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Showing posts from September, 2014

सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई

रह गए सूने पुन: सारी दिशाओं के झरोखेरश्मियों ने दी नहीं दस्तक कोई वातायनों पेडोरियों ने बरगदों से लहर कर सन्देश भेजेवे सिमट कर रह गए भटकी हवा के अंचलों पेऔर मैं टूटी हुई इक साध के टुकडे उठाकरदीप कोई जल सके ये कामनाएं कर रहा हूँझर  गए दिनमान सूखे, वर्ष की शाखाओं पर सेआगतों के झुनझुने के स्वर नहीं देते सुनाईउड़  गई कर कोष रीता सावनी हर एक बदरीआरसी की धुंध में छवियाँ संवरती जा समाई और मैं सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोईतरुतले पत्थर बना ये लालसाएं कर रहा हूँ घुट रहीं मन में अपेक्षाएं हजारों  ढेर बन करफ़ड़फ़ड़ाने  के लिए भी पर कोई बाकी नहीं है उम्र की बालू खिसकती मुट्ठियों में से समय की दृष्टि में उपलव्धि कोई भी समा पाती नहीं है जल चुकी है जो अगरबत्ती, उसी की राख ले मैं गंध के अवशेष पर आराधनायें कर रहा हूँ अर्थ अपना खो चुके संकल्प के उद्यापनी पल हर कथा का सामने आ लग गया है  तथ्य  खुलने संस्कृतियों की धरोहर मान कर रक्खी हृदय में संशयों के घोल में वह लग पडी है आज घुलने और मैं क्षत हो चुके इक ग्रन्थ के पन्ने  बटोरे रूप नव पा जाऊं ये संभावनाएं कर रहा हूँ

भाग्य रेख में कुछ संशोधन

ओ अनामिके जब से तेरा नाम जुड़ा मेरे अधरों सेउस पल से मन के सब गहरे भावों का हो गया विमोचन लगीं गूँजने सुधि के आँगन, लैला शीरीं हीर कथायेंगुलमोहर के साथ दुपहरी निशिगंधा को ला महकायेंबरखा केबून्दों से मिलकर गूँज उठे सरगम के सब स्वरऔर सितारों की छाया में गीत सुनाने लगीं विभायेंओ संकल्पित! जब से तेरा नाम जुड़ा है संकल्पों सेउस पल से लगता जीवन को मिला और कुछ नया प्रयोजनहुई पुन: जीवन्त लवंगी के सँग कथामयी मस्तानीसंयोगिता,सुभद्रा,रुक्मिणी और सती की प्रेम: कहानीदेवलोक का त्याग उर्वशी करती डूब भावना जिसमेंवैसी ही भावना अचानक लगी मुझे जानी पहचानीओ समर्पिते ! जब से तेरा मूक समर्पण महसूसा हैतब से स्वर्णिम आभाओं से दीप्त हुए हैं मेरे लोचनलिखे गये अध्याय स्वत: कुछ नये ज़िन्दगी की पुस्तक मेंबहती हुई हवाओं ने लीं पीपल की छाया में कसमेंजुड़े करों में झरे गगन से अभिलाषा के सुमन अनगिनतफिर से गहरी हुईं देवयानी ने जो जोड़ी थीं रस्मेंसजलतूलिके ! छू ली तूने जबसे मेरी खुली हथेलीतब से मेरी भाग्य रेख में हुए अनूठे कुछ संशोधन

बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी

आज अचानक एक पुरानी  पुस्तक सेसूखी हुई फूल की पांखुर फिसल पडी इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों मेंबाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी
यौवन की देहरी पर जब थी उम्र चढीस्वप्न नयन के सभी हुए थे सिंदूरीउड़ने लगी पतंगें बन कर आकांक्षा सिमट गई नभ से मुट्ठी तक की दूरीमन के वातायन में गाती थी कोयल राजहंस के पंख उँगलियों पर रहतेअभिलाषा सावन सी झड़ी   लगाती थी और उमंगो के झरने अविरल बहते 
वे पल जब निश्चय नव होते थे प्रतिदिनडगर चूमने पांवों को खुद  निकल पडीइन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल
कोई शब्द होंठ को आकर छूता थाअनजाने ही गीत नया बन जाता थामन संध्या की सुरभि ओढ़ महकी महकी बना पपीहा मधुरिम टेर लगाता था बिना निमंत्रण रजनी की उंगली पकडेतारे सपने बन आँखों में आते थेऔर चांदनी के झूले पर चढ़ चढ़ करनभ गंगा के तट को जा छू आते थे

