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Showing posts from December, 2013

चाहिये था क्या हमें, ये सोचते ही रह गये

कल्पना के पृष्ठ शब्द खोजते ही रह गयेचाहिये था क्या हमें, ये सोचते ही रह गयेप्रश्न तो हजार रोज भोर सांझ उठ रहेकिसलिये हवाओं की गली में स्वप्न लुट रहेरख रही उमीद जिस सिरे से डोर बान्ध करजा रहा है किसलिये वही सुदूर चाँद परबो रहीं दिलासे नित्य सैकड़ों ही क्यारियाँदूर दृष्टि से रही हैं रोशनी की बारियाँज्ञात था हमें कि ये सदा उधेड़ बुन रहेकिसलिये उन्हें ही बार बार सभी चुन रहेये व्यथा नहीं अकेले एक गांव देश कीबात हर गली,शहर की है हर इक प्रदेश कीदृष्टि के वितान चित्र खोजते ही रह गयेचाइये था क्या हमें ये सोचते ही रह गयेहुआ प्रतीत चाह कोई मन में गुनगुना रहीअपेक्षितों के पंथ में खड़ी हो गीत गा रहीमगर जुड़ा नहीं कभी भी परिचयों का सिलसिलारहे गणित ले जोड़ते किसे मिला है क्या मिलाना भाव हम समर्पणों के आंजुरी में भर सकेसुलह कभी परिस्थिति से एक पल न कर सकेजवाब पास में रहे सवाल ढूढ़ते रहेकभी हमारे दर्प के किले जरा नहीं ढहेधूप को मरुस्थलों में दी चुनौती दोपहरकँपकँपाये जब उगा था भोर का प्रथम प्रहरथे हमारे तर्क जोकि टोकते ही रह गयेचाहिये था क्या हमें ये सोचते ही रह गये

आज खुल कर के मुझे गीत कोई गाने दो

तुमने आंसू ही सदा सौंपे हैं इन आँखों को आज दो पल को भले, होंठ को ,मुस्काने  दो तुमसे जितनी भी अपेक्षाएं थीं अधूरी रहीं पास रहकर भी सदा बढ़ती हुई दूरी रही एक धारा ने हमें बाँध रखा है केवल वरना तट जैसी सदा मिलने की मज़बूरी रही तुमने आशाएं बुझाईं हैं भोर-दीपक सी आज संध्या के दिए की तरह जल जाने दो भावनाओं की पकड  उंगली चला जब उठ कर शब्द हर बार रहा कंठ में अपने घुट कर अनकहे भाव छटपटाते हैं बिना कुछ बोले जैसे आया हो कोई दोस्त से अपने लुट कर मेरे स्वर पर हैं रखे तुमने लगा कर ताले आज खुल कर के मुझे गीत कोई गाने दो पंथ में घिरते रहे मेरे, अँधेरे केवल मेरापाथेय भी करता है रहा मुझ से छल वक्त द्रुत हो गया परछाइयाँ  छू कर मेरी पोर उंगली के नहीं छू भी सका कोई पल तुमने बांधे हुए रक्खा है नीड़ में अपने आज तो मुक्त करो, मुझको कहीं जाने दो

