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Showing posts from January, 2014

लिखती है पातियाँ निशा में

मन के भोजपत्र पर लिक्खेयौवन की अँगड़ाई ने जोमधुरिम पल, संध्या एकाकीकहो कभी तो बाँची होगीघिरती हुई रात की चूनर झिलमिल करती हुई विभा मेंहो उन्मुक्त नयनों के पट पर, कहो झूम कर नाची होगीसूरज के गतिक्रम में बँधकरचलती हुई ज़िन्दगी ने कबपढ़ीं पातियाँ जो लिख देतीहै हर निशि में रजनी गंधा-- याकि ज्योत्सना की टहनी सेअनजानी इक डोर बाँध करपूरनमासी के आंगन मेंझूला करता झूला चन्दाकहो लहरिया ओढ़ प्रीत की वयसन्धि की षोडस कलियाँडगमग डगमग होते पग को एक बार तो साधी होगीगंधों की बहकी चितवन में डूबी हुई कोई अनुभूतिकितनी बार सोचती होगी प्यास कभी तो आधी होगीया इक पड़ते हुये बिम्ब कोनिरख निरख अपनी धारा मेंतट पर खड़े जुगनुओं सेजो करती हैं बातें पतवारेंनिश्छल एक लहरती नौकाके हिंडोले की मृदु गतियाँहौले हौले छ्ड़ा करतींपरछाईं के साथ फ़ुहारेंपार याद के परकोटे करअपनी अपने से मनुहारेंफिर नयनों के आगे आ करचित्रों मेम ढल जाती होगीचंचल सुधियों की अँगड़ाई गुजर चुके इक वातायन मेंअपने स्वर्णिम इतिहासों के अंक पुन: फ़िर जाँची होगी

वो एक चुम्बन लगा दहकने

कपोल पर जो जड़ा था तुमने वो एक दिन गुलमोहर के नीचे छुआ हवा की जो सिहरनों ने, वो एक चुम्बन लगा दहकने हुए हैं बाहों की क्यारियों में परस हजारों वे अंकुरित अब तुम्हारे भुजपाश ने दिए थे जो सांझ ढलते नदी किनारे उन स्नेहसिकता पलों की धड़कन लगी बजाने है दिलरुबा इक थे जिनमें भीगे हुए मिले थे ओ मीत उस दिन नयन तुम्हारे उतरते सूरज की रश्मियों ने लिखा था जो कुछ वितान पर तब वो लेख ढलता हुआ सुरों में हो गीत देखो लगा चहकने लगीं हैं कमरे की खिडकियों पर मलय की गंधे वही उमड़ने तुम्हारी साँसों की वीथियों में जो टहला करतीं निशा सवेरे दृगों के दीपक जो प्रज्ज्वलित थे हुए मुहर स्वीकृति की पाकर वे बनके सूरज जले हैं ऐसे हुए अपरिचित सभी अँधेरे जो एक सम्मोहिनी समय ने दी डाल गति में विराम लेकर वो आज आई फिर ऐसे घिर कर ये तन बदन है लगा बहकाने वो तुलसी चौरे की दीप बाती, वे ज्योति दौने बही लहर केमिले थे  हस्ताक्षरजिनको तमसे, लगे हैं रँगने नयन के पाटलउषा की रंगत के चित्र आकर बिछाता है मेरी देहरी परदिवस के कर से फ़िसल के गिरता सा सुर्मई सांझ का यआँचलजो शब्द के फूल खिल गये थे तुम्हारे होठों के मधु परस सेवे आज फिर से सुधी …

