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Showing posts from March, 2013

मेरा योग इसमें नहीं है जरा भी

इसे गीत कह दो या कविता बताओ मेरा योग इसमें नहीं है जरा भीलिखे शब्द जो शब्द की साधना मेंवही शब्द बस साथ मेरे हुये हैंकभी जिनको आशीष ने छू लिया थावही भाव बस मुझको घेरे हुये हैंउन्हें व्याकरण से परे छन्द ने थाउठा कर किसी एक क्रम में सजायाबिना ज्ञान के और परिमार्जनों केवही कंठ में आ मेरे गुनगुनायाजिसे चाहो वह रंग इन पर चढ़ा लोहरा लाल केसर या पीला गुलाबीखुले होंठ पर थरथरा रह गई जोकभी अर्थ अपना नहीं  बात पाईना चढ़ पाई थी तार की गोख तक जोनहीं रागिनी ने  जरा गुनगुनाईउसी बात को शब्द के कैनवस परचढ़ा कर नये रंग भरने लगा हूँनई एक सरगम धुनों में सजाकरवही एकलय   गीत करने लगा हूँइसे भावना का कहो क्रम निरंतर या बादल के पट से बिखरती विभा सी नयन की गली में टंगे अलगनी पर सपन चुनरी की तरह फरफराते कोई स्पर्श जिनके निकट आ ना पाया हवा की तरह भी कभी आते जाते उन्हें छंद के चाक पर मैं चढ्क्षाकर नया एक आकार देने लगा हूँ दिशा बोध की इक उफनती नदी में उन्हें साथ लेकर मैं बहाने लगा हूँ इसे चाहे उन्माद का नाम दे लो छुअन या कि  अपनत्व की है ज़रा सी

और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है

सांझ की तराई मेंशाल सुरमई ओढ़ेधुन्ध में नहाई सीकोई छवि आकर के दिलरुबा बजाती हैऔर मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती हैओस जैसे झरती हैफूल की पंखुरियों परउगते दिन की राहों मेंमोती जैसे कदमों से पास बैठ जाती हैऔर मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती हैतारकों की छाया मेंचाँदनी की कोई किरननभ की गंगा में उतरअपना मुँह धोते हुए डुबकियाँ लगाती हैऔर मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती हैपतझरों के पत्तों पररंग की कलम कोईमौसमों से ले लेकरकल्पना के आँगन के चित्र कुछ बनाती है और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है

नाम कोई गुनगुना कर

दे रहा है कोई दस्तक सांझ मन के द्वार आकरलग गई गाने हवायें नाम कोई गुनगुना करएक अनचीन्ही  छुअन सी पास आकर छेड़ती हैनैन के पट खोल देती और फिर फिर भेड़ती हैचित्रमय होकर पलक की सीढ़ियों पर खिलखिलातीएक पल चुपचाप  रहती दूसरे में टेरती हैमैं समझ पाता नहीं हूँ क्या ये वही संभाविता : हैमैं हुआ जिसका प्रतीक्षित रात दिन पलकें बिछाकरगूँजती है दूर से बन बांसुरी आवाज कोईफिर बुलाती पास कोई गंध सुधियों में समोईदृष्टि के बारादरी में एक उत्कंठा उभरतीकिन्तु प्रतिमायें रही हैं जा क्षितिज के पार सोईअटकलें उलझी हुई असमंजसों के दायरे में लग रहा है कोई चाहे थामना उंगली बढ़ाकरप्यास के छींटे भिगोते चाहना को और बढ़ करअनमनापन और ज्यादा हो रहा प्रतिपल मचलकरचित उछटता है निरन्तर साथ पल की धड़कनों केदृष्टि टिकती है नहीं हर बिंदु  से गिरती फ़िसल करफिर उभरने को हुआ आतुर ह्रदय में भाव कोईऔर फिर से रह गया मन यह  स्वयं में कसमसाकरसुरमई नभ पर उभरते बादलों के चित्र जैसेपत्तियों की सरसराहट बुन रही लगता संदेसेरात की मुंडेर पर से चान्दनी की ले कमन्देंकोई है आभास चढ़ता और गिरता आस पर सेदृष्टि  हो यायावरी हर इक दिशा को खटखटाती कोई पर द…

लौ सिमट बातियों को रुलाती रही

सारिणी में समय की कहीं खो गई भावना, साध जिसको सजाती रही दोपहर  की पिघलती हुई धूप आयाद के रंग मन पर नये ,मल गईजीर्ण परदे से बादल के छनती हुईकोई परछाईं आकर ह्रदय छल गईअत्र कुशलम, तो हो अस्तु भी तत्र हीरह गये सोचते जितने सम्बन्ध  थेऔर हम फिर उलझ उस नियम में गयेजिसके कारण हुये मन के अनुबन्ध थेसूर्य की हर किरण वक्र हो व्योम सेसिर्फ़ परछाईयाँ ही बनाती रही सारे सन्देश उत्तर बिना खो गयेदृष्टि  लेकर गई जो कबूतर बनीशब्द के,पृष्ठ के मध्य में यूँ लगाऔर गहरी  हुई, जो हुई अनबनीथा अपरिचय घटा सावनी बन घिराऔर बरसा गया फ़िर से एकाकियतज़िन्दगी मौन ही मुस्कुराती रहीहम रहे पूछते क्या है उसकी नियतप्रश्न बन जो ह्रदय से चली भावनाश्याम विवरों में जाकर समाती रहीआईने में खड़े अजनबी का पताखोजते खोजते थक गई ये नजर वृत्त जो अर्ध था प्रश्न के चिह्न काबस उसीमें अटक रह गया हर सफ़रबिन्दु लगने कहां थे-ये निश्चित हुआलग गये पर कहाँ, कुछ नियंत्रण नहींइसलिये नीड़ था जोकि कल सांझ काआज गंतव्य बन कर रहा वो वहींतार टूटे हुए साज के में, सिमटसरगमी भावना छटपटाती रहीमंच पर ज़िन्दगी के घटित हो रहाक्या ,है क्या आयेगा ये पता है नहींकौन बन क…