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Showing posts from 2014

नए वर्ष के हे नव सूरज

आओ जीवन के नवल वर्ष नव आशा से झोली भर दो दो  बरसों से छाये तिमिरांचल  को दे प्रकाश  दीपित कर दो 
जो अपनी संकीर्ण प्रवृति के  हाथों बने हुए कठपुतली  दूजों के इंगित पर निशिदिन  नाच रहे हैं बन कर तकली  उनके अंधियारों को अपने   ज्योतिदान से करो प्रकाशित  ताकि नहीं हो पाये फिर से  उनके मन में तम आयातित 
नये वर्ष के नव पंछी को  नया व्योम देकर नव पर दो 
निश्चित जीवन के नवल वर्ष यों फूल उगाओ आँगन में रंजित हो नहीं रक्त से इक भी पृष्ठ तुम्हारे दर्पण में सामन्ती अभिलाषाओं की संस्कृतियाँ सभी समूल मिटें सौहार्द्र द्वार पर पुष्पित हो समृद्धि शांति चहुँ और दिखे
आकाँक्षा कोटि ह्रदय की यज इस बरस, वर्ष पूरी कर दो स्वागत जीवन के नवल वर्ष अभिषेक तुम्हारा अक्षय हो
करते अपने इन सपनों का श्रुंगार वर्ष बीते कितने आंखों में बही उतरते हैं अब आकर के दूजे सपने इस बार नई कुछ साध नहीं खाली झोली फ़ैलाते हैं बूढ़ी होने को आई हैं वे ही आशा दुहराते हैं
अपना मधुकलश तनिक छलका दो बूँ आंजुरी में भर दो स्वागत! जीवन के नवल वर्ष सुख कोष  तुम्हाराअनवर हो
फिर करो अंकुरित नवल वर्ष स्वर्णिम इतिहासों की वर्णित अलकापुरोयों के एप्रतिकृतियाँ हों गली गांव आकर सज्जित पीड़ा के स…

शब्द मेरे पास होते

शब्द मेरे पास होते एक मुट्ठी से अधिक तो गीत मैं क्रम से लगा कर आपको मैं भेंट करता शब्द जिनको मैं कहूँ अपना, सभी हैं उंगलियों पे और दोहराते रहे हैं चन्द वे बातें पुरानी एक पीपल,एक बरगद,एक पनघट, एक अँगना तीर पर सुधि की नदी के गमगमाती रातरानी शब्दकोशों से छुड़ाकर हाथ जो आ पाये मुझ तक बस उन्हीं से रात दिन मैं बैठ कर हूँ बात करता चाह तो हर रोज मेरा कोष संचय का बढ़े कुछ और नूतन शब्द मेरे पास आयें बैठ जायें सुर कोई भी जो उभर कर कंठ  से आये अधर तक बस उन्हीं को गीत कर दें और झूमें गुनगुनायें  टूट जाता हर घड़ी पर स्वप्न बनने से प्रथम ही ताक पर किरचें उठा कर मैं सदा चुपचाप रखता आपके जो पास हैं वे भी मुझे अक्सर लुभाते किन्तु मुझको ज्ञात है विस्तार अपनी झोलियों का जानता हूँ मिल गये तो साध रखना है असम्भव है नजर अटकी निरन्तर राह तकती बोलियों का  भावना के सिंधु में लहरें उमड़ती है निशदिन  सोख लेती है सभी, अभिव्यक्ति की लेकिन विफलता

