आपकी ज़िन्दगी में उजाला भरे

  
कामना है यही इस नये वर्ष में
आपकी ज़िन्दगी में उजाला भरे 
 
कल उगे जब नई भोर इक गांव में
दूर हो जायें तम दिल में छाये हुये
मौन हो जाये स्वर सब सदा के लिये
पीर के होंठ से गुनगुनाये हुये
मान्यतायें उठे नींद से जाग कर
अस्त हो जाये डिस्पोजली संस्कृती
धूप के तार की तीक्ष्णता से मिटे
चादरें जो बिछी धुंध की सब हठी
 
और चढ़ते हुये सूर्य का सारथी
 आपके पंथ को रश्मियों से रँगे
मन की अँगनाइय़ों की तहों में दबी
कामनायें  सभी खिल उठें फूल सी
जिस तरफ़ पग चलें,गंध का हो परस
मलयजी हो उठे राह की धूल भी
दृष्टि के दायरे संकुचित न रहें
पार देखें क्षितिज के भी संभावना
विश्व कल्याण की बात मन में जगे
मूल से नष्ट हो जाये दुर्भावना
 
एक आवाज़ सुन आ सजायें धरा
आपकी, नभ में जितने सितारे टँगे
 
कुंभकर्णी रजाई लपेटे हुये
सोया वातावरण जो, पुन: जाग ले
ड्योढियों पर समय की खड़े काल से
कल का फ़ल हाथ अपने बढ़ा माँग ले
फिर दिलासों के सिक्कों की झंकार में
खो न जायें सँवरती हुई सरगमें
रोशनी से भरे कुमकुमों की चमक
इस गली में जो उतरे, यही बस थमे
 
इस नये वर्ष में दिन सभी हो रहें
आपके, प्रीत की चाशनी में पगे

Comments

Popular posts from this blog

तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

वीथियों में उम्र की हूँ

बीत रही दिन रात ज़िन्दगी