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Showing posts from May, 2014

सोचा रहा था गीत लिखूँ इक

सोचा रहा था गीत लिखूँ इक,मीत तुम्हारी सुन्दरता पर
चित्र नयन तक पर आते ही, आँखें रह जाती पथराईलिखूं तुम्हारी सांसों से ले गंध महकते हैं चन्दन वन
लिखूं तुम्हारे केशों से ले छन्द गान करता है सावन
लिखूं तुम्हारी कटि की थिरकन से लेती हैं गति शिजिनियाँ
लिखूँ कथकली कुचीपुड़ी का उद्गम एक तुम्हारी चितवनलेकिन जब यह कलम उठी तो हुई स्व्यं में ही सम्मोहित
रूप तुम्हारे में यों उलझी शब्द नहीं कोई लिख पाईउड़े कल्पनाओं के पाखी ध्यान तुम्हारा मन में आते
अनायास सरगमी हो गये स्वर होठों तक आते आते
बन्द पलक ने छवि की खींची जैसे ही आकृतियां धुंधली
रंग पंक्ति में खड़े हो गये, अपनी बारी को ललचाते
कलम हाथ की बनी तूलिका पर छूते ही तनिक कैनवस
चित्रलिखित हो खड़ी रह गई अपनी सब सुध बिध बिसराईकदली खंभे, गगन अषाढ़ी सिहरी सी गुलाब की पाँखुर
इकतारे से कानाफ़ूसी करता सा बांसुरिया का सुर
पनघट का कंगन से पैंजनियों से रह रह कर बतियाना
नयनों के दर्पण का रहना आठ प्रहर होकर के आतुरकारण सबका सिर्फ़ तुम्हारी ही चर्चायें सुनो अवर्णित
भाषा अक्षम रही बांधने में विस्तार, रही सकुचाई

रचे तोरण और बन्दनवार तेरे आगमन को

पर्वतों के ये शिखर उत्तुंग मधुरिम घाटियाँ येहिम चरण से जन्म लेते निर्झरों का गीत अनुपमसिन्धु की आकाश से बतिया रही अविरल तरंगेंरच रहे हैं शंख सीपी, बालुऒ पर एक सरगम


इस प्रकृति ने मुग्धमन हो कर सजाया दृश्य अद्भुतरूपशिल्पे ! आज यह सब एक तेरे ही स्तवन को


उपवनों में फूल की सजती कतारें रंग लेकरऔर भंवरों का कली से बात कुछ चुपचाप कहनापल्लवों का ओस पीकर घोलना उल्लास पल मेंऔर फिर छूकर सुबह की रश्मियों को रंग भरनाप्रेरणे ! वातावरण ने आप ही यह सब सजायाएक तेरी अर्चना को एक तेरे ही नमन को


नील नभ पर तैरते ये पाखियों से श्वेत बादलआँजना काजल प्रतीची के नयन में आ निशा काओढ़ कर सिन्दूर प्राची का लजाते मुस्कुरानाभेज कर झोंके सुहावन मुस्कुरा उठना दिशा काकल्पने ! हर दृश्य निखरा है मनोहर चित्र बन करएक तेरी दृष्टि की पारस परस वाली छुअन कोमलयजों की गंध लेकर केसरी पुंकेसरों नेमार्ग में आकर सजाई हैं हजारों अल्पनायेंथाल ले अगवानियों के बाट को जोहे निरन्तरदेवपुर की खिड़कियों पर आ खड़ी हो अप्सरायेंपुष्पधन्वा ने मुदित हो पाँच शर संधान कर केरचे तोरण और वन्दनवार तेरे आगमन को

रही ज़िंदगी की इकलौती यही कथा

चाहे या अनचाहे हर पल मिली व्यथारही ज़िंदगी की इकलौती यही कथाकितनी बार कोशिशें कीं कुछ नया लिखेंकिन्तु परिश्रम सारा ही रह गया वृथा जो लिख गया हथेली की रेखाओं मेंउसमें परिवर्तन कुछ संभव नहीं  हुआ सुनते थे रेखाएँ बदला करतीं हैंकिन्तु दृश्य वो कभी प्रकाशित नहीं हुआहाथों  में फैले मकडी के जालों सीरेखाओं का ओर छोर था दिखा नहींबारह बरस बीतते कितनी बार गएकिन्तु न हिलना था इक पत्ता,हिला नहीं  राहें कभी भूल होठों की गलियों तकनहीं आ सकीं मुस्कानें भी यदा कदालगीं गुलाबों की कलमें जिस क्यारी मेंउसको रहे सींचते बस अभाव आकरआवाहन हर बार भोर का करते थेकुछ कागा मेरी बस्ती में आ गाकरजिन कलशों को भरा शगुन का बनना थाउनको कुम्भकार ने अब तक गढ़ा नहींलाभ और शुभ के मन्त्रों को बोल सकेंमेरे पंडित ने इतना था  पढ़ा नहीं मंदिर में लटके हर घंटे की दूरी हाथों से फ़ुट भर ही ऊंची रही सदाजिन राहों ने पग आ आ कर चूमे थेदिशाहीन थीं रही घूमती वृत्तों सीकहीं एक पल का भी नहीं ठिकाना थानियति हमारी रही पतझरी पत्तों सीपानी के बुलबुलों सरीखी उमर रहीहर सपने की, नयनों की अँगनाई मेंमिलती रहीं अपरिचय की परिभाषायेंहमको,सदा स्वयं की ही …