सृजनकार का वन्दन कर लें

आज सिरज कर नव रचनायें  सृजनकार का वन्दन कर लें
और रचेता के अनगिनती रूपों काअ भिनन्दन कर लें
चित्रकार वह जो रंगों की कूची लेकर दृश्य  बिखेरे नाल गगन पर लहरा देता सावन के ला मेघ घनेरे बगिया के आँगन में टाँके  शतरंगी फूलों की चादर शून्य विजन में जीवन भर कर नई नई आभायें उकेरे
उस की इस अपरिम कूची को  नमन करें हम शीश नवाकर आओ कविता के छन्दों से सृजनकार का वन्दन कर लें
शिल्पी कितना कुशल रचे हैं ऊँचे पर्वत, नदी नालियाँ चम्बल से बीहड़ भी रचता, खजुराहो की शिल्पकारियाँ मीनाक्षी, कोणार्क, सीकरी, ताजमहल यमुना के तट पर एलोरा की गुफ़ा , अजन्ता की वे अद्भुत चित्रकारियाँ
उसके जैसा शिल्पी कोई हो सकता क्या कहो कहीं भी एक बार फिर उसको सुमिरन करते अलख निरंजन कर लें
सृजनकार वे जिनने सिरजे वेद पुराण उपनिषद सगरी वेदव्यास, भृगु, वाल्मीकि  औ सनत्कुमारी कलम सुनहरी सूरा-मीरा, खुसरो,नानक, विद्यापति, जयदेव, जायसी तुलसी जिसने वर्णित की है अवधपति के हाथ गिलहरी
उनके पदचिह्नों पर चल कर पा जाये आशीष लेखनी महकायें निज मन का आँगन, सांस सांस को चन्दन कर लें

उम्र की शाख से पत्र झरते रहे

वृक्ष तो छाँह के शेष सब होगये उम्र की शाख से पत्र झरते रहे हम भटकते हुए स्वप्न ले नैन में सांझ से भोर की बात करते रहे रात दिन ढूँढ़ते रह गये वे निमिष जो हथेली में आकर रुके थे नहीं ज़िद के पीपल घनेरे खड़े द्वार पर टूट कर गिर गये पर झुके थे नहीं मुट्ठियों में समर्पण रखा बन्द ही खोलने का नहीं हमसे साहस हुआ चाह हर पल पली जीत की चित्त में पर न पासे उठा खेल पाये जुआ मंज़िलें जो जुड़ीं थी अपेक्षाओं से उनके पथ में कदम रखते डरते रहे साँस सहमी रही द्वार पर आ खड़ी हो गई थी स्वयं आके जब चाँदनी शोर का भ्रम हुआ हर घड़ी जब बजी गुनगुनाती हुई मोहिनी रागिनी सूर्य तपता मरुस्थल का आ शीश पर एक अहसास यह घेर रखे रहा स्वर था असमंजसों में घिरा रह गया चाहते थे मगर शब्द इक न कहा रंग छू न सके तूलिका के सिरे और हम रंग बिन रंग भरते रहे बाँध ली लाल बस्ते में जब सांझ ने धूप, उस पल दुपहरी की की कामना थे शुतुर्मुर्ग से मुँह छिपाते रहे हम चुनौती का कर न सके सामना हम  बताते स्वयं को युधिष्ठिर रहे अश्वत्थमा हतो फिर भी कहते रहे अपना आधार कुछ था नहीं इसलिये जो भी झोंका मिला,साथ बहते रहे पंथ आसान था पर हमारे कदम ठोकरें खाते,गिरते संभलते रहे जानते थे कि कुछ चाहिये …

ज़िंदगी की वाटिका में

ज़िंदगी की वाटिका में  चाह तो रोपे निरन्तर तुलसियों को मंजरी पर उग रहीं हैं नागफ़नियाँ नीर तट अभिमंत्रिता सौगन्ध से सींचा निशा दिन बाड़ कर सम्बन्ध की बिलकुल अछूती डोरियों से पल्लवन को छाँह में फ़ैलाईं पलकों की बरौनी और सौंपा लाड़ प्रतिपल सरगमी कुछ लोरियों से पर अपेक्षित पाहुनों के पांव अब तक उठ ना पाये ताकते कितना रहे हम शून्य पथ पर टाँक अंखियाँ नील नभ की वादियों में है विचरता मन पखेरू  बादलों के पंख फैलाये हवा की झालरों पर  बांह में भर कर धनक के रंग की आभाएँ अद्भुत  ढूंढता विश्रांति के पल धूप वाली चादरों पर  पर ठगी मौसम लुटेरा घात कर बैठा डगर पर  हो गईं अपनी यहां के मोड़ पर हर राहजनियाँ  रह गये बुनते घरौंदे याद के सैकता कणों से नैन वाली जाह्नवी की धार में निशिदिन भिगोकर दूर होकर के लगाई जो विगत ने, अड़चनों से है सजाते मौक्त मणियों से जड़े सपने पिरोकर पर ना जाने कौन अपनी उंगलियों के इंगितों से काँच के टुकड़े बना देता,सजाईं हीर कनियाँ

