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Showing posts from July, 2012

शा्यद हल हो अब मुश्किल कुछ

जीवन के इस समीकरण की गुत्थी को प्रतिदिन सुलझाते लेकिन हर इक बार लगा यह हो जाती है और जटिल कुछ उत्तरदायित्वों के लम्बे चौड़े श्यामपट्ट पर रह रह साँसों की खड़िया लिख लिख कर कोशिश करती सुलझाने की किन्तु सन्तुलित कर उत्तर तक पहुँच सकें इससे पहले ही साँझ घोषणा कर देती है मिले समय के चुक जाने की खिन्न ह्रदय असफ़ल हाथों से आशा की किरचें बटोरता जिन पर अंकित रहता, संभव अब के उत्तर जाये मिल कुछ हो कर आती नई सदा ही सम्बन्धों की परिभाषायें परिशिष्टों में जुड़ जाते हैं नियम नये कुछ अनुबन्धों के लिखे हुए शब्दों से कोई तारतम्य जुड़ पाये इससे पहले ही लग जाते बन्धन और नये कुछ प्रतिबन्धों के ढूँढ़ा करती है नयनों की बीनाई उस पगडंडी को जिसके अंत सिरे की देहरी से होता अक्सर हासिल कुछ फ़ैले हुए निशा के वन में कहीं झाड़ियों में वृक्षों पर चिह्न नहीं मिलता परिचय का,दिखते हैं आकार भयावह कन्दीलें बन लटके तारे लगता कुछ इंगित करते हैं कोशिश करता बंजारा मन समझ सके कुछ उनका आशय प्राची के महलों में जलते हुए दिये की चन्द लकीरें आसगन्ध बिखरा जाती हैं,शा्यद हल हो अब मुश्किल कुछ

कोई जिज्ञासा नहीं है

भाव ले ढलते नहीं हैं शब्द अब मेरे अधर के सूत्र में बँध पायें इससे पूर्व रह जाते बिखर के टिक नहीं पाती किसी भी बिन्दु पर भटकी निगाहें सिन्धु से आता नहीं मैनाक अब कोई उभर के डोरियों से बँध धुरी की चल रहे हैं वृत्त में बस शेष क्या है जानने की कोई जिज्ञासा नहीं है दिन निहारे भोर उगते ही निरन्तर दर्पणों को एक बासी अक्स फ़िर फ़िर सामने आता सँवर कर तह रखी रेखाओं की अनगिन परत के बीच खोया एक अनुभव,बात कहने को नहीं आता निखर कर जानते बीता हुआ कल, आयेगा कल रूप बदले और जो है आज उसकी कोई परिभाषा नहीं है यूँ ह्रदय तो नित्य भिंचता है समय की मुट्ठियों में और बींधे रश्मियों से धूप की दिन का धनुर्धर शूल के आघात पाना है नियति का पृष्ठ अंतिम है नहीं संभावना यह दृश्य अब आये बदल कर पीर की बजती हुई शहनाई के मद्दम सुरों में व्यक्त मन का हाल कर पाये,कोई भाषा नहीं है बुझ चुके जयदीप जिनको आस ने रह रह जलाया आंधियों में ढल गईं हर रोज ही बहती हवायें पल दिवस के,पल निशा के चौघड़ी की चौसरों पर कर रहें हैं मात देने को निरन्तर मंत्रणायें पूर्व बिछने के, बिसातों पर हुई है हार ही तय कोई भी अनुकूल होकर पड़ सके, पासा नहीं है

और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

एक गतिक्रम में बँधे पग चल रहे हैं निर्णयों बिन भोर ढलती,सांझ-होती रात फ़िर आता निकल दिन ढल गया जीवन स्वयं ही एक गति में अनवरत हो उंगलियाँ संभव नहीं विश्रान्ति के पल को सकें गिन अर्थ पाने के लिये उत्सुक निगाहें ताकती हैं व्योम के उस पार, लेकिन लौटतीं हैं शून्य लेकर टूट कर जाते बिखर सब पाल कर रक्खे हुए भ्रम पत्थरों से जुड़ रहे आशीष को ले क्या करें हम केन्द्र कर के सत्य को जितने कथानक बुन गये थे आज उनका आकलन है गल्प की गाथाओं के सम पूछती है एक जर्जर आस अपने आप से यह क्या मिला यज्ञाग्नि को भूखे उदर का कौर लेकर कौन रचनाकार?देखे नित्य निज रचना बिगड़ते बन रहे आकार की रेखाओं को निज से झगड़ते हो विमुख क्यों कैनवस से कूचियाँ रख दे उठाकर देखता है किसलिये दिनमान के यूँ पत्र झड़ते प्रश्न ही करने लगे हैं प्रश्न से भी प्रश्न पल पल और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

भूमिका लिख दी नये इक गीत की

भोर के सन्देश ने आ
प्रष्ट पर पहले, दिवस के
भूमिका लिख दी नये इक गीत की
कुछ नई सरगम सृजित करके सुरों में
अर्थ दे झंकार को नव, नूपुरों में
गंध के उन्माद में फीकी हुईं थीं
वर्ण रक्तिम को पिरो कर पान्खुरों में
तोड़ दीवारें पुरातन रीत की
भूमिका लिख दी नई इक गीत की

मंदिरों की आरती का सुर बदल कर शंख की ध्वनि में नया उद्घोष भर कर कंपकंपाती दीप की इक वर्त्तिका में प्राण संचारित किये आहुति संजोकर व्याख्या की आस्था की नीत की भूमिका लिख दी नये इक गीत की

धूप चैती मखमली को जेठ की कर मानकों को दृष्टि के थोड़ा बदल कर हो चुकीं निस्पन्द तम में चेतनाओं में नई इक ज्योति का अव्हान भर कर सौम्यता लेकर गगन इक पीत की भूमिका लिख दी नये इक गीत की
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चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे

भोर से सांझ नभ में विचरते हुए
कल्पना के निमिष थक गये जिस घड़ी
फूल से उठ रही गंध को पी गई
खिलकिहिलाती हुई धूप सर पर खड़ी
मन का विस्तार जब सिन्धु में चल रहे
पोत के इक परिन्दे सरीखा हुआ
और सुधियां लगीं छटपटा पूछने
आज अभिव्यक्तियों को कहो क्या हुआ


उस समय तूलिका ने बनाया जिसे
शब्द के आभरण से सजाया जिसे
सरगमों के सुरों से संवारा जिसे
चाँदनी ने तुहिन बन निखारा जिसे



चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे



पंथ के इक अजाने किसी मोड़ पर
चल दिये साये भी साथ जब छोड़ कर
झांकते कक्ष के दर्पणों में मिला
अक्से भी जब खड़ा पीठ को मोड़कर
मार्ग नक्षत्र अपना बदल कर चले
सांझ आते, बुझाने लगी जब दिये
रात की ओढ़नी के सिरों पर बँधे
रश्मियों के कलश थे अंधेरा किये


उस समय व्योम में जो स्वयं रच गया
किंकिणी बन हवाओं के पग जो बँधा
गंध की वेणियों में अनुस्युत हुआ
भर गई जिसकी द्युतियों से हर इक दिशा


चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे