Posts

Showing posts from January, 2015

दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना

भाव उमड़े होंठ पर आ शब्द में लेकिन ढले नादीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले नाजो विगत था दे गया उपहार में बस प्रश्न लाकरगुत्थियों ने चक्रव्यूहों में रखा उनको सजाकरउत्तरों के भेद सारे नींद के संग उड़ गये थेऔर आगत देखकर इनको रहा हँसता ठठाकरबीज जितने बो रखे थे अंकुरित होकर फ़ले नादीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले नारख रखीं उलझाये धारायें सभी अनुबन्ध वालीज़िन्दगी ने साथ हर पग पर दिया बन कर सवालीउंगलियों को थामते हर मोड़ पर आकर अनिश्चयमुट्ठियों ने एक चुटकी भर न सिकता भी संभालीआस के प्रतिबिम्ब भी पल को मिले आकर गले नादीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले नापाँव जब आगे बढे पीछे डगर ने थाम  खींचेनींद से कर वैर सपने रह गए थे आँख मीचेमानकों ने बादलों के पंख कंधों पर उगायेछोड़ कर आकाश की गलियाँ नहीं आ पाए नीचेहो कभी अनुकूल तारे चार पग सँग चले ना दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना

प्रश्न करने लग गई निशिगन्ध

जब तुम्हारे कुन्तलों की वेणियों में फूल महके
प्रश्न करने लग गई निशिगन्ध उस पल मलयजों सेमोगरा गेंदा, चमेली, कौमुदी, कचनार जूहीऔर हरसिंगार के संग हो गुलाबों की महक भीगुलमुहर की प्राथमिक अंगड़ाईयों से अधिक मोहककौन सी यह गंध, मनमोहक सुवासों से परे भीदूब पत्ते लहर झरने  सब अधीरा उत्तरों कोकौन है उत्प्रेरणा बनता निरन्तर हलचलों पेउम्र के कस्तूरिया पल दृष्टि अपनी है झुकायेषोडसी दृग में बने पहले सपन ने आंख खोलीथरथराहट प्रथम चुम्बन की अपेक्षा में अधर कीथी ख्गिंची रक्तिम कपोलों पर प्रथम आ जो रंगोली

सब प्रतीक्षा ले खड़े हैं कोई तो संकेत आयेउद्गमों का जो पता दे मोहिनी इन कलकलों केद्वार प्राची के लहरती चूनरी अरुणिं उषा कीचाँदनी का शाल ओढ़े दृष्टि कजरारी निशा कीसब लपेटे अचरजों को एक दूजे को निहारेंनववधू की उंगलियों पर नृत्यमय होती हिना भी

पूछते सब खोलता है कौन यह अध्याय नूतनऔर लिखता नाम अपना देवपुर की सरगमों पे

होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानी

रश्मियाँ साथ ले जब दिवाकर का रथ चल दिया था इधर मुस्कुराता हुआरंग प्राची के चहरे का रक्तिम हुआ उस घड़ी जाने कैसे लजाते हुएओस ने रोशनी चूम कर छेड़ दी एक अंगडाई  लेती हुई कुछ धुनेंमंदिरों  में हुई  आरती  में   घुले कंठ के बोल फिर   गुनगुनाते  हुए===================================
हो अधीरा आस उत्सुक दृष्टि  से पथ जोहती हैं औ' प्रतीक्षा की घड़ी इक ढल गई लगता अयन में कोर पर आ होंठ के अँगड़ाईयाँ लेती कहानीमुस्कुराहट की गली में खिलखिलाती रात रानीऔर ठोड़ी से उचक कर पूछता तिल बात नथ सेओढ़ कर सिन्दूर होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानीतब नयन के स्वप्न रँग देते कपोलों को पिघल करस्वर्ण अरुणिम आभ वाली बदलियाँ घिरतीं गगन मेंभावना की कशमकश से जूझता मन वावरा साचित्र उजले पॄष्ठ पर सहसा उभरता सांवरा साझनझनाती हैं हवा की पैंजनी अंगनाईयों मेंकोई परिचय एक पल में पास आता बांकुरा साउड़ परीवाली कथाओं का कोई अध्याय अन्तिमआ अचानक रंग अनगिनती भरे जाता सपन मेंदृष्टि जाकर के परे सीमाओं के रह रह अटकतीटिक नहीं पाती किसी भी बिन्दु पर फिर फिर भटकतीगंध बिखराती प्रतीक्षा की अगरबत्ती हजारोंगुनगुनी परछाइयों की ढेर सी कलियां चटखतीं आ…

कितने दिन बीते

एक बात को ही दुहराते कितने दिन बीतेभोजपत्र पर बात वही होती आई अंकितशिल्पकार ने पाषाणों में जिसे किया शिल्पितजिसकी अर्क सुधा बरसाते मेघ कलश रीतेकविता और कहानी सबमें वह ही दुहराईसरगम ने हर एक साज पर बस वह ही गाईतुम को रहा सुनाता मैं भी वह ही मनमीतेदिवस महीने साल युगों के इतिइहासों में बन्दवह ही महका करती है फूलों में बन कर गंधजिसकी परछाईं में रहकर   भावुक मन जीतेउसी बात को बस दुहराते इतने दिन बीते