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Showing posts from June, 2015

लौट जाओ प्यार के संसार से

लौट जाओ प्यार के संसार से   ओ वावरे मन इस नगर में प्रीत के मानी बदलने लग गए हैं
टूट कर बिखरी हुई जन्मांतरी सम्बन्ध डोरी हो चुकीं अनुबंध की कीमत लिखे कुछ कागज़ों सी साक्ष्य में जो पीपलों कीथीं कभी सौगन्ध सँवरी हो गई हैं पाखियों के टूट कर बिखरे परों सी
इस नगर  की वीथियों में भीड़ बस क्रेताओं की है से अर्थ वालेशब्द के अब भाव लगने लग गए हैं.
जो विरासत थी हमारी प्रीत बाजीराव वाली जो लवंगी ने लिखी थी स्वर्ण वाले अक्षरों से प्रीत जिसने थे रचे इतिहास के पन्ने हजारों बीन्धते मीनाक्षी को बिम्ब के इंगित शरों
इस नगर में गल्प वाले बन गये हैं वे कथानक चिन्दियाँ होकर हवा के साथ उड़ने लग गये है
लौट जाओ प्यार के संसार से  कवि तुम धरा पर अब न विद्यापति न कोई जायसी को पूछता है गीत गोविन्दम हुयेनिष्कासिता इसकी गली से कोईराधा कृष्ण की गाथाएंसुनना झूमता है

केवल शून्य भरा नीराजन

आँखों के सूने मरुथल में घिरती नहीं कोई भी बदली  दूर क्षितिज तक बिखरा है बस, केवल शून्य भरा नीराजन 
उगता हुआ दिवस प्रश्नों के भरे कटोरे ले आता है  आते नहीं किन्तु उत्तर  के पाँव तनिक भी दहलोजों पर  घिरी कल्पना मन के पिंजरे में, रह रह कर उड़ना चाहे  पर होकर असमर्थ बिलखती है अपनी बढ़ती खीजों पर 
जहां वाटिकाएँ रोपी थी रंग बिरंगे फूलों वाली  उन्हें हड़प कर बैठ गया है पतझर का स्वर्णिम सिंहासन 
साहस छोड़ गया है दामन  लड़ते हुए हताशाओं  से अपनी परछाईं से नजरें उठती नहीं एक पल को भी  यद्यपि ज्ञात परिस्थितियों पर नहीं नियंत्रण रहा किसी का  लेकिन ये मन मान रहा है जाने क्यों अपने को दोषी 
कांप रही उंगलियां, तूलिका पर से ढीली पकड हो गई  कोरा पड़ा कैनवास सन्मुख , कैसे करें कोई चित्रांकन 
घिरती हुई  साँझ आकर के थोड़ा ढाढस दे जाती है  पीड़ा के सारे प्रहरों को निशा आएगी, पी जाएगी  ओस सुधा छिड़केगी उषा की गलियों में बरस ज्योत्स्ना  दिन की गागर सुख-खुशियों के पल ला ला कर छलकायेगी 
उगा दिवस पर नए शस्त्र से सज्जित हो कर के आता है  करता    है पीड़ाओं का फिर नए सिरे से वह  अनुवादन

नहीं कुछ फ़र्क है

नहीं कुछ फ़र्क है चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम  हो  या चाहे हो वो ईसाई  सभी का आचरण ऐसा 
किताबों में लिखी बातों के बदले अर्थ सबने ही  दिए बस नाम मरियम के, उमा के फातिमा के ही  सजा तस्वीर में केवल बता कर त्याग की मूरत  तेरा शोषण निरंतर कर  किया है बस तुझे छलनी  
नहीं कुछ फर्क है केवल जमाने को दिखावा है  जो  औरों के लिए है बस, है  खुद को आवरण कैसा ?
तुझे सम्मान दें, पूजें जनन की शक्ति फिर तेरी  जनक तू ईश की भी है , करे हम भक्ति फिर तेरी  सिखाया ये गया था  आदमी को बालपन में ही मगर सब भूल कर के कर रहे आसक्ति  बस तेरी 
नहीं कुछ फर्क है इस स्वार्थ वाली मानसिकता में   -अंधेरों में, उजाले का मिले अंत:करण  कैसा 
चलो लौटाएं रथ को काल के हम आज फिर वापस  करें" नार्यस्य पूज्यंते " प्रतिष्ठित  सीख वेदों की  रमेंगे देवता आकर उतर  कर स्वर्ग से भू पर  भरेगी रोशनी फिर ज़िंदगी में नव-सवेरों की. 
न निर्वास , न निर्वसना, न शोषण न प्रताड़ण  हो रचें भाषाएँ हम ऐसी, रचें हम व्याकरण ऐसा

केतकी वन, फूल उपवन, प्रीत मन महके

केतकी वन, फूल उपवन, प्रीत मन महके सांझ आई बो गई थी चाँदनी के बीज रात भर तपते सितारे जब गये थे सीज ओस के कण, पाटलों पर आ गये बह के कह गई आकर हवा जब एक मीठी बात भर गया फिर रंग से खिल कर कली का गात प्यार के पल सुर्ख होकर गाल पर दहके कातती है गंध को पुरबाई ले तकली बादलों के वक्ष पर शम्पाओं की हँसली कह रही है भेद सारे मौन ही रह के

संकल्पित विश्वास बहुत है

जीवन पथ पर   दुर्गमाताएं चाहे जितने  फ़न फैलाएं  साँसों के आँगन में पलता संकल्पित  विश्वास बहुत है 
अवरोधों के बाद  सफलता, फूल और कांटे राहों के  सिक्का एक सिर्फ दो पहलू यायावर ने  जान लिया है  तब से हुये  अग्रसर उसके पग अविरल उत्तर दिशि को ही  पीछे मुड़ कर नहीं देखना मंज़िल ने आव्हान किया है 
हो गंतव्य दूर कितना ही घिरा   कुहासों के आंचल  में  एक  तुम्हारी दृष्टि  प्रदर्शक , कदमों को  विश्वास बहुत है 
धूप छाँह हो, सुख या दुःख हो, निशा दिवस सब संग संग चलते  साँझ नीड पाथेय भोर में, जीवन के अविरल गतिक्रम हैं  उद्गम से ले विलय बिंदु की यात्रा कब  निर्बाध रही है  किन्तु बाँध हर एक तोड़ता निश्चयमय  गति का उद्यम हैं 
गहन निशा के अंधियारे आ कितने भी छा जाएँ क्षितिज पर  प्राची के आँगन में उगता सूरज का  आभास बहुत है 
अँगनाई में बिखरे आकर गौरैय्या के चितकबरे पर  अम्बर का विस्तार नापते फैले हुए गरुड़ के डैने  जिस अदृश्य रेखा से जुड़ते, परिवर्तित होती उद्यम से ध्वंस सहज सज जाते होकर नूतन निर्माणों के सपने 
आँखों की कोरो से चाहे जितने स्वप्न पिघल बह जाएँ  नई  कल्पनायें सजने को केवल इक मधुमास बहुत है 
अंतरमन की घाटी से जो उ…