निकला कितना दूर

कोई दे आवाज़ पार्श्व से 
साध यही  बस एक थाम के 
 निकला कितना दूर 

स्वप्नलोक में जीते जीते गुजरे कितने दिन
हुई अपरिचित मुस्कानें,नयनों की हर चितवन 
लगता है बरबस जैसे  हो
कांधों पर बोझा ढोते हो 
जीने को मज़बूर  

परिचय के धागों में उलझे अजनबियत के बीज 
चढ़ते दिन के साथ उगी सुरसा मुख बन कर खीज 
कोशिश की किरचों को चुनते 
दोपहरी में सपने बुनते 
तन मन  थक कर चूर 

स्वर्णकलश  के लिए ढूंढते इन्द्रधनुष का छोर 
भटकन में ही दिवस गुजारे क्या संध्या क्या भोर 
बीती हुई याद में जीते 
संचित करते घट में रीते 
पछतावे  भरपूर 

Comments

Udan Tashtari said…
सत्य...!!

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