रही ज़िंदगी की इकलौती यही कथा

चाहे या अनचाहे हर पल मिली व्यथा
रही ज़िंदगी की इकलौती यही कथा
कितनी बार कोशिशें कीं कुछ नया लिखें
किन्तु परिश्रम सारा ही रह गया वृथा
 
जो लिख गया हथेली की रेखाओं में
उसमें परिवर्तन कुछ संभव नहीं  हुआ
सुनते थे रेखाएँ बदला करतीं हैं
किन्तु दृश्य वो कभी प्रकाशित नहीं हुआ
हाथों  में फैले मकडी के जालों सी
रेखाओं का ओर छोर था दिखा नहीं
बारह बरस बीतते कितनी बार गए
किन्तु न हिलना था इक पत्ता,हिला नहीं  
 
राहें कभी भूल होठों की गलियों तक
नहीं आ सकीं मुस्कानें भी यदा कदा
 
लगीं गुलाबों की कलमें जिस क्यारी में
उसको रहे सींचते बस अभाव आकर
आवाहन हर बार भोर का करते थे
कुछ कागा मेरी बस्ती में आ गाकर
जिन कलशों को भरा शगुन का बनना था
उनको कुम्भकार ने अब तक गढ़ा नहीं
लाभ और शुभ के मन्त्रों को बोल सकें
मेरे पंडित ने इतना था  पढ़ा नहीं
 
मंदिर में लटके हर घंटे की दूरी
हाथों से फ़ुट भर ही ऊंची रही सदा
 
जिन राहों ने पग आ आ कर चूमे थे
दिशाहीन थीं रही घूमती वृत्तों सी
कहीं एक पल का भी नहीं ठिकाना था
नियति हमारी रही पतझरी पत्तों सी
पानी के बुलबुलों सरीखी उमर रही
हर सपने की, नयनों की अँगनाई में
मिलती रहीं अपरिचय की परिभाषायें
हमको,सदा स्वयं की ही परछाई में
 
चर्चायें थीं सुनी बहुत सम्बन्धों की
हमसे जुड़ता लेकिन ऐसा कोई न था
 

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