प्राण प्रतिष्ठित हुये न उनमें

कितनी बार कल्पनाओं ने गुंधी हुई मिट्टी को लेकर
गढ़ीं नई प्रतिमायें लेकिन प्राण प्रतिष्ठित हुये न उनमें
 
उड़ती रहीं निशा के वातायन से नित्य पतंगें बन कर
रहीं खींचती चित्र नयन के, विस्तृत फ़ैले नील गगन पर
तारों की छाया में रक्खे हुये झिलमिले रंग पट्ट से
लेकर भरती रहीं रंग जो गिरे चाँदनी से छन छन कर
 
क्षमता तो थी नहीं कर सकें न्याय अकल्पित एक चित्र से
फिर भी रही तूलिका चलती बार बार डूबी इक धुन में
 
दिशा दिशा की चूनरिया में चित्रों को कर बूटे  टाँके 
छोरों पर सपनों के फूलों के गिन गिन कर फुंदने बांधे 
बुनती रही सलाई अपनी पर रह रह कर इन्द्रधनुष को
यद्यपि उसकी झोली में थे केवल श्याम श्वेत ही धागे
 
बन्द प्रतीची के पट होते ही आ जाती पास बैठ कर
बतियाती है, लेकिन कुछ भी पाता नहीं जरा भी सुन मैं
 
उगी भोर की चपल रश्मियाँ धो देती हैं पट अम्बर का
सँवरा चित्र बिखर जाता है हो हो करके तिनका तिनका
जाती हुई निशा की गठरी में सहेज कर रख देती है
उनको, जिनसे बना सके फ़िर शिल्प कोई नूतन निज मन का
 
सहज समर्पण करके मैं भी सहयोगी बन रह जाता हूँ
नियति नहीं है कहीं दूसरा चित्र कोई भी पाऊँ चुन मैं
 

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हम चित्रों से बुलवा लेंगे,
रंग डालने ईश्वर बैठा।

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