गंध में भीगे हुए हैं

ज़िंदगी की वाटिका में जो हुए सुरभित निशा दिन 
वे सभी पल मित्रता की गंध में भीगे हुए हैं 


कर समन्वय नित्य  ही सौहार्द्र के स्वर्णिम क्षणों से  जोड़ते है तार अपने मुस्कुराती वीथियों से  बांधते हैं डोरियाँ नव सोच की बुन  कर निरंतर  तोड  कर सम्बन्ध जर्जर रूढिवाली रीतियों से 

बन गए थाती संजोई जो नहीं अक्षुण्ण होती  चाहे घट अनगिन निधी के शेष हो रीते हुए हैं 

जो जुड़े संदीपनी आकाश की परछाईयों में सूर्या  अंशित से जुड़े कुरुराज के सम्बन्ध गहरे पार्थ से जुड़ कर सहज वल्गायें थामी उंगलियों में और किष्किन्धाओं पर जुड़ कर स्वत: ही पाँव ठहरे

इन सुगम अनुभूतियों की जब छलकतीं हैं सुधायें याद के पुलकित हुयें पल अब उन्हें पीते हुये हैं

मोड़ पर आ ज़िन्दगी के दृष्टि मुड़ कर देखती है सामने आते करीने से लगे घटनाओं के क्रम सिर्फ़ कुछ दिखते निरन्तर स्वर्णमंडित मित्रता से शेष पर केवल चढ़ा अपनत्व का  थोपा हुआ भ्रम


हाथ की रेखाओं में भी बन गये रेखायें गहरी बस वही पल मित्रता के, शेष बस बीते हुये हैं.

आओ दीप वहाँ धर आयें

सूरज अस्त हो गया तो क्या, आओ सूरज नया उगायें नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें संध्या का दीपक आगे बढ़ फिर ललकारे स्वत्य तिमिर का पाषाणों  में  सहज आस्था रख दे फिर से प्राण घोल कर  गूँजे नाद व्योम में छाई निस्तब्धतायें घनी तोड़ कर और गंध बिखराती जाये, अपना घूँघट  कली खोल कर आओ हम-तुम कविताओं से एक नया अध्याय रचायें नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें आशाओं के मुरझाये फूलों में फिर से भरे चेतना बुन लें टूटे हुये स्वप्न को कात कात कर नई दुशाला और बूटियाँ टाँकें उसमें  सोनहरे सुरभित आगत की बन कर पारस करें सुधामय, बहती हुई वज़्र सी हाला आओ ऐसा जतन करें हम, फिर जमना तट रास रचायें नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें
एक दृष्टि का भ्रम ही तो है लगता सूरज अस्त हो गया आओ उठें नजर का अपनी हम विस्तार अनन्ती कर लें जहाँ शीश पर टंक  जाने  को अनगिन सूरज लालायित हैं  उन्हें सजा कर, हारे मन को हम अपना सहपंथी कर लें सूरज अस्त हो गया ? अपनी आँजुरि से छिटकायें प्रभायें ठोकर खाये नहीं दूसरा कोई, चलो दीप धर आयें हम वसुधा के रहे कुटुम्बी, संस्कृतियों ने सिखलाया है हमको सह पाना मुश्किल है किसी आँख में छल…

एक यह विश्वास पलता भी ढहा

जानते परिणति बुझेंगे अंतत: दीप फिर भी सांझ में जलते रहे झोलियाँ खाली थीं खाली ही रहीं औ हथेली एक फ़ैली रह गई  हाथ की रेखाओं में है रिक्तता एक चिट्ठी चुन के चिड़िया कहगई चाल नक्षत्रों कीबदलेगी नहीं ज्योतिषी ने खोल कर पत्रा कहा दिन बदलते वर्ष बारह बाद हैं एक  यह विश्वास पलता भी ढहा पर कलाई थाम कर निष्ठाओं की पाँव पथ में रात दिन चलते रहे
भोर खाली हाथ लौटी सांझ को चाह ले पाए बसेरा रात से दोपहर ने लूट थे पथ में लिए वे सभी पाथेय  जो भी साथ थे धूप का बचपन लुटा यौवन ढला एक भी गाथा न लेकिन बन सकी रिस रही थी उम्र दर्पण देखते अंततोगत्वा विवश हारी थकी
एक लेकर आस लौटेंगे सुबह

