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Showing posts from November, 2014

गंध में भीगे हुए हैं

ज़िंदगी की वाटिका में जो हुए सुरभित निशा दिन 
वे सभी पल मित्रता की गंध में भीगे हुए हैं 


कर समन्वय नित्य  ही सौहार्द्र के स्वर्णिम क्षणों से जोड़ते है तार अपने मुस्कुराती वीथियों से बांधते हैं डोरियाँ नव सोच की बुन  कर निरंतर तोड  कर सम्बन्ध जर्जर रूढिवाली रीतियों से 

बन गए थाती संजोई जो नहीं अक्षुण्ण होती चाहे घट अनगिन निधी के शेष हो रीते हुए हैं 

जो जुड़े संदीपनी आकाश की परछाईयों मेंसूर्या  अंशित से जुड़े कुरुराज के सम्बन्ध गहरेपार्थ से जुड़ कर सहज वल्गायें थामी उंगलियों मेंऔर किष्किन्धाओं पर जुड़ कर स्वत: ही पाँव ठहरे

इन सुगम अनुभूतियों की जब छलकतीं हैं सुधायेंयाद के पुलकित हुयें पल अब उन्हें पीते हुये हैं

मोड़ पर आ ज़िन्दगी के दृष्टि मुड़ कर देखती हैसामने आते करीने से लगे घटनाओं के क्रमसिर्फ़ कुछ दिखते निरन्तर स्वर्णमंडित मित्रता सेशेष पर केवल चढ़ा अपनत्व का  थोपा हुआ भ्रम


हाथ की रेखाओं में भी बन गये रेखायें गहरीबस वही पल मित्रता के, शेष बस बीते हुये हैं.

आओ दीप वहाँ धर आयें

सूरज अस्त हो गया तो क्या, आओ सूरज नया उगायेंनई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयेंसंध्या का दीपक आगे बढ़ फिर ललकारे स्वत्य तिमिर कापाषाणों  में  सहज आस्था रख दे फिर से प्राण घोल कर गूँजे नाद व्योम में छाई निस्तब्धतायें घनी तोड़ कर और गंध बिखराती जाये, अपना घूँघट  कली खोल कर आओ हम-तुम कविताओं से एक नया अध्याय रचायेंनई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयेंआशाओं के मुरझाये फूलों में फिर से भरे चेतनाबुन लें टूटे हुये स्वप्न को कात कात कर नई दुशालाऔर बूटियाँ टाँकें उसमें  सोनहरे सुरभित आगत कीबन कर पारस करें सुधामय, बहती हुई वज़्र सी हालाआओ ऐसा जतन करें हम, फिर जमना तट रास रचायें नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें
एक दृष्टि का भ्रम ही तो है लगता सूरज अस्त हो गयाआओ उठें नजर का अपनी हम विस्तार अनन्ती कर लेंजहाँ शीश पर टंक  जाने  को अनगिन सूरज लालायित हैं उन्हें सजा कर, हारे मन को हम अपना सहपंथी कर लेंसूरज अस्त हो गया ? अपनी आँजुरि से छिटकायें प्रभायेंठोकर खाये नहीं दूसरा कोई, चलो दीप धर आयेंहम वसुधा के रहे कुटुम्बी, संस्कृतियों ने सिखलाया हैहमको सह पाना मुश्किल है किसी आँख में छल…

एक यह विश्वास पलता भी ढहा

जानते परिणति बुझेंगे अंतत:दीप फिर भी सांझ में जलते रहेझोलियाँ खाली थीं खाली ही रहींऔ हथेली एक फ़ैली रह गई हाथ की रेखाओं में है रिक्तताएक चिट्ठी चुन के चिड़िया कहगईचाल नक्षत्रों कीबदलेगी नहींज्योतिषी ने खोल कर पत्रा कहादिन बदलते वर्ष बारह बाद हैंएक  यह विश्वास पलता भी ढहापर कलाई थाम कर निष्ठाओं कीपाँव पथ में रात दिन चलते रहे
भोर खाली हाथ लौटी सांझ कोचाह ले पाए बसेरा रात सेदोपहर ने लूट थे पथ में लिएवे सभी पाथेय  जो भी साथ थेधूप का बचपन लुटा यौवन ढलाएक भी गाथा न लेकिन बन सकीरिस रही थी उम्र दर्पण देखतेअंततोगत्वा विवश हारी थकी
एक लेकर आस लौटेंगे सुबह

आज दीपक राग गा लूँ

मिट रहे हैं पावसी काली घटाओं के अँधेरे आज प्राची में उषाकी  ओढनी  लहरा रही है आज फिर चढने लगी है धूप दिन की सीढ़ियों पर ऑज अधरों पर तुहिन को इक कली मुस्का रही है आज मैं  अपने हृदय के संशयों के भ्रम मिट लूँ दूर हों अवशेष तम के, सूर्य आँगन में उगा  लूँ आज दीपक राग गा  लूँ अस्मिताएं जो गईं  थी खो, नया अब अर्थ पाएं दीप  की लडियां उदित हों और फिर से झिलमिलाएँ ओढ़ शरदीली शरद की धुप का कम्बल सुकोमल नाचने लग जाएँ आँगन में उतर   कर के विभाएँ छेड़ कर कुछ थिरकनें मैं रश्मियों के साज पर अब सोचता हूँ प्रीत की मादक धुनें फिर से बजा लूँ आज दीपक राग गा लूँ उठ रहे संकल्प गंगा के तटों पर डुबकियाँ लेभोर सोते से उठाती आरती की मंत्रध्वनियाँअब नई निष्ठायें ले विश्वास की पूँजी मुदित हैंखोल कर बाँहें खड़े हैं स्वागतों को द्वार गलियाँआ रही पुरबाई लेकर पत्र जो वृन्दावनों केसोचता हू आंजुरि में किस तरह सारे संभालूँआज दीपक राग गा लूँझर रहे हैं कल्पतरुओं से सुमन सब अदबदा करअल्पनायें खींचती हैं नव अजन्तायें क्षितिज परगन्ध पीकर कुंज वन की लड़खड़ाते कुछ झकोरेधूम्र सा लहरा रहा है बांसुरी का गूँजता स्वरजो निराशा के कुह…