कौन हूँ मैं

पूछने मुझसे लगा प्रतिबिम्ब दर्पण में खड़ा इक
कौन हूँ मैं और क्या परिचय मेरा उसको बताऊँ
 
कौन हूँ मैं? प्रश्न ये सुलझा सका है कौन युग से
और फ़िर यह प्रश्न क्या सचमुच कहीं अस्तित्व मेरा
एक भ्रम है या किसी अहसास की कोई छुअन है
रोशनी का पुंज है या है अमावस का अंधेरा
 
नित्य ही मैं खोलता परतें रहस्यों की घनेरी
जो निरन्तर बढ़ रहीं, संभव नहीं है पार पाऊँ
 
मैं स्वयं मैं हूँ, कि कोई और है जो मैं बना है
और फिर कोई अगर मैं! तो भला फिर कौन हूँ मैं
और यदि मैं हूँ "अहम ब्रह्मास्मि" का वंशाधिकारी
तो कथाओं में अगोचर जो रहा, वह गौण हूँ मैं
 
प्रश्न में उलझा हुआ इक किंकिणी का अंश टुटा
चाहता हूँ किन्तु संभव है नहीं मैं झनझनाऊँ
 
पार मैं के दायरे के चाहता हूँ मैं निकल कर
दूर से देखूँ, कदाचित कौन हूँ मैं जान लूँगा
और जो परछाईयों के प्रश्न में उलझे हुए हैं
प्रश्न, उनके उत्तरों को हो सकेगा जान लूंगा
 
हैं विषम जो ये परिस्थितियाँ,स्वयं मैने उगाई
राह कोई आप बतला दें अगर तो पाअर पाऊँ

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