कौन मन के दर्पण में

आज कौन मन के दर्पण में इस अंधियारी सर्द निशा मेंभित्तिचित्र सी बना रहा है आ आड़ी तिरछी रेखायेंकौन संदली सी फ़ुहार से आकर मुझको लगा भिगोनेखिड़की पर पहले बादल सा लेकर सपनों के मृदु छौनेकौन हवा से सरगोशी सी करता आकर ठहर गया हैऔर कौन शहदीली धुन में अकस्मात ही बिखर गया हैमन के प्रश्न सहज महसूसा करते तो है अपना उत्तरलेकिन फिर भी बाट जोहते उत्तर आ खुद को समझायेंतारों की मद्दिम छाया में कितने प्रश्न नींद से जागेकहो ? कौन मन के दर्पण में जोड़ रहा परिचय के धागेकौन बो रहा बीज चित्र के आकर नयनों की क्यारी मेंकौन महकता है वृन्दावन सा इस मन की फुलवारी मेंऊहापोह और असमंजस के आकर घिर रहे कुहासेऐसा ना हो उसे चीन्हने में हम कुछ त्रुटियाँ कर जायेंउगा कौन मन के दर्पण में, बन चैती का सुखद सवेराकिसके नयनों की परछाईं, जहाँ लगा रजनी का डेराकौन धड़कनों की रागिनियॊं पर आ मुहरें लगा रहा हैकौन साँस की सरगम मे इक सारंगी सी बजा रहा हैचाहत मन की आँख बिछाये, उसका परिचय मिल जाये तोहम भी अपना खोया परिचय बिन बाधाओं के पा जायें

रूप अपना देखा करती है

कल्पों की कल्पना रूप अपना देखा करती हैजिसमें, मीत तुम्हारे चन्दन तन की परछाई हैसुन्दरता शिल्पों में ढलती जिससे प्रेरित होकरजगी भोर के साथ तुम्हारी पहली अँगड़ाई हैजिससे सीखा भ्रमरों ने गुंजन कर तान सुनानापुरबाई ने बह तरंग पर जल के साज बजानाजिससे जागे मंदिर की आरति के मंगल स्वरजिससे झंकृत हुये बादलों की उड़ान के परमीत तुम्हारे अधरों की कोरों से फ़िसली सीसरगम के सुर बिखराती स्वर की शहनाई हैअंकित भाग्यभाल पर कविताओं की भाषा हैजिससे परिभाषित होती हर इक परिभाषा हैमोहित सकल विश्व को करती है इक ही चितवनसम्मोहित हो जाता लख कर खुद ही सम्मोहनजिसमें डूब कल्पना रचती गीत  नये प्रतिपलमीत तुम्हारे कजरे नयनों की कजराई है उषा के कोमल अधरों पर है जिसकी मृदु छायाजिस आभा में संध्या की   दुल्हन का रूप लजायागुलमोहर दहके हैं जिसके अंश मात्र को छूकरजवाकुसुम उग आते जिसको देख स्वयं ही भू परदिशा दिशा नर्तित हो जाती स्पर्श बिम्ब का पाकरमीत! अलक्तक रँगे पगों से छिटकी अरुणाई है

आपकी ज़िन्दगी में उजाला भरे

कामना है यही इस नये वर्ष मेंआपकी ज़िन्दगी में उजाला भरे कल उगे जब नई भोर इक गांव मेंदूर हो जायें तम दिल में छाये हुयेमौन हो जाये स्वर सब सदा के लियेपीर के होंठ से गुनगुनाये हुयेमान्यतायें उठे नींद से जाग करअस्त हो जाये डिस्पोजली संस्कृतीधूप के तार की तीक्ष्णता से मिटेचादरें जो बिछी धुंध की सब हठीऔर चढ़ते हुये सूर्य का सारथी आपके पंथ को रश्मियों से रँगे
मन की अँगनाइय़ों की तहों में दबीकामनायें  सभी खिल उठें फूल सीजिस तरफ़ पग चलें,गंध का हो परसमलयजी हो उठे राह की धूल भीदृष्टि के दायरे संकुचित न रहेंपार देखें क्षितिज के भी संभावनाविश्व कल्याण की बात मन में जगेमूल से नष्ट हो जाये दुर्भावनाएक आवाज़ सुन आ सजायें धराआपकी, नभ में जितने सितारे टँगेकुंभकर्णी रजाई लपेटे हुयेसोया वातावरण जो, पुन: जाग लेड्योढियों पर समय की खड़े काल सेकल का फ़ल हाथ अपने बढ़ा माँग लेफिर दिलासों के सिक्कों की झंकार मेंखो न जायें सँवरती हुई सरगमेंरोशनी से भरे कुमकुमों की चमकइस गली में जो उतरे, यही बस थमेइस नये वर्ष में दिन सभी हो रहेंआपके, प्रीत की चाशनी में पगे