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Showing posts from March, 2014

उसको सहज नमन है मेरा

शब्दों की निष्प्राण देह में सींच  भावनाओं का अमृत देती है अमरत्व कलम जो, उसको सहज नमन है मेरा कल कर चुका आज जिनको कल ही इतिहासों के गतिक्रम में अपने अंत:स को उलझाकर, छलना के मरुथलिया भ्रम  में उन शब्दों को, उन भावों को फ़िर से देकर स्पर्श सुकोमल पंक्तिबद्ध कर बिठला देती है जो उन्हें सजा इक क्रम में वह इक कलम अलौकिक, भाषा के आशीषों का प्रसाद है मिथ्या है उसके प्रवाह को कोई कहे, सृजन है मेरा ढलते हुए दिवस की सलवट में  दब कर जो खो जाते हैं गिर कर पथ की पगतलियों में अनदेखे जो रह जाते हैं वे पाटल शब्दों के  फूलों के जो गिर जाते   मुरझाकर छूकर जिसकी उंगली जीवन का कुछ अर्थ नया पाते हैं वही कलम जो रही कहलवा अकस्मात ही सब अधरों से मैं भी यह कहना चाहा था, सचमुच यही कथन है मेरा किन्तु कलम जो रही खींचती बस आड़ी तिरछी रेखायें अंधियारे को दे न सकीं हैं जो पूनम की कभी विभायें देती रहें अपरिचय-परिचय के द्वारे पर जाकर दस्तक पल ही सही, मूल्य लेकर भी बस उस्नकी स्तुतियाँ गायें बुझते हुये दीप की लौ सी भड़क अंधेरों में खो जातीं नहीं ज्योति का अंश बन सकें, उनको बस बिसरन  है मेरा

मैं अब भी झांका करता हूँ

जहाँ फ़िसलते हुए बचे थे पांव उम्र के उन मोड़ों पर जमीहुई परतों में से अब प्रतिबिम्बित होती परछाईं जहाँ मचलते गुलमोहर ने एक दिवस अनुरागी होकर सौंपी थी प्राची को अपने संचय की पूरी अरुणाई
उसी मोड़ से गये समेटे कुछ अनचीन्हे से भावों को मैं अपनी एकाकी संध्याओं में नित टाँका करता हूँ
अग्निलपट सिन्दूर चूनरी ,मंत्र और कदली स्तंभों ने जिस समवेत व्यूह रचना के नये नियम के खाके खींचे उससे जनित कौशलों के अनुभव ने पथ को चिह्नित कर कर जहाँ जहाँ विश्रान्ति रुकी थी वहीं वहीं पर संचय सींचे
निर्निमेष हो वही निमिष अब ताका करते मुझे निरन्तर और खोजने उनमें उत्तर मैं उनको ताका करता हूँ
षोडस सोमवार के व्रत ने दिये पालकी को सोलह पग था तुलसी चौरे का पूजन ,गौरी मन्दिर का आराधन खिंची हाथ की रेखाओंका लिखा हुआ था घटित वहाँ पर जबकि चुनरिया पर, आंखों में आ आ कर उतरा था सावन
हो तो गया जिसे होना था,संभव नहीं, नहीं हो पाता उस अतीत के वातायन में, मैं अब भी झांका करता हूँ
तय कर चुका अकल्पित दूरी कालचक्र भी चलते चल्ते

