हर उगे दिवस ने वही पुरानी एक कहानीभूख, गरीबी, व्यवसायिकता, बातों में कोरा आश्वासनइतिहासों ने कहा बदल दें हम अब तो घिस चुका कथानकलेकिन अक्षमतआओं के जाले में घिरा रहा अपना मन
लिखे श्वेत पृष्ठों के ऊपर, मूक समर्पण के हमने स्वरकहती रहीं घटायें हमसे, लिखें कड़कती हुई दामिनी
नित पाथेय सज़ा चलते हम निश्चय की बैसाखी लेकररख देंगे संध्या ढलते ही हम ज्यों की त्यों ओढ़ी चादरपूरे दिवस बना कर गठरी  उसमें बांधे निहित स्वार्थ हीदे ना सका संतोष हमें निधि अपनी पूर्ण लुटा रत्नाकर
लिखे श्वेत पृष्ठों के ऊपर, मंदिर, मस्जिद, गिरजे मठ हीकरती रही अपेक्षा वसुधा, एक बार तो लिखें आदमी !

कौन हूँ मैं

पूछने मुझसे लगा प्रतिबिम्ब दर्पण में खड़ा इककौन हूँ मैं और क्या परिचय मेरा उसको बताऊँकौन हूँ मैं? प्रश्न ये सुलझा सका है कौन युग सेऔर फ़िर यह प्रश्न क्या सचमुच कहीं अस्तित्व मेराएक भ्रम है या किसी अहसास की कोई छुअन हैरोशनी का पुंज है या है अमावस का अंधेरानित्य ही मैं खोलता परतें रहस्यों की घनेरीजो निरन्तर बढ़ रहीं, संभव नहीं है पार पाऊँमैं स्वयं मैं हूँ, कि कोई और है जो मैं बना हैऔर फिर कोई अगर मैं! तो भला फिर कौन हूँ मैंऔर यदि मैं हूँ "अहम ब्रह्मास्मि" का वंशाधिकारीतो कथाओं में अगोचर जो रहा, वह गौण हूँ मैंप्रश्न में उलझा हुआ इक किंकिणी का अंश टुटाचाहता हूँ किन्तु संभव है नहीं मैं झनझनाऊँपार मैं के दायरे के चाहता हूँ मैं निकल करदूर से देखूँ, कदाचित कौन हूँ मैं जान लूँगाऔर जो परछाईयों के प्रश्न में उलझे हुए हैंप्रश्न, उनके उत्तरों को हो सकेगा जान लूंगाहैं विषम जो ये परिस्थितियाँ,स्वयं मैने उगाई राह कोई आप बतला दें अगर तो पाअर पाऊँ

मातृ दिवस

उम्र की राह में हर किसी मोड़ पर नाम तेरा ही है पंथ दीपित करेंतेरे आशीष की बदलियाँ घिर घनी जेठ का ताप  भी पल में शीतल करे नाम का तेरे पारस पारस कर रहा शूल बिखरे हुए, फूल की पांखुरी शब्द सारे ही क्षमतारहित रह गए तेरा गुणगान जो तूल  भर भी करें

राह सूरज नहीं भूल जाये कहीं

वर्ष बीते हैं अब  गिनतियों  से  अधिककिन्तु हम रह गये हैं वहीं के वहींमोमबत्ती जला भोर रखती रहीराह सूरज   नहीं भूल जाये कहींजितने आश्वासनों ने दिलासे दियेढल गये सांझ की रोशनी की तरहछिन गई हाथ से बिन बताये हुएज़िन्दगी की रही एक जो थी वज़हदर्पणों में संवरते हुए बिम्ब सीआस छलती रही उम्र की पालकीसज़दा करते हुए एक अरमान काघिस गईं रेख लिक्खी हुई भाल कीरात भर का है तम,हम रहे सोचते रोशनी कल उगेगी यहीं पर कहींपेड़ हम बाढ़ में थे किनारे खड़ेआईं लहरें चरण धो के जाती रहीमनचली कुछ तरंगें हवा की भटकभैरवी द्वार पर गुनगुनाती रहींतय था मुट्ठी नहीं बन्द हो पायेगीइसलिये हाथ कुछ भी नहीं आ सकातार थे वीन के टूट बिखरे हुएरागिनी कोई भी कंठ गा न सकाछल गईं व्याख्यायें पुन:वे हमेंप्रश्न ही हैं   गलत और उत्तर सहीमन में सँवरे अपेक्षाओं के चित्र कोनाम भ्रम का दिया आज के दौर नेऔर फिर भाग्य का लेख नव लिख दियाशीश पर आ बिखरते हुए खौर नेमंत्र संकल्प के जो रटे रात दिन वेदियों पर कभी याद आये नहींजोकि निर्देश संगीत का दे रहेराग उनने कभी गुनगुनाये नहींआज है अनुसरित सब, जिधर एक पलहोके  अनुकूल  अपने हवायें बहीं