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Showing posts from July, 2013

तुम्हारे तन की गंध चूम आई है

बहकी हुई हवा से पूछा मैंने भेद लडखडाहट का  तो बोली वह मीत ! तुम्हारे तन की गंध चूम आई है  पुष्पवाटिका से अमराई तक की गलियाँ घूम घूम कर  क्यारी क्यारी में मुस्काती कलियों का मुख चूम चूम कर  बहती हुई नदी की धाराओं से बतियाते बतियाते  संदल की शाखों  पर करते नृत्य मगन मन झूम झूम कर  डलिया भर भर कर बिखेरते मग्न ह्रदय की मुदित उमंगें  फगुनाहट की रंगबिरंगी चुनरिया फिर लहराई है  धुआँ  अगरबत्ती का लेकर मंदिर की चौखट से आई  फिर समेट लाई बांहों में गुलमोहर वाली अँगडाई  पांखुर पांखुर से गुलाब की कचनारों की पी सुवास को  लगी देखने अपनी छाया में फिर अपनी ही परछाईं  परछाईं के नयनों में भी बिम्ब तुम्हारा ही देखा तो  सम्मोहित हो रुकी लगा ज्यों सुधि बुधि  पूरी बिसराई है   देहरी  पर आ छाप अधर की लगी छोडने वो मुस्काकर  कमरे की दीवारें चूमी अपनी चुनरिया लहराकर  झोंकों के गलहारों मॆं की बंद  कल्पनाॐ की छाया  मंजरियों की जल तरंग पर अपनी पैंजनिया खनका कर   अमराई में गाती कोयल के स्वर को आधार बना कर  सारंगी से नए सुरों में,नई  रागिनी बजवाई  है

जय जयति वीणापारिणी

जय जयति जय माँ शारदा जय जयति वीणापारिणी  भाषा स्वरा जय अक्षरा ,जय श्वेत शतदल वासिनी  जय मंत्र रूपा, वेद   रूपा जयति  स्वर व्यवहारिणी माँ  पुस्तिका, माँ कंठ स्वर,मां रागमय सुर रागिनी  वन्दे अनादि शक्ति पूंजा, ज्ञान अक्षय निधि नमो  स्वाहा स्वधा मणि  मुक्त माला रूपिणी चितिसत  नमो  मानस कमल की चेतना, कात्यायनी शक्ति नमो  हे धवल वसना  श्वेत रूपा प्राण की प्रतिनिधि नमो  इंगित तेरा संचार प्राणों का सकल जग में करे  तेरे अधर की एक स्मित हर मेघ संकट का हरे  तेरे वरद आशीष का कर छत्र जिसके सर तने भवसिन्धु की गहराइयां वह पार पल भर में करे  सुर पूजिता, देव स्तुता, हे यज्ञ की देवी नमो  हे सर्जना , हे चेतना  हे भावना तत्सम नमो  हे शेषवर्णित नित अशेषा, आदि की जननीनमो हे कल्पना की, साधना की प्रेरणा नित नित नमो

बात हो चाहे कितनी पुरानी कहूँ

दीप बन कर नयन में जले जो सपन आज तुमसे उन्हीं की कहानी कहूँ पीर जो होंठ को अब तलक सी रही बात उसकी उसी की जुबानी कहूँ पोर की मेंहदियों ने छुये बिन कभी बात गालों  पे लिख दी मचलते हुए एक मौसम बिताया समूचा उसे ध्यान देकर तनिक सा, समझते हुए पर लिखी मध्य में शब्द के जो कथा उसका वृत्तांत आया समझ में नहीं यूँ लगा जितना अब तक समझ पढ़ सके उससे दुगना उसी में छुपा है कहीं कितनी गाथायें हैं,ग्रंथ कितने बने जब कपोलों ने पाई निशानी कहूँ एक चितवन छिटक ओढ़नी से जरा द्वार नयनों के आ खटखटा कर गई सांवरी बदलियों की थीं सारंगिया पास आकत जिन्हें झनझना कर गई कंठ का स्वर तनिक शब्द को ढालता पूर्व इससे हवायें उड़ा ले गईं कमसिनी गंध के मंद आभास सी उंगलियां एक प्रतिमा छुआ  के गई इस नये रूप में इक नये ढंग में बात हो चाहे कितनी  पुरानी कहूँ बिम्ब वे फिर सभी अजनबी हो गये जुड़ न पाई कहीं कोई पहचान भी एक अपनी कसक जो सदा संग थी वो भी ऐसे मिली जैसे अनजान थी टूट बिखरी हुई आरसी कोशिशें कर थकी एक तो चित्र उपहार दे तार टूटे हुए बोलने लग पड़ें उंगलियां  ढूंढते वे  जो झंकार दे एक सूनी प्रतीक्षा लिये आँख में किस तरह बीती सारी जवानी कहूँ

