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Showing posts from August, 2014

मेरी अंगनाई भी हो गयी सन्दली

आपके कुन्तलों की गली से चलाएक झोंका हवा का मचलता हुआमेरी दहलीज का जो सिरा छू   गयाद्वार अंगनाई सब हो गये संदलीझूम कचनार फिर मुस्कुराने लगीऔर गेंदा पलाशों सरीखा हुआचम्पा जूही से रह रह लगी पूछनेबेला दिन में है महका, कहो क्या हुआरंग ओढ़े गुलाबी चमेली खड़ीनरगिसी फूल भी लग गये झूमनेमोगरा, मोतिये की पकड़ उंगलियांआप अपनी हथेली लगा चूमनेपूरा मधुबन गली में उतर आ गयाबाग में और भी मच गई खलबलीइक लहर धार को छोड़कर तीर परआ गई प्रश्न लेकर नयन में नयेपारसी स्पर्श कैसे मिला है इसेवैसे झोंके यहां से हजारों गयेआपका नाम लिक्खा हुआ पढ़ लियातो स्वयं जलतरंगें बजाने लगीतीर पर दूब भी लग गई झूमनेताल देती हुई गुनगुनाने लगीनाव पतवार से बात करने लगीक्यों फ़िजा में घुली मिश्रियों की डलीराह चलती ठिठक कर खड़ी हो गईमोड़ से लौट आई पुन: द्वार परमौसमों की शरारत का कोई जिकरथा हुआ ही नहीं आज अख बार परआपका चित्र देखा हवा पर बनाबादलों से कहा साथ उसके चलेंबून्द से नाम अंकित करें आपकारश्मियां पूर्व इसके क्षितिज में ढलेंएक पल में लगा पूर्ण वह हो गईआस जो थी ह्रदय में युगों की पली

हाथ की खाली सुराही

द्रष्टि का आकाश मेरे सामने रीता पडा हैऔर पीछे पंथ पर है चिह्न कोई भी न बाकी उँगलियों के बीच में से सब फिसल कर गिर गए हैंवे समय की रेत के कण जो कभी अपने कहे थेजब चढ़े गिरि श्रूंग पर देते चुनौती गगन को थेऔर गतिमय हो समय की धार से आगे बहे थे किन्तु अब इस मरुथली वातावरण में हर कदम पर नैन रह रह देखते हैं हाथ की खाली सुराही गूंथ कर रक्खी हुई थी परिचयों की डोरियाँ जोखुल गई हैं टूट कर धागे हुई छितरा गई हैं आईने के मैं शून्य में से मौन रह रह चीखता हैउंगलियाँ जो मुट्ठियों में थीं,सभी बिसरा गई हैं और आवारा भटकती साध आतुर हो निरंतरलौट कर के थामती है आप ही अपनी कलाई हाथ की रेखाओं ने आकार जितने भी बनाए रंग की अनुभूतियों से रह गए होकर पर वो बाढ़ में उफनी नदी में बह रही है तृण सरीखीज़िंदगी को देखता है मन विवश तट पर खड़े हो चित्र बन सजने लगी हैं सामने आकर क्षितिज पर वे ऋचाएं जो अधर ने एक पल न गुनगुनाई

रूप की धूप --------चाहे कुछ हो लिखी इबारत

रूप की धूपआपके रूप की धूप को चूम कर और उजली हुईं रश्मियाँ भोर कीआपका स्पर्श पा गूँजने लग गई आप ही बाँसुरी श्याम चितचोर कीआपके कुन्तलों की घटायें घिरीं सावनी हो उमंगें लगी झूमनेआस ऐसा लगा पूर्ण होने लगी, बिन लगाये हुए आस मनमोर की*********************** चाहे कुछ हो लिखी इबारतबहती हुई हवायें आकर जब छूती हैं मेरी बाँहेंस्पर्श तुम्हारी उंगलियों के सहसा याद मुझे आते हैंऔर मचलने लगते हैं वे आ आ कर अधरों पर मेरेकलियों की गलियों में भंवरे जो भी  गीत गुनगुनाते हैंओ शतरूपे, जब भी पढ़ता हूँ किताब मैं कोई खोलेनाम तुम्हारा बन जाती है, चाहे कुछ हो लिखी इबारतनयनों की झीलों में तिरती हैं जो अक्षर की नौकायेंउनके पालों पर रँगती हैं चित्र लहर होकर प्रतिबिम्बितकिरन दॄष्टि की बनकर कूची जब उनको सहलाने लगतीअनायास ही नाम तुम्हार हो जाता उन सब में  शिल्पितमॄगनयने  ! इक धनुर्धरी के लक्ष्य् भेद के बिन्दु सरीखानाम तुम्हारा थामे रहता है मेरी सुधियों की सांकलसंध्या की देहरी पर आकर ठहरी है जब  निशा उतरतीऔर क्षितिज के वातायन से तारे जब झांका करते हैंउस पल उमड़े हुए धुंये की बलखाती हर परछाईं मेंजितने भी आकार उभरेते नाम …

मौसमों के पाँव नर्तित-गीत कलश पर छहसौवीं प्रस्तुति

शब्दकोशों में समन्वित सब विशेषण रह गए कम रूप को सौंदर्य को नव अर्थ तुम दे जा रहे हो चेतना के पल हुए सब देख कर तुमको अचंभित भावना के उडुग भटके जो अभी तक थे नियंत्रित आस की रंगीन कोंपल लग गई उगने ह्रदय मेंकल्पना छूने  लगी विस्तार वे जो हैं अकल्पितऔर विस्मय लग गया रह रह चिकोटी काटता सास्वप्न  है या सत्य मेरे सामने तुम आ गए हो ढल गया है शिल्प में ज्यों  एक सपना भोर वाला भर गया अँगनाई में  शत चंद्रमाओं का उजाला पांव चिह्नों से गगन पर बन गई हैं अल्पनाएं हर्ष के अतिरेक से ना हर्ष भी जाए संभाला चाहता हूँ गीत लिख कर मैं नये अर्पण करूँ  कुछशब्द के हर रूप में पर सिर्फ तुम ही छा रहे हो
कौन सी उपमा तुम्हें दूं, हैं सभी तुमसे ही वर्णितजो हुआ परिभाष्य तुमसे  हो गया है वह समर्पितअक्षरों को भाव को तुम रूप देती रागिनी को छवि तुम्हारी देख होते मौसमों के पाँव नर्तित देवलोकों से धरा तक ओढनी  फ़ैली तुम्हारी  जन्म लेती हैं हवाएं तुम इसे लहरा रहे हो