आज दीपक राग गा लूँ

मिट रहे हैं पावसी काली घटाओं के अँधेरे  आज प्राची में उषाकी  ओढनी  लहरा रही है  आज फिर चढने लगी है धूप दिन की सीढ़ियों पर  ऑज अधरों पर तुहिन को इक कली मुस्का रही है  आज मैं  अपने हृदय के संशयों के भ्रम मिट लूँ  दूर हों अवशेष तम के, सूर्य आँगन में उगा  लूँ  आज दीपक राग गा  लूँ  अस्मिताएं जो गईं  थी खो, नया अब अर्थ पाएं  दीप  की लडियां उदित हों और फिर से झिलमिलाएँ  ओढ़ शरदीली शरद की धुप का कम्बल सुकोमल  नाचने लग जाएँ आँगन में उतर   कर के विभाएँ  छेड़ कर कुछ थिरकनें मैं रश्मियों के साज पर अब  सोचता हूँ प्रीत की मादक धुनें फिर से बजा लूँ  आज दीपक राग गा लूँ  उठ रहे संकल्प गंगा के तटों पर डुबकियाँ ले भोर सोते से उठाती आरती की मंत्रध्वनियाँ अब नई निष्ठायें ले विश्वास की पूँजी मुदित हैं खोल कर बाँहें खड़े हैं स्वागतों को द्वार गलियाँ आ रही पुरबाई लेकर पत्र जो वृन्दावनों के सोचता हू आंजुरि में किस तरह सारे संभालूँ आज दीपक राग गा लूँ झर रहे हैं कल्पतरुओं से सुमन सब अदबदा कर अल्पनायें खींचती हैं नव अजन्तायें क्षितिज पर गन्ध पीकर कुंज वन की लड़खड़ाते कुछ झकोरे धूम्र सा लहरा रहा है बांसुरी का गूँजता स्वर जो निराशा के कुह…

अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

कक्ष में बैठी हुई पसरी उदासी जम कर  शून्य सा  भर गया है  आन कर निगाहों में और निगले है  छागलों को प्यास उगती हुई तृप्ति को बून्द नहीं है  गगन की राहों में फ़्रेम ईजिल पे टँगा है  क्षितिज की सूना सा रंग कूची की कोई उँगली भी न छू पाते हैं इन सभी को नये आयाम मिला करते हैं
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं
लेके अँगड़ाई नई पाँव उठे मौसम के सांझ ने पहनी नई साड़ी नये रंगों की फिर थिरकने लगी पायल गगन के गंगातट चटखने लग गई है धूप नव उमंगों की दिन की आवारगी में भटके हुये यायावर लौट दहलीज पे आ अल्पना सजाते हैं इक नई आभ नया रूप निखर आता है
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं



पंचवटियां हुई हैं आज सुहागन  फिर से  अब ना मारीच का भ्रम जाल फ़ैल पायेगा  रेख खींचेगा नहीं कोई बंदिशों की अब  कोई न भूमिसुता को नजर लगाएगा  शक्ति का पुञ्ज पूज्य होता रहा हर युग में बात भूली हुई ये आज फिर बताते हैं  हमें ये भूली धरोहर का ज्ञान देते हैं
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

रिश्ता क्या है तुमसे मेरा

तुमने मुझसे प्रश्न किया है रिश्ता क्या है तुमसे मेरा सच पूछो तो इसी प्रश्न ने मुझको भी आ आ कर घेरा तुम अपनी वैयक्तिक सीमा के खींचे घेरे में बन्दी मैं गतिमान निरन्तर, पहिया अन्तरिक्ष तक जाते रथ का तुम हो सहज व्याख्य निर्देशन बिन्दु बिन्दु के दिशाबोध का लक्ष्यहीन दिग्भ्रमित हुआ मैं यायावर हूँ भूला भटका तुम अंबर की शुभ्र ज्योत्सना, मैं कोटर में बन्द अँधेरा सोच रहा हूँ मैं भी जाने तुमसे क्या है रिश्ता मेरा तुम प्रवाहमय रस में डूबी, मधुशाला की एक रुबाई मैं अतुकान्त काव्य की पंक्ति, जो रह गई बिना अनुशासन मैं कीकर के तले ऊँघता जेठ मास का दिन अलसाया तुम अम्बर की हो वह बदली, जो लाकर बरसाती सावन तुम संध्या का नीड़, और मैं जगी भोर का उजड़ा डेरा प्रश्न तुम्हारा कायम ही है तुमसे क्या है रिश्ता मेरा लेकिन फिर भी कोई धागा, जोड़े हुए मुझे है तुमसे हम वे पथिक पंथ टकराये हैं जिनके आ एक मोड़ पर एक अजाना सा आकर्षण हमें परस्पर खींच रहा है समझा नहीं, कोशिशें की हैं गुणा भाग कर घटा जोड़ कर प्रश्न यही दोहराता आकर हर दिन मुझसे नया सवेरा जो तुमने पूछा है रिश्ता क्या है तुमसे बोलो मेरा

