तुम कहोगे प्रीत का अध्याय नूतन लिख रहा हूँ

भावविह्वल हो तुम्हें मैं बांह में अपनी भरूं  तो
अचकचाकर मैं कपोलों पर कोई चुम्बन जड तो
दृष्टि को अपनी भिगोकर गंध में कस्तूरियों की
मैं तुम्हारे रूप का शृंगार कुछ नूतन करूं तो
 
ये मेरी अनुभूति का उत्कर्ष ही कहलायेगा या
तुम कहोगे प्रीत का अध्याय नूतन लिख रहा हूँ  
 
मैं तुम्हारे पगनखों में ढाल कर अपनी कलम को
छन्द कुछ रच ्दूँसमय के सिन्धु तट की सीपियों पर
और चितवन को बनाकर तूलिकायें फिर सजादूँ
मैं अजन्तायें हजारों मलयजों की भीतियों पर
यह कलाओं का मेरी परिचय नया कहलायेगा या
या वही रह जाऊँगा लिखता हुआ जो नित रहा हूँ
 
बांसुरी की धुन,चमेली और बेला अब पुराने
बाग़ में गाते हुए फिर से मधुप के ही तराने
छोड़ कर देखूं तुम्हें उलझे हुए मैं मीटिंगों में
मुट्ठियों में भर  तुम्हारी याद के कुछ पल सुहाने 
 क्या इसे मन की कोई आवारगी का नाम देगा  
जो तुम्हारे नाम में हर एक पल को लिख रहा हूँ  
 
हर घड़ी महसूस तुमको मैं करूँ भुजपाश में ही 
दोपहर अलसाई हो जब पाँव को फैलाये अपने 
भोर गंगा तीर पर पहली किरण की आरती हो
आँजती  हो रात नयनों में मेरे रंगीन सपने 
 
तुम इसे मन के बहम का नाम दोगे या कहोगे 
मैं जुडी निष्ठाओं का प्रतिरूप बन कर दिख रहा हूँ 

Comments

श्रंगार के भाव से सुमंगल रचना का शब्द शब्द।
Shardula said…
Mindblowing poetry!!

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