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Showing posts from December, 2014

नए वर्ष के हे नव सूरज

आओ जीवन के नवल वर्षनव आशा से झोली भर दो दो बरसों से छाये तिमिरांचल को दे प्रकाश  दीपित कर दो 
जो अपनी संकीर्ण प्रवृति के हाथों बने हुए कठपुतली दूजों के इंगित पर निशिदिन नाच रहे हैं बन कर तकली उनके अंधियारों को अपने  ज्योतिदान से करो प्रकाशित ताकि नहीं हो पाये फिर से उनके मन में तम आयातित 
नये वर्ष के नव पंछी को नया व्योम देकर नव पर दो 
निश्चित जीवन के नवल वर्षयों फूल उगाओ आँगन मेंरंजित हो नहीं रक्त से इकभी पृष्ठ तुम्हारे दर्पण मेंसामन्ती अभिलाषाओं कीसंस्कृतियाँ सभी समूल मिटेंसौहार्द्र द्वार पर पुष्पित होसमृद्धि शांति चहुँ और दिखे
आकाँक्षा कोटि ह्रदय की यजइस बरस, वर्ष पूरी कर दोस्वागत जीवन के नवल वर्षअभिषेक तुम्हारा अक्षय हो
करते अपने इन सपनों काश्रुंगार वर्ष बीते कितनेआंखों में बही उतरते हैंअब आकर के दूजे सपनेइस बार नई कुछ साध नहींखाली झोली फ़ैलाते हैंबूढ़ी होने को आई हैंवे ही आशा दुहराते हैं
अपना मधुकलश तनिक छलकादो बूँ आंजुरी में भर दोस्वागत! जीवन के नवल वर्षसुख कोष  तुम्हाराअनवर हो
फिर करो अंकुरित नवल वर्षस्वर्णिम इतिहासों की वर्णितअलकापुरोयों के एप्रतिकृतियाँहों गली गांव आकर सज्जितपीड़ा के स…

शब्द मेरे पास होते

शब्द मेरे पास होते एक मुट्ठी से अधिक तोगीत मैं क्रम से लगा कर आपको मैं भेंट करताशब्द जिनको मैं कहूँ अपना, सभी हैं उंगलियों पेऔर दोहराते रहे हैं चन्द वे बातें पुरानीएक पीपल,एक बरगद,एक पनघट, एक अँगनातीर पर सुधि की नदी के गमगमाती रातरानीशब्दकोशों से छुड़ाकर हाथ जो आ पाये मुझ तकबस उन्हीं से रात दिन मैं बैठ कर हूँ बात करताचाह तो हर रोज मेरा कोष संचय का बढ़े कुछऔर नूतन शब्द मेरे पास आयें बैठ जायेंसुर कोई भी जो उभर कर कंठ  से आये अधर तकबस उन्हीं को गीत कर दें और झूमें गुनगुनायें टूट जाता हर घड़ी पर स्वप्न बनने से प्रथम हीताक पर किरचें उठा कर मैं सदा चुपचाप रखताआपके जो पास हैं वे भी मुझे अक्सर लुभातेकिन्तु मुझको ज्ञात है विस्तार अपनी झोलियों काजानता हूँ मिल गये तो साध रखना है असम्भवहै नजर अटकी निरन्तर राह तकती बोलियों का भावना के सिंधु में लहरें उमड़ती है निशदिन सोख लेती है सभी, अभिव्यक्ति की लेकिन विफलता

