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Showing posts from June, 2013

पंख कटा कर रह जाते हैं

सांझ ढले घिरने लगती है आंखों में जब जब वीरानीनैनीताली संदेशे जब खो जाते जाकर हल्द्वानीसंचित पत्रों के अक्षर जब धुंआ धुंआ हो रह जाते हैंशेष नहीं रहती हैं गंधें,जिन पूलों को किया निशानीऔर टपकती है चन्दा से पीली सी बीमार रोशनीआशाओं के पाखी अपने पंख कटा कर रह जाते हैंदिन के पथ पर दिख पाता है कोई चिह्न  नहीं पांवों कापगडंडी को विधवा करता है आभास तलक गांवों काखत्म हो चुके पाथेयों की झोली भी छिनती हाथों सेजो चेहरा मिलता है, मिलता ओढ़े शून्यपत्र नामों का  छत को शीश ओढ़ लेने की अभिलाषाओं के सब जुगनूउच्छवासों की गहरी आंधी में उड़ उड़ कर बह जाते हैंजब संकल्प पूछने लगते प्रश्न स्वयं ही निष्ठाओं सेडांवाडोल आस्थाओं की जो विकल्प हों उन राहों सेपीढ़ी पीढ़ी मिली धरोहर भी जब बनती नहीं विरासतलगता है कल्पों का बोझा जुड़ता है अशक्त कांधों सेअसमंजस के पल सुरसा के मुख की तरह निरंतर बढ़तेढाढस के पल पवनपुत्र से बने सूक्ष्म ही रह जाते हैंसूखी हुई नदी के तट का प्यास बुझाने का आश्वासनसुधियों के दरवाजे को खड़काता है खोया अपनापनआईने के बिम्ब धुंआसे, और धुंआसे हो जाते हैंसाथ निभाता नहीं संभल पाने का कोई भी संसाधनतब हाथों से…

है न संभव गीत कोई

शब्द से होता नहीं है अब समन्वय भावना कारागिनी फिर गुनगुनाये, है न संभव गीत कोईखो चुकी है मुस्कुराहट, पथ अधर की वीथिका कानैन नभ से सावनी बादल विदा लेते नहीं हैंकंठ से डाले हुए हैं सात फ़ेरे सिसकियों नेपल दिवस के एक क्षण विश्रांति का देते नहीं हैटूट बिखरी डोरियों के हाथ में टुकड़े उठा करबिम्ब से अपने अपरिचित हो ह्रदय की प्रीत रोईहो गईं वर्तुल सभी रेखायें हाथों में खिंची जोलौट क आईं वहीं पर थीं चलीं इक दिन जहाँ सेज़िन्दगी के पंथ की सारी दिशायें दिग्भ्रमित हैंहै अनिश्चित जायेंगी किस ओर आईं हैं कहाँ सेदीप सब अनुभूतियों के टिमटिमा कर बुझ रहे हैंआस सूनी, इक शलभ को कर सकेगी मीत, खोईडँस गया है स्वप्न के वटवॄक्ष, फ़न फैलाये पतझरदॄष्टि के नभ पर उगे हैं सैंकड़ों वन कीकरों केबुझ गईं सुलगी प्रतीक्षा की सभी चिंगारियाँ भीचिन्ह पांवों के न बनते पंथ बिखरे ठीकरों पेधुन न गूँजे बांसुरी की, शुश्क कालिन्दी हुई हैऔर गगरी रिक्त, संचय का गँवा नवनीत रोई

अर्चना का दीप ये जलता रहेगा

पंथ में बाधायें बन लें चाहे झंझा के झकोरेअर्चना का  दीप मेरा जल रहा जलता रहेगाजानता हूँ आसुरी हैं शक्तियां सत्ता संभालेजानता हूँ तिमिर आतुर है निगलने को उजालेकिन्तु जो संकल्प का मेरे, उगा सूरज गगन मेंचीरता है संशयों के हैं घिरे जब वहम कालेउम्र तम की, रात से होती नहीं लम्बी जरा भीएक यह विश्वास मन में पल रहा पलता रहेगामानता पूजाओं में हर बार बिखरे फूल मेरेमानता हूँ मुंह छुपाते हैं रहे मुझसे सवेरेकिन्तु मेरी आस्था की ज्योति तो जलती रही हैदूर वह करती रही छाते निराशा के अंधेरेआस की पुरबाई के कोमल परस से आज छायायह कुहासा एक पल में छँट रहा, छँटता रहेगाहै विदित देवासनों पर आज जो आसीन सारेवे कहाँ वरदान देंगे, चल रहे लेकर सहारेकिन्तु जो संतुष्टि मेरी इक विरासत बन गई हैकह रही , संभव, खिलेंगे एक दिन उपवन हमारेठोकरें खा लड़खड़ाया पंथ के हर मोड़ पर पगकिन्तु फिर निर्णय लिये संभला, सदा संभला रहेगा.

याचक के लिये आराध्य हर पत्थर नहीं है

देवता के दर्शनों की आस मैं लेकर खड़ा हूँद्वार मंदिर के नहीं पर खोलता है अब पुजारीटोकरी में फूल भर कर साध की फुलवारियॊं केथाल पूजा का सजाया प्राण का दीपक जला करसाँस को कर धूप अपने स्वत्व का नैवेद्य रखकरधड़कनों में घोलता हूँ आरती का मंत्र गाकरएक निष्ठा ले तपस्यारत हुआ अविचल  खड़ा हूँजानता हूँ साधना की यह डगर होती दुधारीसाध्य से बढ़कर नहीं हैएक साधक के लिये कुछ किन्तु याचक के लिये आराध्य हर पत्थर नहीं हैदर्शनों पर है सदा अधिकार ही आराधकों काकिन्तु यह उपयोग में होता रहा अक्सर नहीं हैयदि नहीं हो देव कोई भी उपासक से उपासितव्यर्थ होगी वह छवि जो नित्य ही जाती संवारीसर्जना मन की सभी ही कल्पनाओं से उपजती और फिर विश्वास करता प्राण का संचार उनमें ठीकरे का मोल तो  है कौड़ियों से भी कहीं कमभावना का स्पर्श जड देता हजारों रत्न उनमें रिस ना जाएँ आंजुरी में जो सहेजे द्वार पर हूँ और धुंधली हो न जाएँ नैन में छवियाँ संवारी