लगी है हवा प्यार के गीत गाने

छनी बादलों की झिरी में से किरणें
लगीं घोलने नाम तेरा हवा में
पिरो कर जिसे पत्तियों के सुरों में
लगी है हवा प्यार के गीत गाने
 
मचलते हुए नाव के पाल चढ़ कर
सुनाने लगी सिन्धु को वह कहानी
परस मिल गया नाम के अक्षरों का
महक थी उठी दोपहर रात रानी
खिले थे  कमल रात के आंगनों में
उतर आ गये थे धरा पे सितारे
तेरे नाम सुन सोचता शशि रहाथा 
 तुझे  देखे या फिर  स्वय़ं को निहारे
 
अधर के पटों से रही झांकती थी
तेरी दूधिया जो खिली मुस्कुराहट
उसे अपने सिर पर बना कर के आंचल
लगी रात को चांदनी खिलखिलाने
 
जगी नींद से कोंपलों की पलक पर
नये चित्र खींचे हैं पुरबाईयों ने
किनारों को सोने के घुंघरू की खनखान 
सुनाई तरंगों की शहनाईयों ने
घटा से पिघल   गिर रही, पी सुधा को
लगी पंखुरी पंखुरी मुस्कुराने
बजी जलतरंगों का आरोह छूकर
तटी दूब भी लग पड़ी गुनगुनाने
 
उठा छोड़ आलस के प्रहरों को मौसम
रखी अपने कांधे पे कांवर बसन्ती
कि जिसमें रखे छलछलाते कलश से
हुए भीग पल और भी कुछ सुहाने
 
उड़ी गंध की चूड़ियोंको पहन कर
लगी झनझनाने क्षितिज की कलाई
सजा कर जिसे सरगमों में गगन ने
नयी प्रीत की इक गज़ल गुनगुनाई
तेरा नाम सारंगियों के सुरो में
ढला तो लगीं नॄत्य करने दिशायें
तेरा नाम छू छू के प्रतिमा बनी हैं
बिना छैनियों के परस के शिलायें
 
तेरे नाम की जो सुधायें मिलीं तो
हुईं क्यारियों की सुहागन उमंगें
सुबह शाम में, दोपहर रात में भी
लगीं कुछ नई और कलियाँ खिलाने

Comments

Udan Tashtari said…
बहुत सुन्दर!!
Archana said…
बहुत ही अच्छा गीत ,सेव कर लिया गाने को

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