आओ दीप वहाँ धर आयें

सूरज अस्त हो गया तो क्या, आओ सूरज नया उगायें
नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें
 
संध्या का दीपक आगे बढ़ फिर ललकारे स्वत्य तिमिर का
पाषाणों  में  सहज आस्था रख दे फिर से प्राण घोल कर 
गूँजे नाद व्योम में छाई निस्तब्धतायें घनी तोड़ कर
और गंध बिखराती जाये, अपना घूँघट  कली खोल कर
 
आओ हम-तुम कविताओं से एक नया अध्याय रचायें
नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें
 
आशाओं के मुरझाये फूलों में फिर से भरे चेतना
बुन लें टूटे हुये स्वप्न को कात कात कर नई दुशाला
और बूटियाँ टाँकें उसमें  सोनहरे सुरभित आगत की
बन कर पारस करें सुधामय, बहती हुई वज़्र सी हाला
 
आओ ऐसा जतन करें हम, फिर जमना तट रास रचायें
नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें

एक दृष्टि का भ्रम ही तो है लगता सूरज अस्त हो गया
आओ उठें नजर का अपनी हम विस्तार अनन्ती कर लें
जहाँ शीश पर टंक  जाने  को अनगिन सूरज लालायित हैं 
उन्हें सजा कर, हारे मन को हम अपना सहपंथी कर लें
 
सूरज अस्त हो गया ? अपनी आँजुरि से छिटकायें प्रभायें
ठोकर खाये नहीं दूसरा कोई, चलो दीप धर आयें
 
हम वसुधा के रहे कुटुम्बी, संस्कृतियों ने सिखलाया है
हमको सह पाना मुश्किल है किसी आँख में छलका पानी
आओ हर संध्या में हम तुम, एक नहीं शत सूर्य उगायें
सिरते हुये दिये लहरों पर लिखें ज्योति की नई कहानी
 
करें याद फिर, भुला गया है समय हमें अपनी क्षमतायें
हर इक डगर ज्योत्सना बिखरे, आओ दीप वहाँ धर आयें

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