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Showing posts from April, 2012

नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ

नैन की बीनाईयों पर धूल की परतें जमें जबबादलों के चन्द टुकड़े केश में आकर घुलें जबहाथ, शाखा इक तराशी का न पल भर हाथ छोड़ेंकोई रह रह भूलता सा याद में आने लगे जबतब सुनो, यह मौन शब्दों में समय बतला रहा हैप्रीत की कविता नहीं अब नीति के कुछ गीत गाओगाओ वह जो एकतारे से कहे मीरा दिवानीगाओ वह जो कुंज में वृन्दावनी हो सांझ गायेछेड़ दो वह रागिनी जो सूर के स्वर में घुली हैगाऒ वह सुन कर जिसे खुद रागिनी भी गुनगुनायेऔर यदि अक्षम तुम्हारा स्वर न गाने में सफ़ल होतो किनारे पर खड़े हो,धार के सपने सजाओप्रीत की अनुभूतियों को और कितने शब्द दोगेऔर कितने दिन सपन के बीज बो निज को छलोगेपीटते कब तक रहोगे जा चुके पग की लकीरेंकब तलक इक वृत्त में तुम बन्द कर पलकें चलोगेज़िन्दगी के पंथ के इस आखिरी विश्राम-स्थल परकुछ नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओहो गया ओझल नजर से उस दिवस में खोये क्यों तुमशाख को क्या देखते हो, हो चुके नि:शेष विद्रुमएक भ्रम की हो गईं धुन्धली घनी परछाईयों मेंऔर कितनी देर तक तुम हो रहोगे इस तरह गुमअब नये इक साज के निर्माण का आधार बन करसरगमों को इक नया ध्याय दे देकर सजाऒ

यह मुझको अनुमान नहीं था

सपनों की पगडंडी पर बस एक बार देखा था तुमकोबस जायेगा चित्र तुम्हारा आंखों में, अनुमान नहीं थाजीवन वन में रहा विचरता मर्यादा की ओढ़ दुशालासंस्क्रुतियों के दीप जला कर किया पंथ में शुभ्र उजालागुरुकुल के सिद्धांत ईश का वचन मान कर शीष चढ़ायेलेकर कच की परम्परायें, सम्बन्धों का अर्थ निकालालेकिन बरसों के प्रतिपादित नियम, निमिष में ढह जाते हैंपुष्प शरों की सीमा कितनी है ये मुझको ज्ञान नहीं थानारद का प्रण, तप की गरिमा, बन्धन सभी उम्र के टूटेएक दॄश्य ही सत्य रह गया,बाकी चित्र हुए सब झूठेयाम,घड़ी पल, प्रहर समय की परिभाषायें शून्य हो गईपलकें पत्थर हुईं,दृश्य जो एक बार बन गये, न टूटेरात सौंप कर गई स्वप्न की जो इक स्वर्णिम रंगी चुनरियाउसे छीन ले जाये ऐसा कोई भी दिनमान नहीं थाजाने क्यों परिचय अपना ही लगा अधूरा मुझको लगनेन जाने क्या आस संजोये, होंठ लगे रह रह कर कँपनेखुली हुई बाँहें अधीर हो उठीं पाश में भर लें कुछ तो दूरी के मानक जितने थे सभी लगे मुट्ठी में बँधनेकब मरीचिकायें हो जाती हैं साकार इसे बतलाताकिसी कोश में किसी ग्रंथ में कोई भी प्रतिमान नहीं था

