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Showing posts from October, 2013

केवल पीर रहा बरसाता

अँगनाई में किसी राशि की जाकर ठहरे सूरज चाहेकैलेन्डर निज  व्यवहारों में कोई अंतर नहीं दिखाताचौघड़िये दिन के हों चाहे संध्या भोर निशा के हों यासभी आँकड़े षड़यंत्री हैं, उत्तर नहीं भिन्न मिल पातासावन भादों क्वार पौष हो या मौसम हो कभी चैतियाअम्बर  तो बिन बादल के भी केवल पीर रहा बरसाताजितनी बार उगाईं मन ने अपनी क्यारी में मंजरियांउतनी बार अंकुरित होते रहे नागफ़नियों के काँटेनयनों के गंगाजल ने जिन पौधों को सींचा था प्रतिपलउगी हुई विषबेलों ने वे एक एक कर कर के बाँटेबीज मोतिया बेला के हों या गुलाब की रेपें कलमेंबागीचा पर आक धतूरा ही केवल वापिस लौटातागतियाँ हर इक बार घड़ी की छूते दृष्टि हुईं हैं द्रुत हीइसीलिये हर बार प्राप्ति का पल पोरों से परे रह गयापग के उठ पाने से पहले दिशा राह ने अपनी बदलीनिर्णय का पल असमंजस में घिरा ह्रदय से दूर रह गयायद्यपि भोर नित्य भर देती है संकल्पों से आंजुर कोबदला हुआ धूप का तेवर सहज सोख उसको ले जाताओढ़ी हुई अवनिकाओं से छुपता नहीं सत्य चेहरे कामुस्कानें बतला देती हैं कितना पिया अश्रु का क्रन्दनरहती हो अदृश्य भले ही नयनों से तरी पगडंडीउसके चिह्न बता देती है विद्रुप हुई अध…

वही प्रश्न दस्तक देते हैं

जिन प्रश्नों का उत्तर कोई मिला नहीं हैं कभी कहीं सेवही प्रश्न दस्तक देते हैं आज पुन: द्वारे पर आकरकिसने किसके लिये लगी थी कल के पट पर सांकल खोलीकौन खेलता गै हाथों की रेखाओं से आंख मिचौलीकहाँछुपे हैं इतिहासों में वर्णित स्वर्णमयी रजनी दिनकिधर वाटिकायें गूँजे है जिनमें प्रीत भरी बस बोलीयद्यपि ज्ञातन उत्तर का रथ मुडन सकेगा इन गलियों को बार बार कर रहीं प्रतीक्षा आँखें मोड्क्ष गली के जाकर क्या कारण था क्या कारण है परिवर्तन की नींद न टूटे किसने खींचे राज पथों पर ही क्यों आ बहुरंगी बूतेभला किसलिए सावन चलता रहा पुराणी ही लीकों पर कटते रहे एकलव्यों के ही क्यों कोई कहे अंगूठे कब से नियमावलिया  क्यों हम आँख मूड कर रहे अनुसरण कोई भेद नहीं बतला पाया है यह हमको समझा कर किये अनकिये प्रश्नों में ही दिवस निशा नित उलझे रहते .क्यों विपरीत दिशाओं में ही गंधों वाले झोंके बहते क्यों लुटती हैं विकच प्रसूनों की पांखुर ही वन उपवन में क्यों कांटे भी नहीं सहायिकाओं पर जा कर सजाते रहते प्रश्नाचिहं की  झुकी कमर पर प्रश्नों का बोझा है भारी आशा यही कोई उत्तर आ बोझ तनिक जाए हल्का कर

रोयें हम या मुस्कुराएँ

ज़िंदगी में हैं हजारों एक तो पहले व्यथाएं    
आपकी फिर बात सुन कर रोयें हम या मुस्कुराएँ भावना के प्रकरणों की पूर्व निर्धारित समस्या एक मन को छू रखें औ दूसरे से बच  निकलते एक के घर पर छिटकती चांदनी सी चंद  किरणें दूसरे को अग्नि देते दीप जब भी जल पिघलते 
हो नहीं पातीं सभी की एक जैसी मान्यताएं रोयें हम या मुस्कुराएँ कल्पना की जब उड़ानें बाँधती पूर्वाग्रही पर  तो सहज विस्तार उनका एक मुट्ठी में सिमटता दृष्टि के ही कोण पर निर्भर रहा है दृश्य सारे कौन उसको किस तरह से देखता है या समझता कौन से आकाश में हम पंख अपने फ़डफ़डाये रोयें हम या मुस्कुरायेंशब्दकोशों में नहीं सीमित रहा है ज्ञान केवलमाँगता है चेतना की सार्थकतायें निरन्तरजो विनय सिखला नहीं सकती हुई विद्या निरर्थकप्राण में पाषाण में करता यही बस एक अन्तरशोर में इक भीड़ के सारंगियाँ कब तक बजायेंरोयें हम या मुस्कुरायें

भोर की अलगनी पे टँका रह गया

भोर की अलगनी पे टँका रह गया
कल उगा था दिवस सांझ के गाँव में
रात फिर से सफ़र में रुकी रहगयी
गिनते गिनते जो छाले पड़े पाँव मेंचांदनी ने प्रहर ताकते रह गए उंगलियाँ थामने के लिए हाथ में दृश्य की सब दिशाएँ बदल चल पडी रुष्ट होते हुए बात ही बात में नभ की मंदाकिनी के परे गा रही एक नीहारिका लोरियां अनवरत पर किसी और धुन पे थिरकता हुआ आज को भूल कर दिन हुआ था विगत