नये अर्थ के प्रतिपादन में

समय शिला से टकरा टकरा
बिखर गये अन्तरे गीत के
शब्द हुये आवारा, बँधते नहीं
तनिक भी अनुशासन में
 
अक्षर अक्षर विद्रोही है
ले मशाल जलती हाथों में
दूर अधर की पगडंडी से
उलझा अर्थहीन बातों में
पंक्तिहीन उच्छंखल कोई
बायें जाता कोई दाय़ें
सुनी अनसुनी कर देते हैं
कोई कितना भी समझाये
 
कर बैठे दुश्मनी मात्राओं से
अपने मद में फूले
रहे पिरोते निष्ठायें पर
गीतों वाले सिंहासन में
 
अलंकार की बैसाखी पर
चलें लड़खड़ा कर उपमायें
जुड़ती नहीं तार से आकर
तथाकथित ये नई विधायें
समुचित विस्तारों में अक्षम
वाक्य रहे हैं टूट टूट कर
और भावना विधवाओं सी
रहे बिलखती फ़ूट फ़ूट कर
 
सतही समझ पूज लेती है
केवल उन लहरों की हलचल
जिनका गठबन्धन करता है
बस निवेश इक विज्ञापन में
 
गीत और व्याख्यानों में अब
अन्तर नहीं कसौटी करती
लगीं अस्मिता तलक दांव पर
शायद इसीलिये ही डरती
सत्य अधर की देहरी को भी
छूने से अब कतराता है
चाटुकारिता का कोहरा ही
अपनी सीमा फ़ैलाता है
 
मिले धरोहर में जितने भी
नियम उठा कर फ़ेंक दिये हैं
व्यस्त सभी हैं निज मतलब के
नये अर्थ के प्रतिपादन में

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