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Showing posts from April, 2014

एक मोड़ पर जाने कब से

कितने दिन हो गये भाव ने थामी नहीं शब्द की उंगलीकितने दिन हो गये भावना, मन से बाहर आ न मचलीकितने दिन हो गये कल्पना के पाखी ने नीड़ न छोड़ाकितने दिन हो गये समय की कात न पाई धागे तकलीवैसे तो सब कुछ परिवर्तित होता रहा निरन्तर गति सेकेवल मेरा अनुभव अटका एक मोड़ पर जाने कब सेसंदेशों के उजियारे फ़ाहे आ कर बिखरे अम्बर परमसि को कर के परस घटायें बन कर आये नहीं संवर कर  मेघदूत की वंशावलियां लगा कहीं अवरुद्ध हो गईंकोई चिह्न नहीं दिखता है बिछे पत्र पर कहीं उभर करशब्दों की लड़ियाँ तो बुनती रही नीर की ढलती बूँदेंएक धार में बँध कर लेकिन ढुलकी नहीं व्याकरण घट सेबोला कहीं पपीहा कोई मोर पुकारा कहीं विजन मेंकोई भी आकार न उभरा बिछे हुये जा पंथ-नयन मेंरही खोलती बन्द क्षितिज की खिड़की दृष्टि अधीरा पगलीसूनापन देता आहुतियाँ रहा ह्रदय की जली अगन मेंसूखी जमना, तट की रेती सोख रही है एक एक करजितने भी थे राग सिक्त हो उठते आये वंशीवट सेबांधे हुए न जाने कैसे कुछ अनदेखे अनचीन्हे पलआकुलता को दे जाते हैं इक क्षणांश का कोई संबलपल की करवट फिर भर देती अन्तहीन लाचारी मन मेंढली सांझ सा लगने लगता दोपहरी का मौसम उज्ज्वलरीत चुके कोष…

सुमनशोभिते ! शब्द एक वह

लिख देती है अनायास ही कलम शब्द कोई मुस्का करवाणी पुलकित्त हो जाती है उसको अपने सुर में गाकरअक्षर अक्षर से होते हैं निसृत मृदु गंधों के झरनेछूने लगती गगन, उमंगें पंख कल्पना के फ़ैला करसुमनशोभिते ! शब्द एक वह इंगित करता नाम तुम्हाराभाषा,सरगम और सोच सब उस पर ही रहते आधारित.करती रही गगन पर अंकित, पहली पहली किरन भोर कीआतुर जिसके दरश के लिये रही सदा तृष्णा चकोर सीरही जोड़ती अभिलाषायें जिसकी, पथ से पांव पथिक केजिसकी स्मृतियों के पल पाकर होती हैं सुधियाँ विभोर हीसुरपुर सलिले, एक नाम है तुम्हें विदित होगा यह शायदजो कर देता उपज रहे हर संशय को पल में विस्थापितबादल के टुकड़ों से जब जब होने लगती है प्रतिबिम्बितधूप स्याहियाँ सात रंग की लेकर के अंकित करती हैबून्दों की लड़ियों को अपनी चूनर के फ़ुँदने में बाँधेहवा सीटियाँ बजा बजा कर जिसका ज़िक्र किया करती हैसरगमवन्दे !प्रथमा पंचम आरोहों में अवरोहों मेंएक नाम है हर इक सुर में सहज भाव से हुआ निनादितभीगा हुअ ओस में चंचल एक हवा का नन्हा झों काजड़ देता आरक्त कपोलों पर जिसको कर के रस चुम्बनसिहरन की इक लहर बना कर भरने लगता है सांसों मेंऔर बाँध कर रख देता है जिससे…

तुम कहोगे प्रीत का अध्याय नूतन लिख रहा हूँ

भावविह्वल हो तुम्हें मैं बांह में अपनी भरूं  तोअचकचाकर मैं कपोलों पर कोई चुम्बन जड तोदृष्टि को अपनी भिगोकर गंध में कस्तूरियों कीमैं तुम्हारे रूप का शृंगार कुछ नूतन करूं तोये मेरी अनुभूति का उत्कर्ष ही कहलायेगा यातुम कहोगे प्रीत का अध्याय नूतन लिख रहा हूँ  मैं तुम्हारे पगनखों में ढाल कर अपनी कलम कोछन्द कुछ रच ्दूँसमय के सिन्धु तट की सीपियों परऔर चितवन को बनाकर तूलिकायें फिर सजादूँमैं अजन्तायें हजारों मलयजों की भीतियों परयह कलाओं का मेरी परिचय नया कहलायेगा याया वही रह जाऊँगा लिखता हुआ जो नित रहा हूँबांसुरी की धुन,चमेली और बेला अब पुरानेबाग़ में गाते हुए फिर से मधुप के ही तरानेछोड़ कर देखूं तुम्हें उलझे हुए मैं मीटिंगों मेंमुट्ठियों में भर  तुम्हारी याद के कुछ पल सुहाने  क्या इसे मन की कोई आवारगी का नाम देगा  जो तुम्हारे नाम में हर एक पल को लिख रहा हूँ  हर घड़ी महसूस तुमको मैं करूँ भुजपाश में ही दोपहर अलसाई हो जब पाँव को फैलाये अपने भोर गंगा तीर पर पहली किरण की आरती हो आँजती  हो रात नयनों में मेरे रंगीन सपने तुम इसे मन के बहम का नाम दोगे या कहोगे मैं जुडी निष्ठाओं का प्रतिरूप बन कर दिख रहा…