यह अब हमको नहीं गवारा

जो पगडंडी ह्रदय कुंज से ,बन्द हुये द्वारे तक जातीउस पर चिह्न पड़ें कदमों के यह अब हमको नहीं गवाराअजनबियत की गहन धुंध ने ओढ़ लिया है जिन चेहरों नेउनके अक्स नहीं अब मन के आईने में बनें दुबारासम्बन्धों के वटवृक्षों की जड़ें खोखली ही निकलीं वेरहे सींचते निशा दिवस हम जिनको प्रीत-नीर दे देकरसूख चुकीं शाखाओं को पुष्पित करने को कलमें रोपींव्यर्थ भटकना हुआ रहे ज्यों मरुथल में नौकायें खे करपता नहीं था हमें बाग यह उन सब को पी चुप रहता हैभावों के जिन ओस कणों से हमने इसका रूप संवाराछिली हथेली दस्तक देते देते बन्द पड़े द्वारे परदेहरी पर जाकर के बैठी रहीं भावनायें बंजारीझोली का सूनापन बढ़ता निगल गया फ़ैली आंजुरियाऔर अपेक्षा, ओढ़ उपेक्षा रही मारती मन बेचारीचाहे थी अनुभूति चाँदनी बन आगे बढ़ कंठ लगायेकिन्तु असंगति हठी ही रही उसने बार बार दुत्काराउचित नहीं है हुये समाधिस्थों को छेड़े जा कोई स्वरजिसने अंगीकार किया है एकाकीपन, हो एकाकीअपनी सुधियों के प्याले से हम वह मदिरा रिक्त कर चुकेभर कर गई जिसे अहसासों की गगरी ले कर के साकीवह अनामिका की दोशाला, जिस पर कोई पता नहीं हैपहुँच कहो कैसे सकता अब उस तक कोई भी हरकारा.

संध्या का एकाकीपन

संजो रखे हैं पल स्मृतियों के मैंने मन की मंजूषा में और संवारा करता हूँ उनसे संध्या का एकाकीपन

वे पल जिनमें दृष्टि साधना करते करते उलझे नयनावे पल जिनमें रही नींद में सोई हुई कंठ की वाणीवे पल जिनमें रहे अपरिचित शब्द अधर की अंगनाई सेरही छलकती जिनमें केवल रह रह कर भावों की हांडी

वे पल जब विपरीत दिशा में चले पंथ थे हम दोनों केऔर घिरे नयनों के कोहरे में आकर बरसा था सावन

वे उद्वेग भरे पल जिनमें रह न सका था मन अनुशासितवे रसभीने पल भाषाएँ कर न सकीं जिनको परिभाषितजिनकी सुरभि गंध भर भर कर महका देती अनगिन काननवे पल जो उच्छ्रुंखल पल में,और हुए पल में मर्यादित

वे पल बाँध गए जो पल में जीवन का सम्पूर्ण कथानकवे पल जिनमें शेस्ध नहीं है कर पाना कोई सम्पादन

पल.पलांश में त्याग अपरिचय, जो हो गये सहज थे अपनेपल जिनकी परछाईं करती है आंखों में चित्रित सपनेपल जिनकी क्षणभंगुरता की सीमाओं की व्यापकता मेंकोटि कल्पनाऒं के नक्षत्री विस्तार लगे हैं नपने

हाँ वे ही पल आराधक से जो आराध्य जोड़ते आयेउन्हीं पलों में सिक्त ह्रदय को करता रहता हूँ आराधन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन

तुमसे दूर कटे कैसे दिन तुमने पूछा बतलाता हूं
मन की बात उमड़ आती है जिन शब्दों को मैं गाता हूँझात तुम्हें मैने असत्य का थामा नहीं हाथ पल भर भीकिन्तु सत्य की अप्रियता पर अक्सर गया आवरण डालाकह देता हूँ शान्तिमयी हूँ सकुशल कटते हैं दिन रातेंमन को भावों को ओढ़ाये रहा मौन की मैं दोशालाकेवल शब्दों का आडम्बर है यह भी तो ज्ञात मुझे हैगीत गज़ल के सांचे में मैं, जिन शब्दों को बुन गाता हूँकुछ बातों का अधरों पर आ पाना रहा असम्भव प्रियतमऔर संकुचित सीमाओं में रही बँधी अनुभूति सदा हीमन के जुड़े हुये तारों में आलोड़न से कहाँ अपरिचितचाहे तुम स्वीकार न कर पाओ इसको मेरे अनुरागीविषम परिस्थितियों में रहता चित्रलिखित होकर मेरा मनसत्य यही है आज पूछते हो तुम तो मैं दोहराता हूँतुमने पूछा तो उग आये अनगिन प्रश्न अचानक मन मेंतुम्हें किस तरह रही अपरिचित तुमसे दूर दशा क्या मेरीदिन की बिछी हुई चादरिया कितनी है विस्तृत हो जातीबिना सिरे के कितनी लम्बी हो जाती है रात अँधेरीयद्यपि हुआ प्रकाशन दुष्कर मन की गहराई का प्रियतमफिर भी उन्हें शब्द देने की कोशिश मैं करता जाता हूँ.