चित्र अजन्ता के बाहों में भर भर करएलोरा में टांगा करते घड़ी घड़ीइन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी
कोई पत्र द्वार तक जब आ जाता थाचढ़ा डाकिये की खाकी सी झोली मेंलगता था कहार कोई ले आया हैबिठला नई नवेली दुल्हन डोली में खुले पत…

कर दी है हड़ताल आजकल

भाव शब्द में जब ढलते हैं, तब तब गीत नया बन जातालेकिन मेरे भावों ने तो कर दी है हड़ताल आजकलगति का क्रम कोल्हू के चारों ओर चल रहे बैलों जैसापरिवर्तन की अभिलाषा के अंकुर नहीं फूट पाते हैंहाथ उठा कर दिन का पंछी करे भोर की अगवानी कोउससे पहले लिये उबासी निमिष पास के सो जाते हैंसिक्के ढाल ढाल किस्मत के, बदले थी जो विधि का लेखालिये हाथ में कासा फ़िरती चाँदी की टकसाल आजकलरोज क्षितिज की दहलीजों पर सपनों की रांगोली काढ़ेचूना लिये दिवस का, गेरू सांझ उषा के रंग मिला करलीपा करती है अम्बर की अंगानाई को आस घटा सेऔर शंख सीपियां चमकती बिजली के ले अंश सजा करभ्रमित आस की दुल्हनिया का यह श्रंगार सत्य है कितनाकल तक जो बहले रहते थे, करते हैं पड़ताल आजकलबदल रहे मौसम की अँगड़ाई में सब कुछ हुआ तिलिस्मीपता नहीं चलता आषाढ़ी घटा कौन  सी बरस सकेगीहर इक बार बुझे हैं दीपक अभिलाषा के किये प्रज्ज्वलितकिसे विदित है  द्रवित-प्यास इस मन चातक की कहाँ बुझेगीजब से सुना हुआ दिन फ़ेरा करती यहाँ समय की करवटजो मिलता कहता है पूरे होगये, बारह साल आजकल

लगी है हवा प्यार के गीत गाने

छनी बादलों की झिरी में से किरणेंलगीं घोलने नाम तेरा हवा मेंपिरो कर जिसे पत्तियों के सुरों मेंलगी है हवा प्यार के गीत गानेमचलते हुए नाव के पाल चढ़ करसुनाने लगी सिन्धु को वह कहानीपरस मिल गया नाम के अक्षरों कामहक थी उठी दोपहर रात रानीखिले थे  कमल रात के आंगनों मेंउतर आ गये थे धरा पे सितारेतेरे नाम सुन सोचता शशि रहाथा  तुझे  देखे या फिर  स्वय़ं को निहारेअधर के पटों से रही झांकती थीतेरी दूधिया जो खिली मुस्कुराहटउसे अपने सिर पर बना कर के आंचललगी रात को चांदनी खिलखिलानेजगी नींद से कोंपलों की पलक परनये चित्र खींचे हैं पुरबाईयों नेकिनारों को सोने के घुंघरू की खनखान सुनाई तरंगों की शहनाईयों नेघटा से पिघल   गिर रही, पी सुधा कोलगी पंखुरी पंखुरी मुस्कुरानेबजी जलतरंगों का आरोह छूकरतटी दूब भी लग पड़ी गुनगुनानेउठा छोड़ आलस के प्रहरों को मौसमरखी अपने कांधे पे कांवर बसन्तीकि जिसमें रखे छलछलाते कलश सेहुए भीग पल और भी कुछ सुहानेउड़ी गंध की चूड़ियोंको पहन करलगी झनझनाने क्षितिज की कलाईसजा कर जिसे सरगमों में गगन नेनयी प्रीत की इक गज़ल गुनगुनाईतेरा नाम सारंगियों के सुरो मेंढला तो लगीं नॄत्य करने दिशायेंतेरा …