जब मैं गीत नया जाता हूँ.

ऋषि वशिष्ठ का विशद ज्ञान ले
 विश्वानित्री स्वाभिमान से  जिसने समदर्शी कर जोड़ा  गीता बाइबिल और कुरान से  जो मेरा संस्कार बन गई  वही ऋचाएं दोहराता हूँ  जब मैं गीत नया जाता हूँ.
सूरा  मीरा  के  इकतारे  में  आल्हाद  पिरोती सरगम एक अलौकिक मधुर प्रीत में डूबा महक रहा वृन्दावन कालिन्दी की, चरण कमल को छूकर पुलकित होती लहरें गोकुल से मथुरा के पथ पर नित्य बिखरता दधि औ’ माखन
मुरली की मादक धुन वाली बरसाने की रुनझुन वाली पुष्प सेज पर चँवर डुलाते बलखती कदम्ब की डाली आँखो में जो आन बस गई, वही चित्र में रंग जाता हूँ जो मेरा संस्कार बन गई, वही ऋचायें दुहराता हूँ जब मैं गीत नया गाता हूँ
सन्दीपन के आश्रम में जो कृष्ण सुदामा में थी जोड़ी जिसने धधक रहे इक शर से सागर की सारी ज़िद तोड़ी जिसके लक्ष्य भेद होकर अंगुष्ठहीन भी रहे अचूके जिसके तप ने उलझी उलझी शिव शंकर की जटा निचोड़ी
मुनि अगस्त्य के सिन्धु पान पर भागीरथ के अनुष्ठान पर जिसकी गाथायें विस्तृत हैं पुष्पक की मनगति उड़ान पर जो नस नस में आन बस गईं, वही कथायें पढ़ पाता हूँ जो मेरा संस्कार बन गई , वही ऋचाएं दोहराता हूँ  फिर मैं गीत नया गाता हूँ
जो करती इतिहास सुगन्धित तानसेन की मृदु तानों …

कोई भी अनुबन्ध नहीं है

कहने को तो लगा कहीं पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है फिर भी जाने क्यों लगता है हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं हैं घेरे हुए अदेखी जाने कितनी ही लक्षमण रेखायें पसरी हुई पड़ीं हैं पथ में न जाने कितनी झंझायें पंखुरियों की कोरों पर से फ़िसली हुई ओस की बूँदें अकस्मात ही बन जाती हैं उमड़ उमड़ उफ़नी धारायें हँस देता है देख विवशता, मनमानी करता ये मौसम कहता सुखद पलों का तुमसे कोई भी अनुबन्ध नहीं है बोये बीज निरंतर नभ में,सूरज चाँद नहीं उग पाते यह तिमिराँचल अब बंजर है, रहे सितारे आ समझाते मुट्ठी की झिरियों से सब कुछ रिस रिस कर के बह जाता है भग्न हुई प्रतिमा के सम्मुख व्यर्थ रहे हैं शीश नवाते जो पल रहे सफ़लताओं के, खड़े दूर से कह देते हैं पास तुम्हारे आयें क्यों जब तुमसे कुछ सम्बन्ध नहीं है परिभाषित शब्दों ने जोड़े नहीं तनिक परिचय के धागे जो था विगत बदल कर चेहरा हुआ खड़ा  है आकर आगे विद्रोही हो गये खिंचे थे आयत में जो बारह खाने दरवाजे पर आकर पल पल साँस साँस  मज़दूरी मांगे सोंपे गए मलय के हमको मीलों फैले गहन सघन वन कितनी बार गुजर कर देखा कहीं  तनिक भी गंध नहीं है

सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई

रह गए सूने पुन: सारी दिशाओं के झरोखे रश्मियों ने दी नहीं दस्तक कोई वातायनों पे डोरियों ने बरगदों से लहर कर सन्देश भेजे वे सिमट कर रह गए भटकी हवा के अंचलों पे और मैं टूटी हुई इक साध के टुकडे उठाकर दीप कोई जल सके ये कामनाएं कर रहा हूँ झर  गए दिनमान सूखे, वर्ष की शाखाओं पर से आगतों के झुनझुने के स्वर नहीं देते सुनाई उड़  गई कर कोष रीता सावनी हर एक बदरी आरसी की धुंध में छवियाँ संवरती जा समाई और मैं सिन्दूर से पुत पा सकूं अभिषेक कोई तरुतले पत्थर बना ये लालसाएं कर रहा हूँ घुट रहीं मन में अपेक्षाएं हजारों  ढेर बन कर फ़ड़फ़ड़ाने  के लिए भी पर कोई बाकी नहीं है उम्र की बालू खिसकती मुट्ठियों में से समय की दृष्टि में उपलव्धि कोई भी समा पाती नहीं है जल चुकी है जो अगरबत्ती, उसी की राख ले मैं गंध के अवशेष पर आराधनायें कर रहा हूँ अर्थ अपना खो चुके संकल्प के उद्यापनी पल हर कथा का सामने आ लग गया है  तथ्य  खुलने  संस्कृतियों की धरोहर मान कर रक्खी हृदय में  संशयों के घोल में वह लग पडी है आज घुलने  और मैं क्षत हो चुके इक ग्रन्थ के पन्ने  बटोरे  रूप नव पा जाऊं ये संभावनाएं कर रहा हूँ

भाग्य रेख में कुछ संशोधन

ओ अनामिके जब से तेरा नाम जुड़ा मेरे अधरों से उस पल से मन के सब गहरे भावों का हो गया विमोचन लगीं गूँजने सुधि के आँगन, लैला शीरीं हीर कथायें गुलमोहर के साथ दुपहरी निशिगंधा को ला महकायें बरखा केबून्दों से मिलकर गूँज उठे सरगम के सब स्वर और सितारों की छाया में गीत सुनाने लगीं विभायें ओ संकल्पित! जब से तेरा नाम जुड़ा है संकल्पों से उस पल से लगता जीवन को मिला और कुछ नया प्रयोजन हुई पुन: जीवन्त लवंगी के सँग कथामयी मस्तानी संयोगिता,सुभद्रा,रुक्मिणी और सती की प्रेम: कहानी देवलोक का त्याग उर्वशी करती डूब भावना जिसमें वैसी ही भावना अचानक लगी मुझे जानी पहचानी ओ समर्पिते ! जब से तेरा मूक समर्पण महसूसा है तब से स्वर्णिम आभाओं से दीप्त हुए हैं मेरे लोचन लिखे गये अध्याय स्वत: कुछ नये ज़िन्दगी की पुस्तक में बहती हुई हवाओं ने लीं पीपल की छाया में कसमें जुड़े करों में झरे गगन से अभिलाषा के सुमन अनगिनत फिर से गहरी हुईं देवयानी ने जो जोड़ी थीं रस्में सजलतूलिके ! छू ली तूने जबसे मेरी खुली हथेली तब से मेरी भाग्य रेख में हुए अनूठे कुछ संशोधन

बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी

आज अचानक एक पुरानी  पुस्तक से सूखी हुई फूल की पांखुर फिसल पडी इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी
यौवन की देहरी पर जब थी उम्र चढी स्वप्न नयन के सभी हुए थे सिंदूरी उड़ने लगी पतंगें बन कर आकांक्षा सिमट गई नभ से मुट्ठी तक की दूरी मन के वातायन में गाती थी कोयल राजहंस के पंख उँगलियों पर रहते अभिलाषा सावन सी झड़ी   लगाती थी  और उमंगो के झरने अविरल बहते 
वे पल जब निश्चय नव होते थे प्रतिदिन डगर चूमने पांवों को खुद  निकल पडी इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल
कोई शब्द होंठ को आकर छूता था अनजाने ही गीत नया बन जाता था मन संध्या की सुरभि ओढ़ महकी महकी बना पपीहा मधुरिम टेर लगाता था बिना निमंत्रण रजनी की उंगली पकडे तारे सपने बन आँखों में आते थे और चांदनी के झूले पर चढ़ चढ़ कर नभ गंगा के तट को जा छू आते थे

