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Showing posts from April, 2013

वाशिंगटन में २३ अप्रेल की सुबह

आज  तेईस अप्रेल   की ये सुबह
ओढ़ कर जनवरी थरथराने लगी
सर्द झोंकों की उंगली पकड़ आ गई
याद इक अजनबी मुस्कुराने लगी

बादलोंकीरजाईलपेटेहुयेरश्मियांधूपकीकुनमुनातीरहींभापकाफ़ीकेमगसेउमड़तीहुईचित्रसाइकहवामेंबनातीरहीहाथकीउंगलियांएकदूजेसेजुड़इकमधुरस्पर्शमहसूस

शब्द अधर से परे रह गये

जितनेभीथेशब्दअधरकेगलियारेसेपरेरहगये
लहरोंकेसँगबहेनहींसबदीपकिनारेखड़ेरहगये

सुरनेतोसरगमकोभेजासांझसवेरस्नेहनिमंत्रण
किन्तुहठीरागिनियोंकेथाहुआनहींमनकापरिवर्तन
बिनाटिकटवालेपत्रोंसे, सबसन्देशलौटकरआये
सुरकोसम्भवहोनसकावहशब्दरागमेंबोकरगाये

लेनसकानवपल्लवसूखीशाखापरफिरसेअँगड़ाई
एकबारजोफ़िसलगिरेवेपत्रझरेकेझरेरहगये

अभिलाषितरहगयातिमिरकेघनेघिरेव्यूहोंमेंबन्दी
गिरालड़खड़ाभाववहीजिसनेचाहाहोनास्वच्छन्दी
बन्धीहुईमालाकेमनकेएकएककरसारेबिखरे
औरव्याकरणनित्यकलमसेकहतीरहीऔरमतलिखरे

उठेहाथथेलियेकामनाअक्षयताकावरपानेको
लेकिनआराधितकेआगेसिर्फ़जुड़ेकेजुड़ेरहगये

तुम सपनो मे आये क्यों थे

बहतीहुईभावनाओं के
प्रश्नो कीइकभूलभुलैय्या
असमन्जसकेतागेबुनती
रहरहकरयेपूछरहीहै
अगरनासाथभोरतककाथा
तुमसपनो मे आयेक्यों थे



बैसाखीसेजोड़जोड़कर
पाले हुयेरखीअधरोंपर
कंठहार कलशी के अटकी
टँक कर रही हुई ईंडुर पर
प्यासधार के तृषित अधरकी
सावनसेयहपूछ रहीहै
अगरनकोषनीरकाथा्सँग
नभपरबादलछायेक्यो थे


मन की गंगोत्री से उमड़ा
हुआ भावनाओं का निर्झर
शब्दों में ढल जाया करता
संप्रेषण की आशा लेकर
छन्दों की धारा में बहता
शुर के तट से पूछ रहा है
अगर नहीं अनुभूत किये तो
गीत कहो ये गाये क्यों थे


अरुणाई के रंगों से रँग
भोर सांझ के दो वातायन
राग असावर से जयवन्ती
का वंसी पर होता गायन
सर्गम की उंगली को छोड़े हुये
स्वरों सेपूछ रहा है
अगर नहीं अवरोह ग्राह्य तो
फिर आरोह सजाये क्यों थे

भोर हो गई

संध्या के बस्ते से पीली
दो नम्बर की पेन्सिल लेकर
किया गगन के नीले पन को
श्यामल उसका सुरमा घिस कर


और शरारत से मुस्का कर
रजनी हौले से यों बोली
देखूँ कैसे जीते मुझसे
ऊषा खेले आँख मिचौली


लेकिन ऊषा ने पेंसिल के
पीछे लगे रबर को लेकर
मिटा दिया सुरमाये पन को
प्राची की चौखट से घिस कर


दरवाजे की झिरी खोल कर
किरण झाँकती इक यह बोली
जीतेगी हर बार उषा ही
कितनी खेलो आँखमिचौली


कुहनी के धक्के से लुढ़की
मेज रखी पानी की छागल
छितराई बन ओस भोर की
खोल निशा की मोटी साँकल


हार मान रजनी ले गठरी
अपनी फिर कर गयी पलायन
भोर हो गई लगा गूँजने
नदिया तट पाखी का गायन.

आस्था से प्रश्न करने.

हो गईं हैं बन्द बजनी घंटियाँ सब फोन वालीडाक बक्से में कोई भी पत्र अब आता नहीं हैमौसमों की करवटें हर बार करती हैं प्रतीक्षाकिन्तु शाखा पर कोई पाखी उतर गाता नहीं हैज़िन्दगी का पंथ मंज़िल के निकट क्यों है विजन वनआज मन यह लग गया है आस्था से प्रश्न करने.दृष्टि के वातायनों में चित्र बनते हैं अधूरेसांझ की सारंगियों के साथ रोते तान पूरेहर दिशा से भैरवी का उठ रहा आलाप लगतास्वप्न में भी कोई कहता है नहीं आ पास छू रेएक आशा भी निराशा की पकड़ उंगली खड़ी हैउम्र के वटवृक्ष से झरते दिवस कब पाये रुकनेदस्तकें दहलीज पर आकर स्मृति की थरथरायेद्वार के पट थाम लिखता मौन ही केवल, कथाएं शून्य की चादर क्षितिज के पार तक विस्तार पाती पास आते, हर  घड़ी, लगता सहम जाती हवाएं कट चुकी सम्बन्ध की हर इक नदी जो थी प्रवाहित शेष हैं बस नैन की दो वादियों में चंद  झरने सिन्धु में इक पोत पर बैठा हुआ मन का पखेरू आह भरता ताकता है भाव के संचित सुमेरू साध का हो अंत रहता मरुथली बरसात जैसा और अम्बर पर बिखर कर रह गया हर बार गेरू फ्रेम ईजिल पर टंका  छूटा नहीं है तूलिका को उंगलियाँ उठ पायें इससे पूर्व लगती जाएँ झुकने