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Showing posts from October, 2012

दिशाओं पर इबारत

लाज ने हर बार रोके शब्द चढ़ने से अधर पर दृष्टि छूते ही नयन की देहरी को झुक गई है प्राप्त मुझको हो गये सन्देश सब उड़ती हवा से कंठ की वाणी जिन्हें उच्चार करते रुक गई है स्वप्न जो संवरे नयन में, मैं उन्हें पहचान लूंगा भाव की आलोड़नायें हो रहीं जो, जान लूंगा शब्द की बैसाखियां क्या चाहते संबंध अपने बिन कही संप्रेषणा के बन रहे आधार हम तुम कोई परिभाषा नहीं,जो सूत्र हमको बांधता है फूल-खुश्बू,धार-नदिया, शाख से हो कोई विद्रुम मैं तुम्हारी छांव को परछाईं अपनी मान लूंगा भावना की टेर को मैं सहज ही पहचान लूंगा जब अकेली सांझ लिखती है दिशाओं पर इबारत बादलों ने शब्द बन तब नाम लिक्खा है हमारा कंपकंपाती दीप की लौ ने स्वयं को तूलिका कर रात की कजराई में बस चित्र अपना ही निखारा मैं हमारी अस्मिता का प्राप्त कर अनुमान लूँगा जो तुम्हारी है उसी को मीत अपनी मान लूंगा

पीर बिना कारण के गाती

गिरजे में, मंदिर मस्जिद में केवल सौदागर मिलते हैं कोई ऐसा नहीं कहीं भी दे पाये प्रश्नों के उत्तर खिली धूप की सलवट मे क्यों अंधियारे के बीज पनपते क्यों चन्दा की किरन किसी के मन का आंगन झुलसा जाती क्यों कर्मण्यवाधिकारस्ते की बदला करती परिभाषा कैसे किसी हथेली पर आकर के अब सरसों जम जाती किसका आज विगत के पुण्यों का प्रताप ही बन जाता है किसके भाल टँगे अक्षर की छवियां धूमिल होती जातीं क्यों नयनों के ढलते जल पर भी प्रतिबन्ध लगा करते हैं पीर बिना कारण के गाती आकर कुछ अधरों पर क्योंकर पथवारी पर वड़ के नीचे लगी हुई कुछ तस्वीरों पर अक्षत चन्दन रख देने से भाग्य कहां बदला करते हैं खोल दुकानें,जन्तर गंडे ताबीजों को बेच रहे जो उनका कितना बदला ? भाग्य बदलने का दावा करते हैं कोई शीश नवाये,कोई सवामनी की भेंट चढ़ाये श्रद्धा के पलड़े में दोनों की क्यों तुलनायें करते हैं टिकट लगा कर दर्शन दे जो,वो तो देव नहीं हो सकता और दलाली करने वाले क्या हैं सच पशुओं से बढ़कर

पता नहीं कल भोर

प्राची के पीताम्बर पर कुछ अरुणिम आभाओं के छींटे प्रहरी बन कर खड़े हुये दो बादल के टुकडे कजरारे श्याम प्रतीची नीले रंग की एक बुहारी लेकर कर में दिन की अगवानी को आतुर,अंगनाई को और बुहारे कितनी खुले अवनिका अम्बर की खिड़की से पता नहीं कल चित्र आज के इसीलिये मैं, सोच रहा नयनों में भर लूं द्वार नीड़ के खोल देखता एक विहग फैले वितान को पाटल पर बूंदों के दर्पण में अलसाई सी परछाई रहे लड़खड़ाते कदमों से कलियों के बिस्तर से उठ कर आँखें मलते हुये गंध के एक झकोरे की अंगडाई करे धूप का चाबुक गतियाँ द्रुत इस ठहरे हुये समय की इससे पहले इन्हें तूलिका अपनी लेकर चित्रित कर लूं पलक मिचमिचाती पगडंडी औऔर उठाकरश्यामल चूनर अथक बटोही के आने की लेकर आशायें फ़ैलाये घंटे शंख अजानों के स्वर में घुलते मंत्रोच्चार को तट नदिया का अपनी लहरों के गुंजन से और सजाये कोपभवन की ओर बढ़ रहा मौसम कुपित रहे कल कितना पता नहीं इसलिये आज ही इसे याद में अंकित कर लूँ

दोपहर ने साथ मेरे छल किया है

आ गए अंगनाई में फिर से उतर कोहरे घनेरे आज फिर से दोपहर ने साथ मेरे छल किया है भोर के पट जा किरण ने रोज ही थे थपथपाये नींद से जागे, सुनहरी रूप आ अपना दिखाये और प्राची से निरन्तर जोड़ते सामंजसों को स्वर प्रभाती के नये कुछ छेड़ स्वर अपना मिलाये किन्तु जागी भोर जब आई उतर कर देहरी पर तो लगा जैसे किसी ने तिमिर मुख पर मल दिया है रोशनी को ढूँढ़ते पथ में दिवस आ लड़खड़ाता बायें दायें पृष्ठ जाता और फिर पथ भूल जाता सोख बैठी है सियाही बाग झरने फूल पर्वत एक सन्नाटा घिरा चहुँ ओर केवल झनझनाता फ़ैलता विस्तार तम का हो गया निस्सीम जैसे एक ही आकार जिसने घोल नभ में थल दिया है खो चुकी सारी दिशायें, क्या कहाँ है क्या यहाँ है और जो भी पास होने का भरम, जाने कहाँ है मुट्ठियों ने क्या समेटा क्या फ़िसल कर बह गया है जो अपेक्षित है , नजर जाती नहीं है बस वहाँ है वह सुनहरा स्वप्न जिसके बीज बोये नित नयन ने
रात की पगडंडियों पर पार जाने चल दिया है

पाँचसौवीं प्रस्तुति---केवल हैं आभास तुम्हारे

जाते  जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया और दरवाजे के एक ओर होकर अक्तूबर को अन्दर आने का निमंत्रण देते हुये बाहर निकल गया. ऊहापोह में डूबा मैं उसके इस व्यवहार को समझने की कोशिश कर ही रहा था तभी अक्तूबर ने अपनी एक उंगली उठा कर याद दिलाया कि गीत कलश पर माँ शारदा के आशीष के शब्द सुमन प्रस्तुत करने हैं और यह पंखुरियाँ इस क्रम में पाँचसौवीं होंगी. कुछ विशेष नहीं है. वही शब्दों के फूल जो सदा माँ सरस्वती के चरणोंमें चढ़ते है. वही शब्द सुमन एक बार फिर सादर समर्पित माँ भारती के श्री चरणों में :-


निखरी है कोई परछाई जब जब भी धरती पर पड़कर मृतिका सहज बना देती है प्रतिमा उसकी पल में गढ़ कर अनायास वो सज जाती है छवियाँ लेकर मीत तुम्हारी रख लेता है भावसिक्त मन उसको दीवारों पर जड़कर परछाईं तो परछाईं है, बोध कहे कितना भी चाहे दृष्टि ढूँढती हर परछाईं में केवल आभास तुम्हारे जिन सोचों में डूबा हूँ मैं, शायद तुम भी उनमें खोये जो सपने देखे हैं मैंने,तुमने भी आँखों में बोये यादों के जिन मणिपुष्पों की  माला…