सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई

रह गए सूने पुन: सारी दिशाओं के झरोखे
रश्मियों ने दी नहीं दस्तक कोई वातायनों पे
डोरियों ने बरगदों से लहर कर सन्देश भेजे
वे सिमट कर रह गए भटकी हवा के अंचलों पे
 
और मैं टूटी हुई इक साध के टुकडे उठाकर
दीप कोई जल सके ये कामनाएं कर रहा हूँ
 
झर  गए दिनमान सूखे, वर्ष की शाखाओं पर से
आगतों के झुनझुने के स्वर नहीं देते सुनाई
उड़  गई कर कोष रीता सावनी हर एक बदरी
आरसी की धुंध में छवियाँ संवरती जा समाई
 
और मैं सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई
तरुतले पत्थर बना ये लालसाएं कर रहा हूँ
 
घुट रहीं मन में अपेक्षाएं हजारों  ढेर बन कर
फ़ड़फ़ड़ाने  के लिए भी पर कोई बाकी नहीं है
उम्र की बालू खिसकती मुट्ठियों में से समय की
दृष्टि में उपलव्धि कोई भी समा पाती नहीं है
 
जल चुकी है जो अगरबत्ती, उसी की राख ले मैं
गंध के अवशेष पर आराधनायें कर रहा हूँ
 
अर्थ अपना खो चुके संकल्प के उद्यापनी पल
हर कथा का सामने आ लग गया है  तथ्य  खुलने 
संस्कृतियों की धरोहर मान कर रक्खी हृदय में 
संशयों के घोल में वह लग पडी है आज घुलने 
 
और मैं क्षत हो चुके इक ग्रन्थ के पन्ने  बटोरे 
रूप नव पा जाऊं ये संभावनाएं कर रहा हूँ 

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