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Showing posts from April, 2015

तुमको अंकित करना होगा

ओ अनुरागी ! आज नया यह पटल खुला जीवन पुस्तक का  इस पर इक अध्याय स्वयं ही तुमको अंकित करना होगा 

साक्षी है इतिहास समय की गति से होड़ लगा जो चलता  सिर्फ उसी के कदमों को ही तो दुलराया है  राहों ने  और उसी के मस्तक पर अभिषेक हुआ है रक्त तिलक का  उसको सहज सहेजा स्वर्णिम पृष्ठों ने अपनी बाँहों में

लगता है जो तितर बितर सा निश्चय बहती झंझाओं से  उसको अपने संकल्पों से कर में संचित करना होगा 

खड़े हुए हैं यक्ष हजारों प्रश्न सजाये चौराहों पर  कुंजी से अपने विवेक की, उनकी गुत्थी सुलझानी  है  गोला उलझे हुए सूत  का जो लगता है एक तिलिस्मी  छोर  पकड़ लो तब पाओगे, विधियां जानी पहचानी है 

पथ चुनना तुमको अनुरागी, जहां प्रतीक्षित विजय श्री है  उसकी जयमाला से खुद को तुमको सज्जित करना होगा 

नक्षत्रों की गतियां सारी बंधी हुई गुरुता के बल से  ज्ञानज्योति  की ज्वालाओं  को अपने अंतर में धधकाओ सूरज चन्दा तारे सब ही केंद्र बना कर तुम्हें फिरेंगे  अम्बर आकर चूमेगा पग, तुम मन से आवाज़ उठाओ 

मात पिता के आशीषों के साथ कामनाएं सब ही की  तुमको इनको पाँखुर कर कर पथ को रंजित  करना होगा

तेरे आशीष की बरखा की बरसती बूँदें

भोर चाहत के सुमन रोज़ खिला देती है और संध्या में निखरती हैं पंखुरिया सारी तेरे आशीष की बरखा की बरसती बूँदें मेरे आँगन को बना देतीं गंध की क्यारी ज़िंदगी दीप है बाती है आत्मा माना किन्तु मैं फिर भी अँधेरे में भटक जाता हूँ होंठ को शब्द दिए कंठ को स्वर सौंपा है और ये ज्ञात नहीं मुझको मैं क्या गाता हूँ तेरे इंगित की कड़ी जब भी जुडी है स्वर से गीत आकर के स्वयं होंठ पे खिल जाते हैं तेरे अनुग्रह की किरण छूती है सरगम को जब अर्थ रागिनियों को कुछ और भी मिल जाते हैं तेरे संकुल के बिना कुछ भी नहीं है संभव तू तो तिनके को बनाता है शैल से भारी तू ही चेतन है, चेतना है तू ही प्राणों में बोल बोले हैं, अबोले हैं  प्रार्थनाओं के गन्ध का बन के मंत्र बसती है तू ही उनमें फूल जितने भी सजे तेरी अर्चनाओं के तेरा विस्तार अनत, सूक्ष्मतर अणु से है हर चराचर  में निहित एक तेरी परछाई तू ही वाणी है, स्वर है और तू ही है भाषा शब्द कोशों का सूत्र, तू ही तो अक्षर ढाई प्राणदायक है सुधा का तू निरंतर निर्झर प्यास ले प्यासा तू ही एक समन्दर खारी मैं तुझे बाँध सकूं शब्द में,अक्षम हूँ मैं तू है शब्दों से परे दूर हर इक भाषा के भाव के एक ही पल में तू सम…

वाशिंगटन में ऋतु परिवर्तन

हटा रजाई हिम की, खोले आँखें दूब छरहरी 
यौवन की अंगड़ाई लेकर जागी धूप  सुनहरी  नदिया की लहरों ने छाई तंद्राओं को तोड़ा  तम गठरी में छुपा, लगा जलते सूरज का कोड़ा  बगिया में नन्ही गौरैया फुदक फुदक कर गाई  भागा शिशिर और आँगन में बासंती ऋतु  आई 
दी उतार नभ ने ओढ़ी थी चादर एक सलेटी और ताक पर रखी उठा अपनी शरदीली पेटी किया आसमानी रंगत में कुरता रेशम वाला रंग बिरंगे कनकौओं को आमंत्रण दे डाला पछ्गुआ ने पथ छोड़ा , लहरी आकर के पुरबाई भागा शिशिर और आँगन में बासंती ऋतु  आई
टायडल बेसिन पर चैरी के फूल नींद से जागे हटे सभी पर्यटन स्थलों से निर्जनता के धागे यातायात बढ़ा जल थल का और वायु के पथ का और वाटिका के फूलों में रंग पलाश सा दहका पाँच बजे से पहले छाती प्राची में अरुणाई भागा शिशिर और आँगन में बासंती ऋतु  आई

पर कोई आवाज़ न गूँजी

असंमंजस में लिपट रह गया मन का निश्चय और अनिश्चय कहाँ जतन कर राह बनाये, राह नहीं कोई भी सूझी घुँघरू ने भेजे वंशी को रह रह कर अभिनव आमंत्रण  सम्बन्धों की सौगन्धों की दोहरा दोहरा याद दिलाई प्रथम द्रष्टि ने जिसे लिख दिया था मन के कोरे कागज़ पर लिपटी हुई प्रीत की धुन में वह इक कविता फिर फिर गाई खुले अधर की देहलीजों पर अटके हुए स्वरों ने चाहा कितनी बार शब्द को थामें, पर कोई आवाज़ न गूँजी फूल कदम  के तले बिछाये रहे गलीचा पँखुरियों का सिकता अभ्रक के चूरे सी कोमल,हुई और चमकीली आरोहित लहरों ने पल पल  तट तक आकर दस्तक दी थी हुई सांवरी डूब प्रतीक्षा में अम्बर की छतरी नीली पलक बिछा कर स्वागत करता बाँहो को फ़ैलाये मधुवन लालायित था पग छूते ही सहज लुटा दे संचित पूँजी गोकुल से बरसाने तक था नजरें फ़ैलाये वृन्दावन दधि की मटकी एक बार भी मथुरा के पथ पर न फ़ूटी छछियायें ले भरी छाछ की बाट जोहती थीं छोहरियाँ नाच नाचती जो कामरिया औ लकुटी, जाने क्यों रूठी पायल रही आतुरा थिरके, धुन पर बजती  बाँसुरिया की कालिन्दी तट की निर्जनता, सूनेपन से प्रतिपल  जूझी
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