राज्य की नीतियों के कथन हो गये

जितने आशीष के शब्द हमको मिलेराज्य की नीतियों के कथन हो गये
 ज़िन्दगी की पतंगें हवा मेंउड़ीं वक्त मांझा लिए काटता ही गया दिन का दर्जी लिये हाथ में कैंचियाँ“रात के स्वप्न सब छाँटता ही गया  बह गईं जो हवायें कभी मोड़ सेलौट कर फिर इधर को चली ही नहींबुझ गये भोर में दीप की बातियाँसांझ कहती रही पर जली ही नहींपौष की रातके पल सजाये हुये                          जेठ की धूप जैसी तपन हो गयहर उगी भोर बुनती रही आस कोदोपहर थाल भर धूप ले आयेगीछाई ठिठुरन हवाओं भरे शीत कीचार पल के लिये थोड़ा छँट  जायेगीपर जो सूरज के रथ का रहा सारथीचाल अपनी निमिष पर बदलता रहाऔर गठबन्धनों की दिवारें उठासिर्फ़ आश्वासनों से ही छलता रहाऔर हम आहुति ले चुके यज्ञ कीराख में दब के  सोई अगन हो गयेपंथ ने जो निमंत्रण पठाये हमेंथे अपेक्षाओं की चाशनी में पगेनीड़ के थे दिवास्वप्न बोये हुयेउनके आधार को कोई गमले न थेपांव की थी नियति एक गति से बँधीबिन रुके अनवरत जोकि चलती रहीउम्र अभिमंतर पासों पे डाले हुयेखेलते खेलते हमको छलती रहीपास के शब्द स्वर में नहीं ढल सकेथरथराते अधर की कँपन हो गये

चाह मेरी है उस डलिया की

तुमजिसडलियामेंउपवनसेलातीहोफूलोंकोचुनकरचाहमेरीहैउसडलियाकीमैंबनजाऊँएककिनारीत्रिवलीकामधुपरससहजहीलिखेमेरीकिस्मतकीरेखाउंगलियोंकापरससुधा बन करेप्राणसंचारशिरामेंक्रमसेफूलोंकेरखनेमेंबारबारसौजन्यतुम्हारासुरभिघोलतारहेनिरन्तरमेरीइसअनयनीगिरामेंमैंशतगुणीपुलकसेभरलूँ, छूलेसाड़ीमुझेतुम्हारीचाहमेरीहैउसडलियाकीमैंबनजाऊँएककिनारीजगीभोरमेंसद्यस्नाततुमचलोकियेश्रंगारसमूचेऔरहाथमेंमुझेउठाओ, स्वप्ननिशाकेलेनयनोंमेंफूलोंपरपड़गईओससेवेजबहोलेंगेप्रतिबिम्बितमैंपालूँगाकुछ्आभायेंमीतउसघड़ीसबअयनोंमेंलालायितहोरहेंपरसकोअलकापुरियोंकीफुलवारी

ज़िन्दगी जिन उंगलियों को थाम कर

ज़िन्दगी जिन उंगलियों को थाम कर के मुस्कुराईस्पर्श जिनका बो गया सपने हजारों ला नयन  मेंआस्था के दीप में लौ को जगाया तीलियाँ बनसाथ रह देती दिशायें चेतना में औ शयन मेंआज ढलती सांझ ने मुड़ कर मुझे देखा तनिक तोदृष्टि   के वातायनों में याद बन वे आ गईं हैंअहम अपना खोलने देता नहीं पन्ने विगत केदंभ की शहनाईयों में फ़ूँक भरता है निशा दिनकटघरे में आप ही बन्दी बनाकर के स्वयं कोसोचता उसके इशारों पर चले हैं प्रहर और छिनएक ठोकर पर दिवस की सीढियों पर से फ़िसल करताश के महलों सरीखे स्वप्न दिन के ढा गई हैपांव तो आधार बिन थे दृष्टि   रख दी थी गगन परहै धरा किस ओर देखा ही नहीं झुक कर जरा भीनींव सुदृढ़ कर सकें विश्वास की सारी शिलायेंखंडहर, सन्देह की परछाई से घिर कर हुईं थीथा नहीं कोई सिरे उत्थान के जो थाम लेताज़िन्दगी केवल त्रिशंकु की दशायें पा गई हैपंथ पर तो मोड़ सारे रह गये होकर तिलिस्मीथे सभी भ्रामक चयन जो पांव ने पथ के किये थेहै जहां से लौट कर पीछे चले जाना असंभवमान कर वृत्तांत जिनको चुन लिया वे हाशिये थेकर रही थी तर्क लेकर बोझ इक अपराध का जोभावना करते समर्पण सामने फिर आ गई  हैअब उतरती रात लाई थाल में दीपक सज…