चित्र अजन्ता के बाहों में भर भर कर एलोरा में टांगा करते घड़ी घड़ी इन्द्रधनुष बन गये  हजारों हाथों में बाँध तोड़ यादों की सरिता मचल पडी
कोई पत्र द्वार तक जब आ जाता था चढ़ा डाकिये की खाकी सी झोली में लगता था कहार कोई ले आया है बिठला नई नवेली दुल्हन डोली में खुले पत…

कर दी है हड़ताल आजकल

भाव शब्द में जब ढलते हैं, तब तब गीत नया बन जाता लेकिन मेरे भावों ने तो कर दी है हड़ताल आजकल गति का क्रम कोल्हू के चारों ओर चल रहे बैलों जैसा परिवर्तन की अभिलाषा के अंकुर नहीं फूट पाते हैं हाथ उठा कर दिन का पंछी करे भोर की अगवानी को उससे पहले लिये उबासी निमिष पास के सो जाते हैं सिक्के ढाल ढाल किस्मत के, बदले थी जो विधि का लेखा लिये हाथ में कासा फ़िरती चाँदी की टकसाल आजकल रोज क्षितिज की दहलीजों पर सपनों की रांगोली काढ़े चूना लिये दिवस का, गेरू सांझ उषा के रंग मिला कर लीपा करती है अम्बर की अंगानाई को आस घटा से और शंख सीपियां चमकती बिजली के ले अंश सजा कर भ्रमित आस की दुल्हनिया का यह श्रंगार सत्य है कितना कल तक जो बहले रहते थे, करते हैं पड़ताल आजकल बदल रहे मौसम की अँगड़ाई में सब कुछ हुआ तिलिस्मी पता नहीं चलता आषाढ़ी घटा कौन  सी बरस सकेगी हर इक बार बुझे हैं दीपक अभिलाषा के किये प्रज्ज्वलित किसे विदित है  द्रवित-प्यास इस मन चातक की कहाँ बुझेगी जब से सुना हुआ दिन फ़ेरा करती यहाँ समय की करवट जो मिलता कहता है पूरे होगये, बारह साल आजकल

लगी है हवा प्यार के गीत गाने

छनी बादलों की झिरी में से किरणें लगीं घोलने नाम तेरा हवा में पिरो कर जिसे पत्तियों के सुरों में लगी है हवा प्यार के गीत गाने मचलते हुए नाव के पाल चढ़ कर सुनाने लगी सिन्धु को वह कहानी परस मिल गया नाम के अक्षरों का महक थी उठी दोपहर रात रानी खिले थे  कमल रात के आंगनों में उतर आ गये थे धरा पे सितारे तेरे नाम सुन सोचता शशि रहाथा   तुझे  देखे या फिर  स्वय़ं को निहारे अधर के पटों से रही झांकती थी तेरी दूधिया जो खिली मुस्कुराहट उसे अपने सिर पर बना कर के आंचल लगी रात को चांदनी खिलखिलाने जगी नींद से कोंपलों की पलक पर नये चित्र खींचे हैं पुरबाईयों ने किनारों को सोने के घुंघरू की खनखान  सुनाई तरंगों की शहनाईयों ने घटा से पिघल   गिर रही, पी सुधा को लगी पंखुरी पंखुरी मुस्कुराने बजी जलतरंगों का आरोह छूकर तटी दूब भी लग पड़ी गुनगुनाने उठा छोड़ आलस के प्रहरों को मौसम रखी अपने कांधे पे कांवर बसन्ती कि जिसमें रखे छलछलाते कलश से हुए भीग पल और भी कुछ सुहाने उड़ी गंध की चूड़ियोंको पहन कर लगी झनझनाने क्षितिज की कलाई सजा कर जिसे सरगमों में गगन ने नयी प्रीत की इक गज़ल गुनगुनाई तेरा नाम सारंगियों के सुरो में ढला तो लगीं नॄत्य करने दिशायें तेरा …