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Showing posts from August, 2013

गीत के फूल जो पाँव में आ गिरे

मैं प्रतीक्षा लिए अनवरत हूँ खडा  पंथ के इक अजाने उसी मोड पर  तुम गए थे हवाओं की उंगली पकड  एक दिन जिस जगह पर मुझे छोड कर  आस का दीप हर दिन जला फिर बुझा  वर्त्तिका की मगर मांग सूनी रही  आतुरा दृष्टि की भटकनें थरथरा वक्त के साथ चल होती दूनी रही  अटकलों के विहग मन के आकाश पर  हर घड़ी पंख थे फ़डफ़डाते रहे  मेघ के साथ सन्देश भेजे हुए  धुप के साथ में लौट आते रहे  जानता चाहते लौटना तुम इधर  किन्तु संभव नहीं व्यूह कोई तोड़कर  कल्पना के बनाता रहा चित्र, निज  कैनवस पर दिवस रोज आता हुआ  सांझ ढलते हुए, तीर बन कर चुभा  रंग उनमें निराशा का भरता हुआ  चांदनी रात की रश्मियाँ,बिजलीयाँ बन के अंगनाई पे मन की गिरती रहीं  सांवली बदलियाँ नैन के व्योम में  मौसमों के बिना आके तिरती रहीं  यह गणित आया मेरी समझ में नहीं  कर, घटा भाग देखा गुणा जोड  कर  प्यार मदिराई गति के पगों की तरह डगमगाते हुए साथ चलता रहा  वक्त दरजी बना, भावना के फ़टे वस्त्र सींते  हुए नित्य छलता रहा  देव की मूर्तियों से रहे दूर तुम कक्ष में कैद हो मंदिरों में घिरे  एक भी तुमने बढ कर उठाया नहीं  गीत के फूल जो पाँव में आ गिरे  भाग्य की छाँव भी स्पर्श हो न सकी मुझसे आगे निकलता र…

व्याकरण के खोलते हो द्वार जिनसे

कल्पना के जिस क्षितिज से शब्द यह तुमने बटोरे बाँध लाये सन्दली जिस वाटिका से यह झकोरे कुछ पता उनका हमें भी मित्र बतलाऒ कृपा कर रख सकें हम शब्द अपने इस तरह से फिर सजा कर सीखना तो है बहुत पर कोष क्षमता का तनिक सा धैर्य रख कर तुम हमें बस नित्य सिखलाते रहो ना. कुंजियां वे व्याकरण के खोलते हो द्वार जिनसे कूचियां वे घोलते हो शब्द में ला स्वर्ण जिनसे अंश उनका दो हमें या दो तनिक परछाईं ही बस बुन सकें हम भी जरा सा शब्द में कोई मधुर रस ज्ञात तुमको ज्ञात हमको मन निरा बंजर हमारा किन्तु बन कर धार नदिया की हमारे पर बहो ना ला सहज मधुपर्क हर इक बात में तुम घोलते जो सरगमें जिनमें पिरोकर शब्द तुम हो बोलते जो बून्द इक, आरोह औ अवरोह दो थोड़ा हमें भी पा सकें रज एक कण अभिव्यक्तियों की देहरी की जानते यह    झोलियाँ    संकीर्ण हैं सारी हमारी  पर हमारी प्राप्ति की लघुताओं    को थोडा सहो ना  भावना के जिस घने वटवृक्ष की तुम छांव देते नाव जिसको कल्पना के सिन्धु में  तुम नित्य खेते वे हमारे परिचयों के सूत्र से भी जोड  दो अब कर सकें सामीप्य उनका  हम तनिक तो प्राण ! अनुभव पंथ है लम्बा दिशायें   हैं सभी    हमसे अजानी बोध देने तुम हमारी     ब…

पृष्ठ उनके खोलते हैं

जानते हो मीत ! सुधियों की घनी अमराईयों में याद के पाखी निरन्तर डाल पर आ बोलते हैं रख दिया था ताक पर मन ने उठा जिन पुस्तकों को फ़ड़फ़ड़ाकर पंख अपने, पृष्ठ उनके खोलते हैं संधियो पर उम्र की, जो चित्र खींचे थे कमल पर राह में जो चिह्न छोड़े  लड़खड़ाने से संभल कर दृष्टि के गुलमोहरों ने रात दिन जो सूत काते अनकहे अनुबन्ध की कुछ पूनियों को आप वट कर पृष्ठ से रंगीन बीती सांझ की अंगड़ाईयों के रंग लेकर फ़िर हवा की लहरियों में घोलते हैं वे सुनहरे पल कि जब संकल्प था आकाश छू लें कर सकें चरितार्थ गाथायें,बढ़ा पग नाप भू लें कल्पना की दूरियों को मुट्ठियों में भर समेटें इन्द्रधनुषों के हिंडोले पर हवा के साथ झूलें मन उमंगों की कटी पाँखें निहारे मौन गुमसुम खोज लेने को गगन जब वे परों को तोलते हैं करवटें लेकर समय ने दृश्य कितनी बार बदले चाहना थी आगतों का अनलिखा हर पृष्ठ पढ़ ले मोड़ ले अनुकूल कर धाराओं का निर्बाध बहना हर दिवस को फूल की पांखुर, निशा को ओस कर ले कामनायें पत्र कदली के बने लहरायें जब जब वे नियति के चक्र बन कर बेर के सम डोलते हैं

याद की कुछ खिड़कियाँ खोलें

चलो हम आज फिर से याद की कुछ खिड़कियाँ खोलें  चलो देखें वही बस की प्रतीक्षा का सुनहरा पल  जहां थी उड गई सहसा तुम्हारी चूनरी धानी  गई  थी छू कपोलों को मेरे बन पंख तितली के  कहा था कुछ,हुई मुश्किल वे सब बातें समझ पानी  वही इक दृश्य सपना कर नयन में आँज  कर सो लें  पलट कर पृष्ठ वे खोलें नदी के रेतिया तट पर  लिखी थी पाँव के नख ने इबारत कोई धुंधली सी  किया इंगित टहोके से मुझे छू कर ज़रा हौले  बदन  पर तैरती अब भी छुअन उस एक उंगली की  अधर फिर फिर यही कहते उसी अनुभूति के हो लें  चलो फिर खींच लें हम कैनवस पर गुलमोहर वोही उगा था जो कपोलों पर तुम्हारे, दृष्टि चुम्बन से छिड़ी जो थरथराहट से अधर की, जल तरंगों सी उसे हम जोड़ लें मन कह रहा है आज धड़कन से इन्हें हम डोरियों में दृष्टि की फिर से चलो पो लें