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Showing posts from September, 2013

अधर की रंगत लेकर उगें सवेरे

हवा चाहती है आरक्त कपोलों को रह रह कर चूमेअभिलाषित है उषा अधर की रंगत लेकर उगें सवेरेदोपहरी आतुरा ओढ़ ले छिटकी हुई धूप चूनर सेलालायित है निशा तुम्हारे चिकुरों से ले सके अँधेरेप्रतिपादित सब नियम भौतिकी के चाहें खुद टूट बिखरनाद्वार तुम्हारे रहना चाहे छोड़ गगन हर एक सिताराउंगली की पोरों से बिखरी हुई हिना कचनार बन गईप्रतिबिम्बित जब हुआ अलक्तक पग से तो गुलाब मुस्कायेपायल की रुनझुन से जागी बरखा लेले कर अँगड़ाईवेणी थिरकी तो अम्बर में सावन के बादल घिर आयेखंजननयने, स्वयं प्रकृति भी चाहे तुमसे जुड़ कर रहनापांव तुम्हारे छूना चाहे उमड़ी हुई नदी की धाराकंगन जब करने लगता है हथफूलों से गुपचुप बातेंतब तब गूँजा करती जैसे सारंगी की धुन मतवालीदृष्टि किरण किस समय तुम्हारी शिलाखंड को प्रतिमा कर देआतुरता से बाट निहारे ठिठकी हुई सांझ की लालीज्ञात तुम्हें हो दिशा दिशायें तुमसे ही पाने को आतुरप्राची और प्रतीची ने तुमसे ही तो ले रूप सँवारागंधों को बोती क्यारी में धूप केसरी परिधानों कीचन्दन के वृक्षों पर जिससे आने लगती है तरुणाईऔर हवाके नूपुर की खनकें जिससे उपजा करती हैंशिल्पकार के स्वप्नों वाले तन की ही तो है परछाई…

भोज पत्र पर लिखी हुई सारी गाथायें

तुम्हें देख कर शब्द शब्द ने रह रह अपना किया  आकलनलगे जोड़ने रूप तुम्हारे से वे अपनी परिभाषायेंरक्तिम अरुण पीत आभायें नतमस्तक हैं पास तुम्हारेचिकुरों की रंगत से अपना मांग रहे परिचय अंधियारेमंदिर में बजती घंटी में घुली हुई सारंगी की धुनलालायित है मुखर कंठ का स्वर होकर के उन्हें संवारेसदियों के दर्पण में अपने प्रतिबिम्बों को देख रही हैंरूप प्रेम की भोज पत्र पर लिखी हुई सारी गाथायेंमृगी मीन नीरज की आशा दें प्रतिरूप तुम्हारे लोचनमंथन से प्राकट्य मोहिनी तुमसे ही मांगे सम्मोहनपारिजात कचनार  मोगरा जूही पुष्पराज सब सोचेंकिसका भाग्य तुम्हारे तन को चूमे पाकर के अनुमोदनस्वर्ण रजत के माणिक मुक्ता जड़े हुये सारे आभूषणदेह तुम्हारी आलिंगन में भर लेने की आस लगायेंपग की गति से बँधना चाहें सूरज चन्दा और सितारेनक्षत्रों की दृष्टि तुम्हारी भॄकुटि भंगिमा को अनुसारे मौसम की थिरकन रहती है बँधकर चूनर के कोरों मेंउडे झालरी तब ही वह भी करवट लेकर पाँव पसारे निशि वासर  संध्या, अरुणाई उषा  सब ही अभिलाषित हैं सामौ सारथी के कर से तुम हाथ बढ़ा  ले लो वल्गाएँ
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सितम्बर का तीसरा सप्ताह

