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Showing posts from May, 2013

प्राण प्रतिष्ठित हुये न उनमें

कितनी बार कल्पनाओं ने गुंधी हुई मिट्टी को लेकरगढ़ीं नई प्रतिमायें लेकिन प्राण प्रतिष्ठित हुये न उनमेंउड़ती रहीं निशा के वातायन से नित्य पतंगें बन कररहीं खींचती चित्र नयन के, विस्तृत फ़ैले नील गगन परतारों की छाया में रक्खे हुये झिलमिले रंग पट्ट सेलेकर भरती रहीं रंग जो गिरे चाँदनी से छन छन करक्षमता तो थी नहीं कर सकें न्याय अकल्पित एक चित्र सेफिर भी रही तूलिका चलती बार बार डूबी इक धुन मेंदिशा दिशा की चूनरिया में चित्रों को कर बूटे  टाँके छोरों पर सपनों के फूलों के गिन गिन कर फुंदने बांधे बुनती रही सलाई अपनी पर रह रह कर इन्द्रधनुष कोयद्यपि उसकी झोली में थे केवल श्याम श्वेत ही धागेबन्द प्रतीची के पट होते ही आ जाती पास बैठ करबतियाती है, लेकिन कुछ भी पाता नहीं जरा भी सुन मैंउगी भोर की चपल रश्मियाँ धो देती हैं पट अम्बर कासँवरा चित्र बिखर जाता है हो हो करके तिनका तिनकाजाती हुई निशा की गठरी में सहेज कर रख देती हैउनको, जिनसे बना सके फ़िर शिल्प कोई नूतन निज मन कासहज समर्पण करके मैं भी सहयोगी बन रह जाता हूँनियति नहीं है कहीं दूसरा चित्र कोई भी पाऊँ चुन मैं

तो गीत बन के सँवर गया है

तुम्हारी सांसों के झुरमुटों से चला जो मलयज का एक झोंकाअधर की मेरे छुई जो देहरी तो गीत बन के सँवर गया हैजो वाटिका की लगी थीक्यारी में राम तुलसी औ’ श्याम तुलसीरुका था उनकी गली में जाकर न जाने क्या बात करते करतेबढ़ा के बाँहे समेटता था उड़नखटोले वे गन्ध वालेजो पांखुरी से हवा की झालर चढ़े थे शाखों से झरते झरतेकली कली पलकें मिचमिचाकर इधर को देखे उधर को देखेना प्रश्न कोई ये बूझ पाये वो इस तरफ़ से किधर गया हैनदी के तट जा लहर को छू के है छेड़ता नव तरंगें जल मेंझुके हुये बादलों की सिहरन को अपने भुजपाश में बांध कर केमयूर पंखों की रंगतों के क्षितिज पे टाँके है चित्र कोईदिशाओं की ओढ़नी है लपेटे उधार संध्या से माँग कर केउतरती रजनी का सुरमईपन परस का पारस बटोर कर केउषा में प्राची की अल्पना बन अकस्मात ही निखर गया हैपहन के उंगली में मुद्रिका कर चमक नथनियां के मोतियों कीअधर की लाली का कल्पनामय दुशाला लेकर सजाये कांधेसुरों की नटखट सी चहलकदमी से अपनी गति कर समानुपातीये भोर संध्या में दोपहर में नित रागिनी इक नई अलापेभरी सभा में तुम्हारा लेकर के नाम बोई सी सरगमो को प्रथम से सप्तम तक टांक कर के नए सुरों में बिखर  …

मुझको याद तुम्हारी आई

रश्मि भोर की खोल खिड़कियां जब भी मेरे कक्ष में आई
कोयल ने सरगम के सुर से गुण्जित की जब जब अमराई
हरी दूब पर पड़ी बूँद से होते प्रतिबिम्बित रंगों ने
जब जब दीवारों पर जड़ दी कोई धुंधली सी परछाईंजब बहार का चुम्बन पाकर कोई कली कभी मुस्काई
मुझको याद तुम्हारी आईपगडंडी पर बैठ गये जब दोपहरी के पल अलसाये
जब पनघट को पैंजनियों ने मद्दम स्वर में गीत सुनाये
जब जब छुई हिनाई आभा ने पूजा की सज्जित थाली
अनायास ही बेमौसम के बादल जब नभ पर घिर आयेछेड़ गई आ अलगोजे को जब कोई महकी पुरबाई
मुझको याद तुम्हारी आईशतधन्वा के शर से बिंध कर जब भी मौसम बहका बहका
सुमन वाटिका में वनपाखी जब भी कोई आकर चहका
दोपहरी में बेला फूला  , महकी निशिगंधा सन्ध्या में
और देहरी के गमले में जब पलाश कोई भी दहकालगी तोड़ने जेठ छोड कर नींद एक अलसी  अंगड़ाई
मुझको याद तुम्हारी आई

मातृ दिवस पर

अपने आरम्भ से आज तक यह समय नित्य रचता रहा है महाकाव्य नवशब्द के कोश में शब्द नूतन रचे जा रहा हर निमिष और हर इक घड़ीकिन्तु असमर्थ है तेरी स्तुति कर सके या कि महिमा तेरी माँ बखाने तनिकइक सहस्रांश भी तो सिमट न सका अनवरत अक्षरों की लगा कर झड़ी.

गीतों में खुद ढल जाते हैं

द्वार अंगनाईयों के खुले ही रहेस्वप्न लाई नहीं नैन की पालकीमौन होकर प्रतीक्षित हवायें रहींहोंगी अनुगामिनी आपकी चाल कीआपके कुन्तलों की बँधें डोर सेआस लेकर  घटायें खड़ीं रह गईंचांदनी थी बुलाती रही चाद कोरोशनी जो बना आपके भाल की ---------------------------------------------------द्वार वातायनों के नहीं खोलते, जितने प्रासाद हैं कल्पना की गलीखटखटाते हुए दॄष्टि की रश्मियाँ थक गईं, उंगलियां आज फिर से जलींमौन, आवाज़ पीता रहा हर उठीअंश अनुगूँज के शेष दिख न सकेफिर बिखरती हुई आस को बीनती , एक संध्या निराशा में डूबी  ढली -----------------------------------------------------------------------परिवर्तन के  आवाहन में उलझे हुए सांझ के दीपकजब रजनी की चूनरिया में तारे बन कर जड़ जाते हैंरजनीगंधा के पत्रों से फ़िसले अक्षर तब आ आकर  मेरे होठों को छू  छूकर गीतों में  खुद ढल जाते हैंभावों के बिन शब्द तड़पते जल से निकली मीनों जैसेधुन्धलाये आईनों में रह रह प्रतिबिम्ब निहारा करतेसूखी हुई पांखुरी को करके हाथों   में कोई प्याला   अभिव्यक्ति के दरवाज़े पर दस्तक एक लगाया करतेमैने अपनी गलियों में आ भटके  उन को गले लगायाझिड़क…