पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

शेख चिश्ती की दरगाह की जालियां
जिनपे लटकी हैं मन्नत भरी डोरियां
रंगभरती हुई आंख के चित्र में
आस को नित्य झूला झुलाती हुई
 
एक चंचल हवा का झकोरा पकड़
करतीं अठखेलियाँ मुस्कुराती हुई
कामना के संवरते हुए पृष्ठ ्पर
शब्द लिखती हैं कुछ गुनगुनाती हुई
 
कर रही प्रज्ज्वलित नैन के गांव में
स्वप्न के दीप ला ला के चौपाल पर
कुछ्ग अपेक्षायें पंकज बनाती हुई
ज़िन्दगी के पड़े शान्त स्थिर ताल पर
 
बरगदों पर बँधे सूत में गुंथ गईं
हाथ की कोई रेखा बनी अजनबी
और शंकाओं से ग्रस्त होने लगे
पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

द्वार अजमेर की बुर्जियों के तले  
दे रही दस्तकें चंद  कव्वालियां 
बज रहीं सरगमों से लगा होड़ कुछ 
ताल पर उठ रहे हाथ की तालियां 

एक अरसा हुआ आस के व्योम में 
योन दिलासों की उड़ती पतंगें रही 
आज बीता भले घिर के नैराश्य में 
कल का सूरज खिलायेगा कलियाँ सभी 

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