सृजनकार का वन्दन कर लें

आज सिरज कर नव रचनायें  सृजनकार का वन्दन कर लें
और रचेता के अनगिनती रूपों काअ भिनन्दन कर लें
चित्रकार वह जो रंगों की कूची लेकर दृश्य  बिखेरेनाल गगन पर लहरा देता सावन के ला मेघ घनेरेबगिया के आँगन में टाँके  शतरंगी फूलों की चादरशून्य विजन में जीवन भर कर नई नई आभायें उकेरे
उस की इस अपरिम कूची को  नमन करें हम शीश नवाकरआओ कविता के छन्दों से सृजनकार का वन्दन कर लें
शिल्पी कितना कुशल रचे हैं ऊँचे पर्वत, नदी नालियाँचम्बल से बीहड़ भी रचता, खजुराहो की शिल्पकारियाँमीनाक्षी, कोणार्क, सीकरी, ताजमहल यमुना के तट परएलोरा की गुफ़ा , अजन्ता की वे अद्भुत चित्रकारियाँ
उसके जैसा शिल्पी कोई हो सकता क्या कहो कहीं भीएक बार फिर उसको सुमिरन करते अलख निरंजन कर लें
सृजनकार वे जिनने सिरजे वेद पुराण उपनिषद सगरीवेदव्यास, भृगु, वाल्मीकि  औ सनत्कुमारी कलम सुनहरीसूरा-मीरा, खुसरो,नानक, विद्यापति, जयदेव, जायसीतुलसी जिसने वर्णित की है अवधपति के हाथ गिलहरी
उनके पदचिह्नों पर चल कर पा जाये आशीष लेखनीमहकायें निज मन का आँगन, सांस सांस को चन्दन कर लें

उम्र की शाख से पत्र झरते रहे

वृक्ष तो छाँह के शेष सब होगयेउम्र की शाख से पत्र झरते रहेहम भटकते हुए स्वप्न ले नैन मेंसांझ से भोर की बात करते रहेरात दिन ढूँढ़ते रह गये वे निमिषजो हथेली में आकर रुके थे नहींज़िद के पीपल घनेरे खड़े द्वार परटूट कर गिर गये पर झुके थे नहींमुट्ठियों में समर्पण रखा बन्द हीखोलने का नहीं हमसे साहस हुआचाह हर पल पली जीत की चित्त मेंपर न पासे उठा खेल पाये जुआमंज़िलें जो जुड़ीं थी अपेक्षाओं सेउनके पथ में कदम रखते डरते रहेसाँस सहमी रही द्वार पर आ खड़ीहो गई थी स्वयं आके जब चाँदनीशोर का भ्रम हुआ हर घड़ी जब बजीगुनगुनाती हुई मोहिनी रागिनीसूर्य तपता मरुस्थल का आ शीश परएक अहसास यह घेर रखे रहास्वर था असमंजसों में घिरा रह गयाचाहते थे मगर शब्द इक न कहारंग छू न सके तूलिका के सिरेऔर हम रंग बिन रंग भरते रहेबाँध ली लाल बस्ते में जब सांझ नेधूप, उस पल दुपहरी की की कामनाथे शुतुर्मुर्ग से मुँह छिपाते रहेहम चुनौती का कर न सके सामनाहम  बताते स्वयं को युधिष्ठिर रहेअश्वत्थमा हतो फिर भी कहते रहेअपना आधार कुछ था नहीं इसलियेजो भी झोंका मिला,साथ बहते रहेपंथ आसान था पर हमारे कदमठोकरें खाते,गिरते संभलते रहेजानते थे कि कुछ चाहिये …

ज़िंदगी की वाटिका में

ज़िंदगी की वाटिका में  चाह तो रोपे निरन्तरतुलसियों को मंजरी पर उग रहीं हैं नागफ़नियाँनीर तट अभिमंत्रिता सौगन्ध से सींचा निशा दिनबाड़ कर सम्बन्ध की बिलकुल अछूती डोरियों सेपल्लवन को छाँह में फ़ैलाईं पलकों की बरौनीऔर सौंपा लाड़ प्रतिपल सरगमी कुछ लोरियों सेपर अपेक्षित पाहुनों के पांव अब तक उठ ना पायेताकते कितना रहे हम शून्य पथ पर टाँक अंखियाँनील नभ की वादियों में है विचरता मन पखेरू बादलों के पंख फैलाये हवा की झालरों पर बांह में भर कर धनक के रंग की आभाएँ अद्भुत ढूंढता विश्रांति के पल धूप वाली चादरों पर पर ठगी मौसम लुटेरा घात कर बैठा डगर पर हो गईं अपनी यहां के मोड़ पर हर राहजनियाँ रह गये बुनते घरौंदे याद के सैकता कणों सेनैन वाली जाह्नवी की धार में निशिदिन भिगोकरदूर होकर के लगाई जो विगत ने, अड़चनों सेहै सजाते मौक्त मणियों से जड़े सपने पिरोकरपर ना जाने कौन अपनी उंगलियों के इंगितों सेकाँच के टुकड़े बना देता,सजाईं हीर कनियाँ