तीजे सप्ताह सितम्बर के  सूरज की गर्दन झुक जातीतो तिरछी हुई भवों वाला गुस्सा ठडा होने लगतादिन अकड़े हुये पसारे थे पांवों को सीमा के बाहरउनका कद अपनी सीमा में वापिस आकर भरने लगताअठखेली करते हुये पवन के झोंके दिशा बदलते हैंउत्तर से उड़ी पतंगों की डोरी थामे आ जाते हैंतो सिहरन से बजने लगती है जल तरंग मेरे तन मेंअधरों के चुम्बन प्रथम मिलन के यादों में भर  जाते हैंघर के बाहर पग रखते ही ठंडक में डूबे झोंके कुछमेरे गालों को हाथ बढ़ा कर हौले से छू लेते हैंतो झंकृत होते स्पंदन से आवृतियां बढ़ती धड़कन कीतब  गुल्मोहर के तले हुये भुजबन्धन फिर जी लेते हैंपानी में गिरे दूध जैसी धुंधली दोशाला को ओढ़े अलसाई  भोर उबासी ले रह रह लेती है अँगड़ाईघुलते हैं प्रथम आरती के स्वर जैसे सभी दिशाओं मेंजीवित  हो कदम बढ़ाती है गति की फिर नूतन तरुणाईआंखों के आगे उगे दिवस की खींची हुई रूपरेखाके खाली खाली सब खाने  लगता खुद ही भर जाते हैंतो साथ तुम्हारे जो बीते, उन सुखद पलों के स्वर्णचिह्नसंध्या तक की दीवारों पर बन भित्तिचित्र जड़ जाते हैं

गीतमय करने लगा हूँ

आपका ये तकाजा लिखूँ गीत मैं कुछ नई रीत के कुछ नये ढंग केज़िन्दगी की डगर में जो बिखरे पड़े, पर छुये ही नहीं जो गये रंग केमैने केवल दिये शब्द हैं बस उन्हें सरगमों ने बिखेरा  जिन्हें ला इधरकामना शारदा बीन को छोड़ कर राग छेड़े नये आज कुछ चंग पे -------------------------------------------------------- था कहा तुमने मुझे यह ज़िन्दगी है इक कहानीहर कड़ी जिसमें निरन्तर रह रही क्रम से अजानीएक लेखक की कथानक के बिना चलती कलम सीचार पल रुक, एक पल बहती नदी की बन रवानीमैं तुम्हारे इस कथन की सत्यता स्वीकार करताअनगढ़ी अपनी कहानी गीतमय करने लगा हूँचुन लिया अध्याय वह ही सामने जो आप आयादे दिया स्वर बस उसी को, जो अधर ने गुनगुनायाअक्षरों के शिल्प में बोकर समूची अस्मिता कोतुष्टि उसमें ढूँढ़ ली जो शब्द ने आ रूप पायाजो टपकती है दुपहरी में पिघल कर व्योम पर सेया निशा में, मैं उसी से आँजुरी भरने लगा हूँरात की अंगड़ाईयां पुल बन गईं हैं जिन पलों काआकलन करती रहीं आगत,विगत वाले कलों काबुन रहे सपने धराशायी हुई हर कल्पना परहैं अपेक्षा जोड़ती ले बिम्ब चंचल बादलों काज्ञात होना अंकुरित नव पल्लवों का है जरूरीइसलिये मैं आज पतझर की तरह…

रंग भरने से इनकार दिन कर गया

एक भ्रम में बिताते रहे ज़िंदगी यह न चाहा कभी खुद को पहचानते मन के आकाश पर भोर से सांझ तक कल्पनाएँ नए चित्र रचती रहीं तूलिका की सहज थिरकनें थाम कर कुछ अपेक्षाएं भी साथ बनती रहीं रंग भरने से इनकार दिन कर गयासांझ के साथ धुंधली हुई रेख भी  और मुरझा के झरती अपेक्षाओं को रात सीढी  उतरते रही देखती हम में निर्णय की क्षमताएं तो थी नहीं पर कसौटी स्वयं को रहे मानते चाहते हैं करें आकलन सत्य का बिम्ब दर्पण बने हम दिखाते रहें अपने पूर्वाग्रहों  से न होवें ग्रसित जो है जैसा  उसे वह बताते रहें किन्तु दीवार अपना अहम् बन गया जिसके साए में थी दृष्टि  धुंधला गई ज्ञान  के गर्व की एक मोटी परत निर्णयों पर गिरी धुल सी छा  गई स्वत्व अपना स्वयं हमने झुठला दिया ओढ कर इक मुलम्मा चले शान से जब भी चाहा धरातल पे आयें उतर और फिर सत्य का आ  करें  सामना तर्क की नीतियों को चढा ताक पर कोशिशें कर करें खुद का पहचानना पर मुखौटे हमारे चढाये हुए चाह कर भी न हमसे अलग हो सके अपनी जिद पाँव अंगद का बन के जमी ये ना संभव हुआ सूत भर हिल सके ढूँढते रात दिन कब वह आये घड़ी मुक्त हो पायें जब अपने अभिमान से