संभाव्य हो जाने लगा है

अनकहे ही बात जब संप्रेषणा पाने लगे तो मौन रह कर रागिनी मन की मधुर गाने लगे तो भावनायें बांसुरी को आप ही जब टेरती हौं नींद पलकें छोड़ नयनों से परे जाने लगे तो जान लेना जो ह्रदय में कामना अंगड़ाई लेती पर लगाकर वह अभी गंतव्य को पाने लगी है प्रश्न से पहले खुलें मालायें सारी उत्तरों की पालकी ऋतुगंध ले दहलीज छूले पतझरों की शब्द बिन अभिप्राय के मानी सभी पहचान जायें एक ही पल में समाये आ निधी संवत्सरों की तब समझ लेना खिंची हर एक रेखा हाथ वाली अर्थ में शामिल हुए मंतव्य को पाने लगी है लग पड़ें जब दर्पणों में बिम्ब सहसा मुस्कुराने पंखुरी छूकर कपोलों को लगे जब गुनगुनाने नैन झुकने लग पड़ें उठ उठ अकारण ही निरन्तर लग पड़ें जब भोर की रंगत स्वत: आनन सजाने जान लेना उम्र की दहलीज पर इक प्रीत गाथा छोड़ कर इतिहास अब संभाव्य हो जाने लगा है  ओढ़ ले जब सावनी चूनर दिवस बैसाख वाला  कक्ष में बैठा रहे आ भोर का मधुरिम उजाला  लहरिया मंथर हवा की गाल छूकर गुनगुनाये  सप्त्वर्णी   हो लगे जब यामिनी का रंग काला  तब समझ लेना कमल के पत्र पर की ओस बूँदें  छू तुम्हारे होंठ नव वक्तव्य इक पाने लगी हैं

प्रीत तुम्हारी यूँ तो

प्रीत तुम्हारी यूँ तो बन कर रही सदा आंखों का काजल उमड़ी आज अचनक मन में बन कर चन्दनगंधी बादल सांसों के उपवन में आये उग गुलाब के अनगिन पौधे धड़कन लगी नाचने सहसा, बन कर के झंकृत पैंजनिया मेंहदी के बूटे आ उतरे नई अल्पना में देहरी पर उजली पथ की धूल हो गई बन चमकी  हीरे की कनियां लगीं भावनायें खड़काने नूतन अभिलाषा की साँकल तट की सिकता सुरभित होकर बिखरी बन जमनाजी की रज प्रीत तुम्हारी छू पुरबाई लगी बांसुरी एक बजाने मौसम को ठेंगा दिखलाकर पांखुरियों में बदले पत्ते पुलकितहो कर प्रमुदित मन यह लगा निरन्तर रास रचाने पनघत पी परछाईं तुम्हारी सहज बन गया गंगा का जल लिखे स्वयं ही कोरे पृष्ठों ने अपने पर गीत प्रणय के फ़ागुन आकर लगा द्वार पर सावन की मल्हारें गाने उत्तर से दक्षिण तक सूने पड़े क्षितिज की चादरिया को इन्द्रधनुष में परिवर्तित कर दिया उमड़ कर घिरी घटा ने लगी दिशाओं को दिखलाने पथ पगडंडी भटकी पागल प्रीत तुम्हारी ने फ़ैलाया मन पर ऐसे अपना आँचल