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Showing posts from December, 2015

सारी धरा ही आज प्यासी

घिर रहे आश्वासनों के मेघ  अम्बर में निरंतर कल सुबह आ जाएगी फलती हुई आशाएं लेकर ये अँधेरे बस घड़ी भर के लिए मेहमान है अब कल उगेगा दिन सुनहरी धुप के संग में चमक कर
दे नहीं पाती दिलासा  बात अब  कोई ज़रा भी प्राण से  अतृप्त है, सारी धरा ही आज प्यासी
वायदों के सिंधु आकर रोज ही तट पर उमड़ते और बहती जाह्नवी में हाथ भी कितने पखरते रेत  के पगचिह्न जैसी प्राप्ति की सीमाएं सारी शंख के या सीपियों के शेष बस अवशेष मिलते
ज़िंदगी इस व्यूह में घिर हो गई रह कर धुँआ सी एक कण मांगे   सुध , सारी धरा ही आज प्यासी
घेरते अभिमन्युओं को, जयद्रथों के व्यूह निशिदिन  पार्थसारथि  हो भ्रमित खुद ढूंढता है राह के चिह्न  हाथ हैं अक्षम उठा पाएं तनिक गांडीव अपना  आर  ढलता  सूर्य  मांगे प्रतिज्ञाओं   से बंधा ऋण 
आज का यह दौर लगता गल्प की फिर से कथा सी बूँद की आशा लिए सारी धारा ही आज प्यासी 
पास आये हैं सुखद पल तो सदा यायावरों से  पीर जन्मों से पसारे पाँव , ना जाती घरों से  जो किये बंदी बहारों की खिली हर मुस्कराहट  मांगती अँगनाई पुषिप्त छाँह केवल पतझरों से  किन्तु हर अनुनय विवशता से घिरी लौटी पिपासी प्यास योन बढ़ने लगी, सारी धारा है …

प्रभु अनुग्रह अपना दिखलाओ

जीवन के पथ पर जब जब भी ट्रेफ़िक लगता जाम हो गया तब तब तुमने अधिकारी बन राहों के अवरोध मिटाये गर्मी में जब कंस बन गया बिजलीघर का हर इक कर्मी तुमने तब तब इनवर्टर बन झरे पसीने सभी सुखाये
प्रभुवर तुम दर्शन देते हो, शुक्रवार को चैक रूप में अर्जी स्वीकारो मेरी तुम वही रूप धर प्रतिदिन आओ
पांव ्तुम्हारे  पल पल पूजें, तुम ही इक साकार ब्रह्म हो  महिमा ओ आराध्य हमारे, कौन बखाने किसकी क्षमता निशा दिवस अनुकूल जहाँ तुम हो कर चलते अन्तर्यामी वहाँ  तुम्हारी कृपा किये है पाँच गुना वेतन से भत्ता
एक वर्ष में चार प्रमोशन मिल जायें लल्लो चप्पो कर ओ त्रिपुरारी अपनी माया से कुछ ऐसा चक्र चलाओ
जहाँ तुम्हारा अनुग्रह होता वहाँ देवसलिलायें बहतीं उद्गम हो स्काटलेंड का या पटियाले का बहाव हो उसकी संध्यायें सजती है वेगासी कैसीनो जैसी संभव नहीं कभी संचय में उसके थोड़ा भी अभाव हो
करते हैं दिन रात स्तवन हम, ओ रोलेटटेबल के स्वामी नहीं चाह है निन्निनवें की, बस छत्तीस  गुणित करवाओ

निकला कितना दूर

कोई दे आवाज़ पार्श्व से  साध यही  बस एक थाम के   निकला कितना दूर 
स्वप्नलोक में जीते जीते गुजरे कितने दिन हुई अपरिचित मुस्कानें,नयनों की हर चितवन  लगता है बरबस जैसे  हो कांधों पर बोझा ढोते हो  जीने को मज़बूर  
परिचय के धागों में उलझे अजनबियत के बीज  चढ़ते दिन के साथ उगी सुरसा मुख बन कर खीज  कोशिश की किरचों को चुनते  दोपहरी में सपने बुनते  तन मन  थक कर चूर 
स्वर्णकलश  के लिए ढूंढते इन्द्रधनुष का छोर  भटकन में ही दिवस गुजारे क्या संध्या क्या भोर  बीती हुई याद में जीते  संचित करते घट में रीते  पछतावे  भरपूर 

अब शब्द में अमरत्व देदें

गीत ये कहने लगा है आज कुछ ऐसा लिखें हम लीक से हट कर ज़रा तो गीत को नव अर्थ दे दें
आज लिख दें दीप  के मन की व्यथा  जो प्राण देकर दूर कर पाया नहीं था तम बसा उसकी तली  में और पीड़ा फूल की जो देव के सर तो चढ़ा पर  गंध का छिड़काव कर पाया नहीं अपनी गली में
कर रही हैं वर्तिकाएँ नित्य ही   बलिदान प्रतिपल क्यों नहीं उनको पिरो अब शब्द में अमरत्व देदें 
प्रवृत्ति हम आसुरी  पर रह गए उंगली उठाये  किंतु प्रेरित हो नहीं पाये करें हम नाश उनका  आज लिख कर चेतना जो सो गई झकझोर दें हम और परिवतन  बुलाएं  सही मानों में खुशी का 
तीर की हिचकोलियों में जो उलझ कर रह गई है  आज हम उस नाव को मंझधार का अपनत्व दे   दें 
लिख रहे हैं जो समय के पृष्ठ पर विध्वंस के स्वर कृष्ण बन संहार कर दें तोड़ कर अपनी प्रतिज्ञा इक महाभारत सुनिश्चित वक्त की अंगड़ाइयां में पूर्ण कर दें पार्थ बन कर द्रोण की पूरी अपेक्षा
कर चुकी श्रृंगार कितना  लेखनी कहने लगी है अब शिराओं के रूधिर को युद्ध का कटु सत्य  दे दे