सन्देश कोई पर अधूरा

रह गईं हैं पगनखों तक दृष्टि की सीमायें सारी नीड़ में बन्दी हुई है कूक कोयल की बिचारी रख लिये हैं व्योम ने धारे हवा के,पास अपने द्वार पर ठहरी हुई एकाकियत की आ सवारी और छिटकी रश्मियों की इक किरण आ खिड़कियों पे लग रहा सन्देश कोई दे रही है, पर अधूरा भोर तकती है धुंआ उठता हुआ बस प्यालियों से चाय की, पर पढ़ नहीं पाती लिखे आकार उसके दोपहर को भेजती है नित निमंत्रण बिन पते के देखती रहती अपेक्षा में निराशा  आये घुल के ध्यान को कर केन्द्र तकती कान फिर अपने लगाकर छेड़ता शायद कहीं पर कोई तो हो तानपूरा सीढ़ियाँ चढ़ते दिवस की पांव फ़िसले हैं निरन्तर कौन सी आरोह को अवरोह को पादान जाये धूप के टुकड़े उठा कर कंठ पीता है निरन्तर कर नहीं पाता सुनिश्चित कौन सा वह राग गाये उंगलियों की पोर पर आकर चिपकता दिन ढले से स्वप्न की हर इक किरच का हो गया जो आज चूरा आ रहीं आवाज़ मन के द्वार तक चल कर कहीं से किन्तु कोई एक जो सुन पाये वह मिलती नहीं है कामनायें बीज बोकर सींचती हर एक पल छिन क्यारियों में इक कली चाही हुई खिलती नहीं है कामना थी जिस जगह पर मुस्कुरायेगी चमेली उस जगह पर आ टिका है एक सूखा सा धतूरा

तकलियों पे कते सूत की डोरियां

पीठ पर जो गिलहरी के खींची गई हम उसी रेख की चाह करते रहे दिन की शाखाओं पर पत्तियां में बसा आस की चाहना सिर्फ़ रँगते रहे जानते थे नहीं जोड़ पाती शिला तकलियों पे कते सूत की डोरियां और सोती नहीं है दुपहरी कभी चाहे जितनी सुनाते रहें लोरियां फ़िर भी अपने ही वृत्तों में बन्दी रहे दोष पर दूसरों पर लगाते रहे फ़र्क अनुचित उचित में किया था नहीं दृष्टि अपनी कसौटी रखी मान कर शब्द अपने ही हैं स्वर्ण से बस मढ़े हमने कर पल रखा है यही मान कर जिन पुलों से गुजर कर सफ़र तय किया अपने पीछे उन्हीं को जलाते रहे और निज   कोष की रिक्तता देख क्लर शुष्क आंखों के आंसू बहाते रहे भूल से भी कहीं सत्य दिख ना सके आईने से नजर को चुराते रहे सूर्य को दोष देते रहे है सदा  पांव घर के ना बाहर कभी थे रखे चांदनी हमसे  करती रही दुश्मनी गांठ ये बांध कर अपने मन में रखे हम अनिश्चय की परछाईयों से घिरे तय ना कर पाये क्या कुछ हमें चाहिये अनुसरण अपनी हाँ का सदा ही किया और बाकी रखा सब उठा हाशिये और धृतराष्ट्र का आवरण ओढ़ कर खेल विधना का कह, छटपटाते रहे.

चर्चा ही चर्चायें बाकी अब

चर्चा ही चर्चायें बाकी अब  सब मंचों पर किसने दल बदला है देकर कौन गया इस्तीफ़ा किसने कूटनीति का अब तक क ख ग न सीखा किसने राह दिखाई होकर कौन रहा अनुमोदी कजरी सुनता कौन राग का रहता कौन विरोधी एक गिलट कैसे भारी है सौ सौ टंचों पर
बचपन का इतिहास कौन है रख न सका जो याद कौन जेल था गया राज से किसने की फ़रियाद किसकी एड़ी तले दबी है पूरी अर्थ व्यवस्था किसके कारण करे मजूरी ले विश्राम, अवस्था किसके पाँव जमे रहते हैं ढुलके कंचों पर
ज्ञानवान है कौन यहाँ पर कौन रहा अनजान प्रश्नों को सुलझाया करतीं पानों की दूकान चर्चा करते बड़े बड़े सब ज्ञानी और ध्यानी दुविधा होती नहीं, बात उनकी जाती मानी जुड़ते जाते सभी फ़ैलते हुये प्रपंचों पर