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Showing posts from July, 2014

दॄष्टि का स्पर्श अब तक मिला वो नहीं

खटखटाता रहा द्वार इतने बरसमैं, तुम्हारे ह्रदय का खुला ही नहींहोंठ पर गीत बन कत्र मचल जाये जोदॄष्टि का स्पर्श अब तक मिला वो नहींढूँढता मैं रहा मेघ की छाँह कोइक मरुस्थल की सूनी डगर पर चलानीर भरता रहा उग रही प्यास मेंजोकि जलती हुई दोपहर से ढलारेत के सिन्धु में से उमड़ती हुईमैं लहर रात वासर गिने जा रहाराह से कट चुके मोड़ पर मैं खड़ाये विदित है नहीं, आरहा ? जा रहा ?सूर्य जब ढल गया तो निशा पी गईरोशनी चाँद तारों से जितनी छनीचाँदनी की किरन से संवर जाये जोउस दिशा का पता तो मिला ही नहींमैं भटकता रहा हूँ तुम्हारे नयनकी घनी कालिमा में प्रिये उम्र भरहूँ  सुनाता रहा सांस के गान मेंधड़कनों की लिखी पुस्तकें बाँच करबरगदी शाख से आस की डोरियांनित लटकती रहीं हैं प्रतीक्षा लिये दॄष्टि छलके नयन के सुधा कुम्भ सेपान कर के जिसे स्वप्न मरता, जियेथी अपेक्षा सुलगती रही सांझ तकफिर अंधेरा हुआ तो पलक झुक गईपाटलों पर नयन के उगी याचनारात से कोई सपना मिला ही नहींउंगलियाँ हो गईं लेखनी आप हीएक ही नाम दिन रात लिखती रहींफिर कभी बन गईं रंगमय तूलिकाएक ही चित्र में रंग भरती रहींछैनियाँ बन गईं, शिल्प करती रहींएक प्रतिमा, तराशे शि…

दीप बुझ गये जलते जलते

लौट चुकी हैं प्रतिध्वनियाँ भीशून्य क्षितिज से टकरा टकराऔर प्रतीक्षा की थाली केदीप बुझ गये जलते जलतेगति का रथ इस पथ से गुजरा, चलते चलते दूर हो गयाचित्र नयन का दिवास्वप्न में ढल कर चकनाचूर हो गयाबिछी हुई पलकों की सिकता  पर पदचिह्न उभर न पायेऔर लगे आ आ कर घिरने तिमिर निराशा के कुहसायेअसफ़ल हुई निगाहें अपनेहाथों में रेखा तलाशतेधुंधली होते हुए मिट गईंजो हाथों को मलते मलते
स्वस्ति चिह्न अंकित कर खोले मन की अंगनाई के द्वारेलाभ और शभ दोनों पर थे फूल चढ़ाए सांझ सकारे अगवानी की वन्दनावारें  नित्य भोर के साथ सजाई चौक पूर कर रंग भर दिए पीले श्वेत और अरुणाई लेकिन सूनी पगडण्डी  की मांग रह गई फिर से सूनी रंगहीन हो गई ह्रदय  कीआस कुंवारी पलते पलते था विश्वास, स्वाति, बूँदों को एक दिवस बरसा ही देगाआराधन करते आराधक, आराधित को पा ही लेगाबदल रहे मौसम के सँग में चल देगी पतझड़ की टोलीआयेगी बासन्ती चूनरिया को ओढ़े सतरंगी डोलीलेकिन आशाओं के तरुवरशीश झुकाये खड़े रह गयेरीत गई क्षमता पराग कीबेमौसम के फ़लते फ़लतेएक बार फिर खिलीं नयन के पाटल  पर स्वप्निल रेखायेंपल भर को ठिठकीं साँसों की देहरी पर उमड़ी झंझायेंएक बार फिर ग…

कैसे कोई गीत सुनाते

खुली हथेली पर रह जातीहै सरसों ज्यों फ़िसल फ़िसल करस्वप्न फ़िसल कर रह जाते हैंवैसे नयनों की ड्यौढ़ी चढ़टूटे त्रिभुज विल्व पत्रों केपूजाओं में चढ़ न पातेबिखरे हुए शब्द छन्दों कीडोरी से वंचित रह जातेठोकर खाकर गिर जाता हैस्वर अधरों तक आते आतेकैसे गीत कोई फिर अपनाहम गा पाते, तुम्हें सुनातेबही हवा की जंजीरों सेबंध कर नहीं बातियां जलतींउगी भोर में परछाईं कबप्राची की देहरी पर बनतीरागिनियों ने कब बतलाऒटूटे हुए तार को थामातपी जेठ की दोपहरी मेंघिरता नहीं गगन घन श्यामाअवरोहों की गहन कंदरामें जा भटक गई है वाणीपता नहीं युग कितने बीतेंआरोहों तक आते आतेआतुर भाव उठा करता हैकरवट लेकर छन्द पकड़नेलेकिन बढ़ती हुई दूरियांदेती नहीं शब्द को ढलनेघुट कर रह जाता आंखों केघेरे में सपनों का पाखीमौन सांझ देखा करती हैदोपहरी की घनी उदासीक्षितिज बदलता नहीं भोर होया घिर कर आयें संध्यायेंकेवल घिर कर आये धुयें केसाये हैं रहते लहरातेफिर कैसे हम गीत सुनाते