अभिव्यक्त करने के लिए भाषा नहीं है.

पंथ सारे सामने के धुंध में डूबे हुए हैंमार्ग का हर चिह्न पीकर हंस रहे घिरते अँधेरेनीड़ ने पाथेय की हर आस को ठोकर लगा दीछोड़ कर देहरी निशा की उग नहीं पाते सवेरेइस तरह की ज़िंदगी के मोड़ पर, असमंजसों सेकुछ उबर कर आ सकें ऐसी कोई आशा नहीं हैनित सजाते तो रहे हम थालियाँ पूजाओं की परअक्षतों ने रोलियों के साथ में मिल व्यूह खींचेउड़ गया कर्पूर ले नैवेद्य का संचय समूचाप्राण के घृत दीप   की बाती छुपी जा दीप नीचे मन युधिष्ठिर हारता है ज़िंदगी की चौसरों परशकुनी जैसा मंत्रपूरित हाथ में पासा नहीं हैभाव उमड़े तो ह्रदय में, तीर तक लेकिन न पहुंचेबात मन की शब्द में ढल कर नहीं आई अधर परफागुनी सतरंगिया होती उमंगें किस तरह सेमुट्ठियों से हर संजोया स्वप्न रह जाता बिखर कर घुट गईं अनुभूतियाँ मन की घनी गहराइयों मेंज्ञान में अभिव्यक्त करने के लिए भाषा नहीं है.भीड़ में चेहरा नहीं कोई कहीं जो द्रष्टि सोखेलौट कर आती न मन राडार की भेजी तरंगेंअनमनी है साध अपुशी धूप के बीमार जैसीमोरपंखी हो न पाती रंग खो बैठी उमंगें.लुट चुके हैं कामना के शेष भी अवशेष होकरएक रत्ती एक तोला एक भी माशा नहीं है

दृष्टि के पत्र लौटा गया सब क्षितिज

एक अरसा हुआ जूही देखे हुयेचित्र चम्पाकली के भी धुंधले हुयेहरसिंगारों से दूरी बढ़ी सिन्धुभरकोई पांखुर न आ मोतिये की छुयेहाथ नभ तक किये पत्थरों का शहरमुट्ठियों में हवा की जकड़ चूनरीदेता निर्देश बहना उसे किस डगरऔर रखनी कहां पर बना डूंगरीपग को जैसे धरोहर मिली नारदीदेने विश्रान्ति को ठौर है ही नहींएक पल जो कभी परिचयों में बँधादूसरी ही घड़ी खो गया वो कहींपतझरी मौसमों के असर में शहरझर रहे पत्र बन कर दिवस शाख सेऔर ले जा रहे साथ वे मोड़ चुनथी बहस की जहां पर गई रात सेदृष्टि के पत्र लौटा गया सब क्षितिजकोई स्वीकारता था कहीं भी नहींएक गति है रही पांव थामे हुयेपर सफ़र था जहां,हैं अभी भी वहीं बादलों ने गगन पे जो दी दस्तकेंभीड़ के शोर में वे सभी खो गईंराह बिखरी हुई चीथड़ों की तरहएक झूठे भरम की सुई सी गईदृष्टि अनभिज्ञ  रहती  कहां केन्द्र हैंडोर थामे रहीं कौन सी उंगलियांदे रहा है इशारे भला कौन हैकर रहे नृत्य बन काठ की पुतलियाँमुट्ठियों की पकड़ में नहीं आ सकेसूर्य तो हाथ अपने बढ़ाता रहाबदलियों ने उलीचे तिमिर के घड़ेरंग पीते दिवस गीत गाता रहाएक गति बेड़ियों में जकड़ है रखेछूट देती नहीं अंश भर के लियेदेख पाती नहीं है…