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Showing posts from August, 2012

आप-क्रम

रात की खिड़कियों पे खड़े सब रहे, स्वप्न उतरा नहीं कोई आकर नयन
नैन के दीप जलते प्रतीक्षा लिये, कोई तो एक आकर करेगा चयन
चाँदनी की किरन में पिरोती रही, नींद तारों के मनके लिये रात भर
आप जब से गये, कक्ष सूना हुआ, सेज भी अब तो करती नहीं है शयन

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गुनगुनाने लगीं चारदीवारियाँ, नृत्यमय अलगनी पे टँगी ओढ़नी
देहरी हस्तस्पर्शी प्रतीक्षा लिये, है प्रफ़ुल्लित हो सावन में ज्यों मोरनी
थिरकनें घुँघरुओं की सँवरने लगीं, थाप तबला भी खुद पे लगाने लगा
आपके पग हुये अग्रसर इस तरफ़, धूप की इक किरन छू कहे बोरनी

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भोर आई जो प्राची की उंगली पकड़ , याद आया मुझे नाम तब आपका
ओढ़नी लाल संध्या ने ओढ़ी जरा, चित्र बनने लगा नैन में आपका
दोपहर की गली से गुजरते हुये, बात जब पत्तियों से हवा ने करी
चाँदनी के सितारों पे बजता हुआ, याद आया मुझे कंठस्वर आपका

आप--अगस्त २०१२

आपके होंठ से जो फ़िसल कर गिरी मुस्कुराहट कली बन महकने लगी रंगतों ने कपोलों की जो छू लिया तो पलाशों सरीखी दहकने लगी स्वप्न की क्यारियाँ, पतझरी चादरें ओढ़ कर मौन सोई हुईं थीं सभी आपकी गंध ने आ जो चूमा इन्हें पाखियों की तरह से चहकने लगी< ----------------------------
सूर्य को अर्घ्य थे आप देते हुये अपने हाथों में जल का कलश इक लिये मंत्र का स्वर उमड़ता हुआ होंठ पर एक धारा के अभिनव परस के लिये बन्द पलकों पे उषा की पहली किरन गाल पर लालिमा का छुअन झिलमिली दृष्टि हर भोर अपनी उगाती रही बस उसी एक पल के दरस के लिएय.

उन्हें आज ही कहना अच्छा

ठहरे हुआ नीर जब दर्पण बनता, तो धुंधला ही बनता गतियाँ भले रहें मंथर ही, पर उसका है बहना अच्छा भिन्न दिखाते आकृतियों के आकारों को सुधि के टुकड़े प्रतिपल बदले अनुपातों के रह रह रहे बदलते क्रम में अपने ही बिम्बों से डोरी बँधी हुई परिचय की टूटे खींचे हुए स्वयं के अपने ही मिथ्या व्यूहों के भ्रम में कुछ सन्दर्भ बदल देये हैं स्थापित हर इक परिभाषा को इसीलिये जो शब्द पास हैं, उन्हें आज ही कहना अच्छा हुई दृष्टि संकुचित दायरों की सीमाओं में जब बन्दी तब मरीचिकाओं के संभ्रम आकर छा जाते वितान पर किन्तु उतरती हुई कलई की खुलती हैं जब झीनी परतें प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं,सम्बन्धों की हर उड़ान पर हुआ प्रशंसा से अनुमोदित गर्व चढ़ा जिन कंगूरों पर उन आधारहीन कंगूरों का सचमुच है ढहना अच्छा प्रसवित अनुमानों से होते,हुए संचयित निष्कर्षों में खो देती हैं पंथ स्वयं का सत्य बोध की सीधी रेखा नयनों के दरवाजे पर तब दस्तक देते थके रोशनी और दृश्य हर एक स्वयं को रह जाता करके अनदेखा क्षणिक सांत्वना के स्पर्शों से जो अनुभूति बने दुखदायी मन को अपने उसका होकर एकाकी ही सहना अच्छा

पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं

आके सावन गली से गुजरता रहा पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं धूप ने जिन पथों को प्रकाशित किया वे सदा दूर मेरे पगों से रहे कोई ऐसी किरण ना मिली आज तक एक पल के लिये बाँह आकर गहे एक टूटे सितारे की किस्मत लिये व्योम की शून्यता में विचरता रहा और मौसम की सूखी हुई डाल से नित्य दिनमान पत्ते सा झरता रहा एक मुट्ठी खुली,आँजुरी ना बनी नीर की बूँद हाथों में आई नहीं इक मयुरी करुण टेर उठती हुई तीर नदिया के आ लड़खड़ाती रही प्यास चातक की उलझी हुई कंठ से आई बाहर नहीं, छटपटाती रही पी कहां स्वर भटकता हुआ खो गया फ़िर ना लौटाई कोई क्षितिज ने नजर ठोकरें खाते,गिरते संभलते हुये क्रम में बँध रह गया ज़िन्दगी का सफ़र. तार झंकारते थक गईं उंगलियां एक पाजेब पर झनझनाई नहीं आईना बिम्ब कोई ना दिखला सका दूर परछाईयाँ देह से हो गईं अजनबी गंध की झालरें टाँक कर रिक्त इक पालकी ही हवा ढो गई एक रेखा दिशाओं में ढलती रही एक ही वृत्त के व्यास को बांध कर रात ठगिनी हुई साथ में ले गईं नींद की गठरियाँ पीठ पर लाद कर दूर जाते हुये रोशनी कह गई सांझ तक की शपथ थी उठाई नहीं